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बेटियों का जलवा: एशियाई खेलों में भारत की स्वर्णिम कहानी, 10 में से 8 स्वर्ण महिला खिलाड़ियों के नाम

Fri, 02 Oct 2026 06:40 AM IST
अमर उजाला Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Fri, 02 Oct 2026 06:40 AM IST
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सार
आइची-नागोया एशियाई खेलों में भारतीय महिला खिलाड़ियों ने अपने प्रदर्शन से देश के पदक अभियान में अहम भूमिका निभाई है। भारत के अब तक के दस स्वर्ण पदकों में आठ महिलाओं के खाते में आए हैं। महिला खिलाड़ियों ने एथलेटिक्स, निशानेबाजी, क्रिकेट, कबड्डी और तीरंदाजी समेत विभिन्न स्पर्धाओं में शीर्ष स्थान हासिल किया।
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एशियन गेम्स 2026 - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

जापान के आइची-नागोया में चल रहे 20वें एशियाई खेलों में भारत द्वारा अब तक जीते गए दस स्वर्ण पदकों में से आठ महिला एथलीटों द्वारा जीता जाना महज पदकों की संख्या का एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय खेलों की बदलती तस्वीर और महिलाओं के बढ़ते आत्मविश्वास का महत्वपूर्ण संकेत भी है। देश की बेटियों ने 4x400 मीटर रिले रेस, ट्रैप शूटिंग, क्रिकेट, कबड्डी, शूटिंग (मिक्स्ड टीम) और तीरंदाजी में स्वर्ण जीतकर पुरुषों पर दबदबा बनाए रखा है। चाहे कोर्ट पर रोमांचक और दबाव वाले मैच हों या शूटिंग रेंज में रिकॉर्ड-तोड़ सटीकता, महिला खिलाड़ी हर बड़ी जीत का केंद्र रही हैं। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि भारतीय बेटियों को जब समान अवसर और सही मंच मिलता है, तो वे वैश्विक स्तर पर तिरंगा लहराकर देश का नाम रौशन करने का जज्बा रखती हैं। यही नहीं, बेटियों की कामयाबी समाज की उस रूढ़िवादी सोच को भी आईना दिखाती है, जो उन्हें कमजोर मानकर खेलों से दूर रखती है। मगर, ये उपलब्धियां बताती हैं कि खेलों की दुनिया में भारत को एक ‘स्पोर्टिंग नेशन’ बनाने का नेतृत्व बेटियों ने संभाल लिया है। नीरू ढांडा ने ट्रैप शूटिंग में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास तो रचा ही, साथ ही फाइनल मुकाबले में 30 शॉट में से 28 पर सटीक निशाना साधकर एशियन गेम्स का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया। उन्होंने मिक्स्ड ट्रैप इवेंट में कयानन चेनई के साथ मिलकर भी स्वर्ण पदक जीता। इनके अलावा, किरण, एम पूवम्मा, प्राची और विद्या रामराज, चिकिता तनिपार्थी, पृथिका प्रदीप और ज्योति सुरेखा वेन्नम ने भी टीम इवेंट्स में स्वर्ण पदक जीते। उल्लेखनीय है कि भारतीय खेलों का ढांचा अब अधिक समावेशी व प्रगतिशील हो रहा है और इसका कुछ श्रेय देश की बदलती खेल नीतियों और खेल के क्षेत्र में निवेश को भी जाता है। हालांकि, अब भी अन्य देशों व पुरुषों के मुकाबले हमारी महिला एथलीटों को उतनी सुविधाएं एवं प्रशिक्षण नहीं मिल पाते, जितने मिलने चाहिए। पर, उम्मीद की जानी चाहिए कि बेटियों के इस शानदार प्रदर्शन के बाद सरकार, कॉरपोरेट घरानों और खेल संघों का ध्यान महिला खिलाड़ियों पर और ज्यादा केंद्रित होगा। महिला एथलीटों के लिए बेहतर ट्रेनिंग सुविधाएं, विशेष अकादमियां और अधिक स्पॉन्सरशिप के रास्ते खुलेंगे। इन महिला चैंपियन खिलाड़ियों को देखकर देश के छोटे-छोटे गांवों और कस्बों की लाखों बेटियों को प्रेरणा मिलेगी और उम्मीद की जानी चाहिए कि माता-पिता भी अब अपनी बेटियों को खेल में कॅरिअर बनाने से नहीं रोकेंगे। यह उपलब्धि यकीनन नए भारत की आत्मनिर्भर और साहसी आधी आबादी की बुलंद आवाज है।
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