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क्या यह पूरे समाज की विफलता नहीं?: अपराध, हादसे और लापरवाही; लेकिन अब तो युग ही भूलने का है

Tue, 26 May 2026 07:03 AM IST
Pavan नन्दितेश निलय, स्पीकर, लेखक एवं एथिक्स प्रशिक्षक
नन्दितेश निलय, स्पीकर, लेखक एवं एथिक्स प्रशिक्षक Published by: Pavan Updated Tue, 26 May 2026 07:03 AM IST
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सार
क्या यह भूलने का युग है? अगर नहीं, तो आखिर क्यों समाज बार-बार परीक्षाओं के पेपर लीक होने, भोपाल की ट्विशा के दम तोड़ने, हादसे का शिकार बने मां से लिपटे बच्चे और जीतू मुंडा के अपनी बहन का कंकाल लादकर बैंक पहुंचने पर आवाज नहीं उठाता? थोड़ी देर के लिए सही, हम उनके दुख में शामिल तो हो ही सकते हैं।
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Isn't this a failure of whole society?: Crime, accidents and negligence; but now is the era of forgetting
अमर उजाला - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

लेख की शुरुआत शायरा अंजुम रहबर के शेर से, अंजुम तुम्हारा शहर है जिस तरफ, एक रेल जा रही थी और तुम याद आए! लेकिन अब तो युग ही भूलने का है। जहां लाभ नहीं, कोई हित नहीं, वहां भला कौन-किसको याद रखें। आखिर भूलना एक बीमार समाज की आदत भी तो है। लेकिन मन तो मन ही ठहरा! वह चाहता है कि कोई उसे पल भर के लिए ही सही, पर याद तो रखे। सफलता के शोर में कोई उसकी ओर भी मुड़ कर तो देखे।


भूलना और याद करना-एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मनुष्य की चाहत हमेशा यही रही कि उसे इस जहां में याद रखा जाए। याद रखने से व्यक्ति की महत्ता तो सिद्ध होती ही है, यह भी सिद्ध होता है कि व्यक्ति होना उपयोगिता का सिद्धांत नहीं होता, बल्कि वह सब कुछ होता है, जिसमें उसके अपनों की खुशी और आमजनों की आशाएं शामिल होती हैं। प्रकृति चाहती है कि सब एक-दूसरे को याद रखें, जिनके साथ उनका रहना संभव हो पाया।


याद रखना मनुष्य का कौशल है और दूसरे का हक भी, क्योंकि महसूस करना और स्मृतियां बुनना किसी मशीन का गुण नहीं होता। लेकिन वह स्मृतियों का नायक अब उस समाज का हिस्सा बन रहा है, जहां किसी को याद रखना समय की बर्बादी है और दिल पर अनावश्यक बोझ।

यही आधुनिक सत्य है, और प्रजातंत्र का उभरता दर्शन। बस निर्ममता से भूलना सीखिए और निर्लज्जता के साथ जिया करिए। बस ‘अपने’ सुख-दुख को महसूस करिए, बाकी सब बेमानी है। नहीं तो हर बार कोई परीक्षा यों ही तो लीक नहीं हो जाती और फिर उस लीक को आसानी से भुला भी नहीं दिया जाता। कहीं आपने सुना कि पैरेंट्स या छात्र डेलीगेशन इस समस्या पर कोई सामूहिक आवाज या असहमति दर्ज कराना चाह रहे हैं? थोड़ा शोर होगा और फिर सबकुछ भुला दिया जाएगा। भुला दिया जाएगा वह सबकुछ, जो खुद के लाभ-हानि से नहीं जुड़ा होगा। नीट की परीक्षा समाप्त हुई और समाप्त हुआ वह सफर, जिसे अभी शुरू होना था। आखिर क्या बीती होगी उन छात्रों पर जो सच्चाई और ईमानदारी से परीक्षा देना चाहते थे। लीकेज मानो एक डरावना स्वप्न बन उन अभ्यर्थियों के सपनों पर ग्रहण लगाता रहता है।

आखिर वे सभी इन्सान थे, एक सुकून की जिंदगी जीना चाह रहे थे। लेकिन उनके सारे प्रयास पानी में डूब गए, आग में भस्म हो गए। कुछ भी नहीं बचा। जो बचा वह सिर्फ अवशेष था, क्रंदन था और किसी के हिस्से की यादें थीं। मां से लिपटा बेटा यह समझ नहीं पाया कि सिस्टम की गहराई नदी या तालाब की गहराई से अधिक होती है और वह सभी को डूबने से नहीं बचा सकती। डूबना एक नियति है और तैरना एक दक्षता, जो सिस्टम को भी डूबने से बचा ले जाता है। वृंदावन से बिलासपुर तक, गाजियाबाद से दिल्ली तक पानी और आग गवाह बने उस निर्दयता, निष्ठुरता और बेपरवाह भाव में डूबते-जलते उस मानव समाज के, जिसके दरख्तों में मानो पूरी तरह दीमक लग चुका है, क्योंकि वह कभी चुनाव परिणाम से दुखी हो रहा है, तो कभी खुश। उसे क्या पड़ी है कि कौन डूबा और कौन उतरा। वह तो उस समाज में जी रहा है, जहां दूसरों के दुखों को दूसरा ही समझा जाता है। उसे तो अपने घर में भी कई दूसरे लगने लगते हैं।  

