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क्या पूरब का प्रकाश धुंधला पड़ रहा है
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : pexel
अस्वस्थ पृथ्वी के किंकर्तव्यविमूढ़ काल में प्रकाश पर बात करना प्रासंगिक है। यहां प्रकाश से आशय दार्शनिक प्रकाश से है, जिसे पश्चिमी लहजे से अलग करने के लिए हम आध्यात्मिक प्रकाश भी कह लेते हैं। सभ्यताओं का इतिहास हमें बताता है कि करीब तीन हजार साल से जीवन प्रश्नों के समाधान के लिए पश्चिमी पृथ्वी पूरब के आकाश की ओर देखती आ रही है। उन्हें लगता रहा है कि उत्तर इधर है। समाधान का प्रकाश इधर है। उनकी आशान्वित भाषा ने बुद्ध के जिस देश को ‘लाइट ऑफ एशिया’ कहा, वह पूर्वी पृथ्वी की वैदिक सभ्यता है।
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आधुनिक भारत के साथ समूचे विश्व ने माना कि यूनान और रोम की सभ्यताओं का तो लोप हुआ, लेकिन उससे भी प्राचीन वैदिक सभ्यता का स्पंदन मुगल और ब्रिटिश शासनों के बावजूद पूरब की पृथ्वी पर बना हुआ है। अभी जो अनिश्चितकालीन सर्वव्यापी संकट से पूरी पृथ्वी जूझ रही है और मृत्यु का यम जो छिपकर पूरी पृथ्वी को आंख दिखा रहा है, ऐसी स्थिति में पश्चिम अगर पूरब की ओर जीवन के लिए आशान्वित होकर नहीं देख रहा, तो क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि पूरब का प्रकाश धुंधला पड़ गया है। यहां तो यम भी मृत्यु से मुक्ति की विधि बताता रहा है।
वैदिक सभ्यता एक ऐसी संभव जीवन शैली रही है, जिसके अनुशीलन का उदाहरण सबसे पहले वैदिक ऋषियों ने रखा था। यह वैदिक वांग्मय ही भारतीय मनीषा है। वैदिक यानी वेद संबंधी, और वेद का एकमात्र गहन अर्थ है वह ज्ञान, जो मनुष्य को अभिष्ट है। ऋषि वे हैं, जो मंत्र को देख सकते हैं। मंत्र का अर्थ है मनन के दौरान मानस में कौंधा हुआ विचार, जो संसार संबद्ध मनोवैज्ञानिक स्मृति की विदाई के बाद ही संभव है। ऐसे असंख्य मंत्रों का समवाय है वेद, जिसे हम ऋग्वेद कहते हैं।
इसका एक भाग विचार है और दूसरा भाग है विनियोग यानी आचरण। यानी ज्ञान और उसका आचरण। वैदिक साहित्य का विस्तार मंत्र से आरंभ होकर ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद तक हुआ। उपनिषद तक आकर इस साहित्य का अंत हुआ, इसलिए इसे वेदांत कहते हैं। ब्राह्मण या ब्राह्मणग्रंथ मंत्रों की व्याख्या हैं। जैसे शतपथ ब्राह्मण। तो ज्ञान और उसका आचरण वैदिक ऋषियों की जीवन शैली रही है। उनका ज्ञान पूरी दुनिया के लिए प्रकाश बना और महामारी के अरण्य में अंधेरे के अंत का विराट वैभव सिद्ध हुआ।
वैदिक भाषा में कुछ शब्द बार-बार आते हैं। इनका शाब्दिक अर्थ तो सभी जानते हैं, पर दार्शनिक अर्थ न समझ पाने से लोग वेद के संदर्भ को गैरजरूरी समझते हैं। जैसे अग्नि या यज्ञ। शब्दावली वही है, पर जिस मानसिक भाषा के विकास में आज हम इन शब्दों को समझते हैं, वह अभिप्राय वैदिक भाषा में नहीं था। वैदिक भाषा संध्या भाषा है। इस संध्या भाषा में अग्नि का अर्थ वाणी भी है और आत्मिक ऊर्जा भी। महामारी के समय में यही लगता है कि मनुष्य के अहंकार ने प्रकृति को चुनौती दी है।
प्रकृति की ओर से सर्वव्यापी विनाश इसी अहंकार का प्रत्यक्ष परिणाम है। मानव षड्यंत्र को भी प्राकृतिक नीयत का ही एक हिस्सा मान लिया जाता है। प्रकृति की ब्रह्मांड के प्रति एक नीयत तो होती है, लेकिन वह नहीं, जो हम समझ रहे होते हैं। जो हम समझ रहे होते हैं, वह जब नहीं प्रकट होता, तो हम उसे रहस्य कह देते हैं। वैदिक ऋषि इसी रहस्य को अग्नि और यज्ञ की भाषा में उद्घाटित कर देते हैं। वे कहते हैं कि प्रकृति की नीयत है कि वह सृष्टिक्रम को विकास का क्रम दे। विकास क्रम को हम आज इवोल्यूशन शब्द से समझते हैं।
अवस्था में परिवर्तन ही विकासक्रम है। इस नीयत से एक महायज्ञ का शाश्वत आयोजन पूरी पृथ्वी पर प्रकृति करती रहती है। प्रकृति की नजर में मानवों की उपस्थिति मवेशियों का झुंड है। वह इस महायज्ञ में सभी की आहुति या बलिदान चाहती है। मनुष्य की ओर से रचने की दिशा में कुछ भी सोचा हुआ विचार या किया हुआ काम उसी महायज्ञ में की गयी आहुति है, जो एक सतत प्रक्रिया है। यह कभी ठहरती नहीं है। सृजन और विनाश का यही प्राकृतिक चरित्र है। इसीलिए अवस्था परिवर्तन या विकास क्रम प्रकृति की नीयत को हमारी आंखों के ऐन सामने सिद्ध करता है, रहस्य नहीं रहने देता।
अब इसमें प्रकाश कहां है? यज्ञ के लिए अग्नि चाहिए। अग्नि यज्ञ का परिचय है। यह अग्नि भी विराट है। प्रकृति से भी विराट। यह मनुष्य में आत्मिक शक्ति के रूप में शाश्वत अर्थ में प्रज्वलित है। मनुष्य मन जब अशुद्ध नहीं है, तब वह शुद्ध अग्नि मृत्यु से लगातार घिरी देह में शाश्वत विभूतियों से प्रकाश की रचना करता है। इसे हम देह का वह इम्युन सिस्टम कह सकते हैं, जो देह को प्रकृति यज्ञ के लिए तैयार तो करता ही है, देह में जीवित और प्राणवंत अस्तित्व को अलौकिक आनंद और शक्ति से भर देता है।
अग्नि का यह शाश्वत स्वरूप मनुष्य में हमेशा क्रियाशील है और वह मनुष्य को हमेशा क्रियाशील बनाए रख उसके जरिये स्वयं को व्यक्त कर रहा है, ताकि दोनों महायज्ञ शाश्वत स्तर पर पूर्ण होते रहें। प्राकृतिक भी और दैवी या अनश्वर भी। पार्थिव मनुष्य में विराट का यह अपार्थिव वैभव भारतीय मनीषा में श्रुति, स्मृति और काव्य हैं। यही पूरब की पृथ्वी का प्रकाश है। अगर यह अपनी और पश्चिमी पृथ्वी को रोग से मुक्त नहीं कर पा रहा, तो फिर यह प्रकाश हमारे अनभ्यास से धुंधला पड़ चुका है।