फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Islamism and the Fear of Islam US-Asia in Grip of Civilizational Clashes Why Europe Live Under Shadow of Fear

इस्लामवाद और इस्लाम का भय: तथाकथित सभ्यतागत संघर्षों की चपेट में यूएस-एशिया, क्यों भय के साये में है यूरोप?

Sat, 03 Oct 2026 04:51 AM IST
ज्योति भास्कर रहीस सिंह
रहीस सिंह Published by: ज्योति भास्कर Updated Sat, 03 Oct 2026 04:51 AM IST
विज्ञापन
सार
बुनियाद केवल यूरोप की ही नहीं दरक रही है, बल्कि अमेरिका और एशिया भी ऐसे ही तथाकथित सभ्यतागत संघर्षों की चपेट में हैं। अब देखना है कि यह दरकन रुकेगी या फिर ध्वंस की ओर ले जाएगी। 
loader
Islamism and the Fear of Islam US-Asia in Grip of Civilizational Clashes Why Europe Live Under Shadow of Fear
भय के साये में है यूरोप - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

अभी पिछले दिनों ब्रिटिश मैगजीन द इकनॉमिस्ट ने एक स्टोरी प्रकाशित की, जिसका शीर्षक था-द ट्रुथ एंड द लाइज अबाउट इस्लाम इन यूरोप।  इसका सार यह है कि इस्लाम कोई गंभीर खतरा नहीं है, पर इस्लामवाद और इस्लाम का भय जरूर है। मैगजीन के इन निष्कर्षों के ठीक विपरीत, करीब एक दशक पहले मिशेल हौलेबेक ने अपने पॉलिटिकल-डिस्टोपियन उपन्यास सबमिशन के जरिये फ्रांस के लोगों को चेतावनी दी थी कि 2022 तक फ्रांस का इस्लामीकरण हो जाएगा।



वह एक दौर था, जिसमें सैमुअल पी हंटिंगटन की द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन एंड द रिमेकिंग ऑफ वर्ल्ड ऑर्डर का प्रभाव था, जिसमें जोर दिया जा रहा था कि पश्चिमी अथवा ईसाई सभ्यता और पूर्वी या इस्लामी सभ्यता के बीच सभ्यतागत संघर्ष है। यह कुछ हद तक दिखा भी था। यही कारण है कि 9/11 की घटना के करीब दो दशक बाद राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी कहते हुए नजर आए थे कि इस्लामवादी हमसे हमारा भविष्य छीनना चाहते हैं। उनका यह बयान तब आया, जब शार्ली हेब्दो पत्रिका के दफ्तर पर कट्टरपंथियों ने हमला किया था और सैमुअल पैटी का सिर कलम करने की घटना घटी थी। ये घटनाएं किसी प्रहसन का हिस्सा नहीं, बल्कि पश्चिमी जीवनशैली पर एक आघात थीं। द इकनॉमिस्ट के अध्ययन को किस तरह से देखा जाए? क्या इसे सिर्फ इस्लामोफोबिया तक सीमित मान लिया जाए या फिर लोगों में पनपते भय को किसी सच्चाई के करीब?


मैगजीन के अनुसार, इस समय यूरोप में इस्लाम को लेकर जो माहौल बना हुआ है, वह इस्लामोफोबिया से कुछ आगे बढ़कर दहशत का रूप ले रहा है। कारण, यूरोप की आधी आबादी अब यह मानने लगी है कि इस्लाम की संगतता पश्चिमी मूल्यों के साथ दूर-दूर तक नहीं है। जर्मनी में दक्षिणपंथी पार्टी ‘अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी’ (एएफडी) ने सबसे बड़े राज्य सैक्सोनी-आनहाल्ट में 44 प्रतिशत मत हासिल कर एक नया संदेश दिया है। ध्यान रहे कि एएफडी इस्लामीकरण के खिलाफ है और चुनाव में मुसलमानों के जबरन निर्वासन के वादे के साथ उतरी थी। तो, इस्लामोफोबिया से आगे बढ़कर भय, क्या राजनीतिक प्रोपेगैंडा है या वास्तविकता? अब इसे संयोग कहेंगे या कुछ और कि पिछले दिनों ही ब्रिटेन में सैकड़ों नकाबपोश ठगों ने डोवर पर कब्जा कर लिया और ‘स्टॉप द बोट्स’ व ‘क्राइस्ट इज किंग’ के नारे लगाए। यह किन शांति नायकों का उदाहरण है? लेकिन, वहीं फ्रांस में मरीन ले पेन के सार्वजनिक स्थानों पर इस्लामी सिर ढकने वाले परिधानों पर प्रतिबंध लगाने के आह्वान को 60 प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन हासिल हो गया। यानी बात उतनी सीधी नहीं है कि एक पक्ष देखकर पूरी कहानी गढ़ ली जाए। अब तो यह जुनून (दक्षिणपंथी) यूरोप से आगे निकलकर अमेरिकी धरती तक पहुंच चुका है। क्या हम यह मान सकते हैं कि इस्लामवाद का उभार 9/11 के दौर के उभारों की तरह आतंकवाद जैसी परिधियों के निकट पहुंच गया है। मैगजीन कहती है नहीं, इन नए उभारों में वैसा कुछ नहीं दिख रहा है? अब मामला बाहरी नहीं है, बल्कि भीतर से साजिशों के ज्वालामुखी बनते अधिक दिख रहे हैं।