अगर जीवन यात्रा है, तो सभी यात्री हैं और यात्रियों को अपने सामान और खुद की सुरक्षा स्वयं करनी चाहिए। और आग से बचने और गहरे पानी में तैरने की कला भी सीखनी चाहिए। और यह भी कि जीवन और मृत्यु सत्य है और प्रजातंत्र में सभी को सत्य स्वीकार करना चाहिए। यह न भूलिए कि सिस्टम का व्यवहार भी मनुष्य ही तय करता है।  

भूलना एक आदत है और शायद आधुनिक होना भी। पहले मां-बाप भुला दिए जाते हैं, फिर जीवन साथी, फिर बच्चे भूलते हैं, फिर सिस्टम, फिर समाज, और फिर देश! सब एक-दूसरे को भूलते जाते हैं। बस जो नहीं भूलता, वह फोन में चिपका सिम और मेमोरी कार्ड होता है। वह अगर खो भी जाता है, तो वापस दुबारा मिलने की संभावना रहती है। किसी मनुष्य का शरीर छोड़ जाना, फिर लौटना नहीं रह जाता। लेकिन उस दिन वह शरीर लौटा, क्योंकि जीतू मुंडा को अपनी बहन की कब्र दोबारा खोदनी पड़ी। उसे क्या पता था कि बैंक कर्मचारी किसी के मरने के बाद बिना डेथ सर्टिफिकेट के पैसा निकालने का अधिकार नहीं देते। उसकी बहन का जब देहांत हुआ, तो उसके अकाउंट में कुछेक हजार रुपये बचे हुए थे। अपनी गरीबी और अशिक्षा में धंसा जीतू यह समझ ही नहीं पाया कि आजादी के इतने साल बाद भी जीवन के बुनियादी मूल्य अनुत्तरित क्यों हैं! इसलिए उसे कागजों के सबूतों का नियम भी समझ में नहीं आया।

शायद उसे यकीन था कि विकसित दुनिया में संवेदनशीलता और करुणा से बहुत कुछ संप्रेषित हो सकता है। पर बैंक को तो सर्टिफिकेट चाहिए था। जीतू अपने आंसुओं को दफनाते हुए बहन के कंकाल को कब्र से निकाल कंधे पर लादकर नंगे पांव साढ़े तीन किलोमीटर की यात्रा कर बैंक पहुंचा। उस दिन सबकुछ कंकाल नुमा हो चुका था- आजादी, प्रजातंत्र, बुनियादी अधिकार, नागरिक व्यवहार, जीवन मूल्य, नैतिकता, सबकुछ।

यह खबर आग की तरह फैली और जीतू के पास कुछ जोड़ी जूते-चप्पल और कुछेक लाख रुपये भी पहुंचे, पर जीतू तो घर के उस कोने को थका-हारा देख रहा था, जहां उसकी बहन खाना बनाती थी। वह सुबक रहा था, क्योंकि उसने कब्र से निकालकर अपनी बहन की आत्मा को कष्ट पहुंचाया था। उसने फिर से वे सारे क्रिया-कर्म किए, जो मरने के बाद किए जाते हैं। उसने सभी को उनके अंदर के कंकाल से रूबरू करा दिया।

वह तो कुछ नहीं भूला, कुछ नहीं। शायद देश भी उन भाइयों और बहनों को न भूले, जो पारिवारिक कलह की भेंट चढ़ गए। आरोप तो कोर्ट में साबित होते हैं, पर किसी की जान नहीं जानी चाहिए। मृत्यु का कारण गर परिवार में बढ़ता क्लेश है, तो यह गिरता सामाजिक मूल्य भी है। अपनों को तो सभी याद रखते हैं, लेकिन औरों को जीवन से दूर जाते देखना, महसूस करना समाज को बचाने का कृत्य होगा।

इसलिए थोड़ी देर के लिए ही सही, हम सब उनके दुख में शामिल हों, उन्हें याद करें। उस ट्विशा को, जो इस समाज से बहुत कुछ कहना चाह रही थी, लेकिन वह नहीं बची। जीतू मुंडा की बहन कालरा मुंडा भी इस सिस्टम को, इस समाज को कहना चाह रही थी कि पुरुष हो या स्त्री, सभी मनुष्य बनकर जिएं। सभी चले गए और समाज के मूल्यों को बचाने का आग्रह भी कर गए। उनके दुख में डूबना और उन्हें याद करना मनुष्य होने का बोध है। हो सके, तो आप भी दुहराइए-जाने चले जाते हैं कहां, दुनिया से जाने वाले!  -edit@amarujala.com
 
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