यूरोप के भीतर झांकिए, आपको हर जगह यह आशंका जन्म लेती हुई महसूस होगी कि यूरोप के खिलाफ कोई साजिश हो रही है। क्या यह इस्लामवादियों की तरफ से हो रही है? अमेरिका में तो ट्रंप प्रशासन के एक सदस्य ने इसे ‘सिविलाइजेशनल इरेजर’ यानी सभ्यतागत विस्मृति कहते हुए अमेरिकियों को भविष्य की चेतावनी तक दे डाली है। पर, मैगजीन के अनुसार, यूरोप के सामने न तो इस्लामी कब्जे का खतरा है, न बड़े पैमाने पर मुसलमानों की कट्टरता का और न ही यूरोपीय संस्कृति के मिटने का। कारण, यूरोप में न तो ऐसे ‘नो-गो जोन’ हैं, जहां जाना मना हो, न राष्ट्रीय कानूनों में शरिया रिस-रिस कर प्रवेश कर रहा है और न ही कहीं जनसंख्या के महान विस्थापन की प्रक्रिया चल रही है। फिर, खतरा किस बात का? परंतु, खतरा तो है, पर कुछ अलग-सा।

इस्लामवादी व दक्षिणपंथी उन्माद से पैदा होने वाले अतिवाद, दोनों को खतरे के रूप में देखा जा सकता है। मैगजीन के अनुसार, मुस्लिम बहुल देशों से रिकॉर्ड प्रवासन हुआ है, फिर भी यूरोप की कुल आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी केवल छह प्रतिशत तक पहुंची है। ब्रिटेन के होम सेक्रेटरी और लंदन के मेयर जैसे कई मुस्लिम मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय हैं। तो फिर ऐसी क्या वजह है, जो इतने ज्यादा यूरोपीय लोगों का मानस इस्लाम के खिलाफ हो रहा है? एक तो यह है कि बहुत-से मुसलमान उदारवादी मूल्यों के विरुद्ध मनोदशा वाले हैं, खासकर समलैंगिकता व पैगंबर के अपमान जैसे मुद्दे पर। पर, समलैंगिकता के मामले में तो यूरोप के कुछ दक्षिणपंथी भी उतने ही विरोधी हैं। वहां असल समस्या क्या है? एक धर्म के रूप में इस्लाम के प्रवेश की अथवा एक विचारधारा के रूप में इस्लामवाद की गतिविधियों की?

ध्यान रहे, ये दोनों एक नहीं हैं। मैगजीन के अनुसार, 9/11 के जिहादियों के विपरीत, अधिकांश इस्लामवादी हिंसा का समर्थन नहीं करते, पर उनमें से बहुत-से लोग ‘एंट्रीइज्म’ का तरीका अपनाते हैं, अर्थात लोकतांत्रिक संस्थाओं में घुसपैठ कर एक उदारवाद-विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं। यह खतरा स्थानीय स्तर से शुरू होकर धीरे-धीरे बड़ा आकार लेता जाता है। इन स्थानीय खतरों को महाद्वीपीय स्तर का खतरा बनाने वाली चीज है-इनका राजनीतिक इस्तेमाल। इसे रोकना होगा, अन्यथा शंकाएं सही साबित हो सकती हैं। पर, एक तरफ इस्लामवादी अपनी वैचारिक आलोचना को इस्लाम पर हमला मानकर प्रतिक्रिया देते हैं और दूसरी तरफ यूरोपीय दक्षिणपंथी इसे कट्टरपंथी उभार या सभ्यतागत खतरे के रूप में दिखाते हैं। यही उस आधारभूत विभाजन का कारण है, जो यूरोप में दिख रहा है। खास बात यह है कि पॉपुलिस्ट लेफ्ट, यानी वामपंथ, जिसमें अलग-थलग पड़े फ्रांस व ब्रिटेन की ग्रीन पार्टी शामिल हैं, प्रवासन, अपराध या इस्लामवाद से जुड़े सवालों को नस्लवादी करार देने की प्रवृत्ति रखता है और पॉपुलिस्ट राइट, यानी दक्षिणपंथ इसे इस्लामिक खतरे के रूप में देखता है। वह राज्य पर सही चीज को छिपाने और दो अलग-अलग व्यवस्थाएं बनाने जैसे तरीके अपनाने का आरोप लगाता है। इसमें जर्मनी की एएफडी से लेकर ब्रिटिश आंदोलनकारी टॉमी रॉबिन्सन तक शामिल हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि चीजें कहां तक जा सकती हैं और कैसे?

बहरहाल, यूरोप में बहुत कुछ ठीक नहीं है। वह भय और घबराहट के दौर से गुजर रहा है। यह कृत्रिम भी नहीं है। वहां अब दोनों तरफ से जो हो रहा है, उसमें वोल्टेयर, इरास्मस और बोकासियो जैसों की अभिव्यक्तियां धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं, जिनके विचारों पर आधुनिक यूरोप की बुनियाद पड़ी थी। वैसे बुनियाद केवल यूरोप की ही नहीं दरक रही है, बल्कि अमेरिका और एशिया भी ऐसे ही तथाकथित सभ्यतागत संघर्षों की चपेट में हैं। अब देखना है कि यह दरकन रुकेगी या फिर ध्वंस की ओर ले जाएगी। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed