{"_id":"5f3c3ce77584e50c957418ca","slug":"invisible-challenges-of-indian-economy-badal-mukherjee-is-telling-about","type":"story","status":"publish","title_hn":"अर्थव्यवस्था की अदृश्य चुनौतियां, बता रहे हैं बादल मुखर्जी","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
अर्थव्यवस्था की अदृश्य चुनौतियां, बता रहे हैं बादल मुखर्जी
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
भारतीय अर्थव्यवस्था
पूरी दुनिया चूंकि कोरोना वायरस से जूझ रही है, ऐसे में अर्थव्यवस्था कुछ समय के लिए नेपथ्य में चली गई है। लेकिन यह मान लेना भोलापन ही होगा कि अर्थव्यवस्था के नेपथ्य में चले जाने भर से आर्थिक समस्याएं भी ओझल हो गई हैं। फिल्म टाइटैनिक में नाविक ने जब कहा कि वह बर्फ की गंध महसूस कर रहा है, तब किसी ने भी उसकी बात पर विश्वास नहीं किया और आखिरकार जहाज हिमशैल (आइसबर्ग) से टकराकर डूब गया। हमारी अर्थव्यवस्था के अदृश्य हिमशैल कहां हैं? मैं यहां खुद को तीन बड़ी चुनौतियों तक केंद्रित रखूंगा।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
पहली चुनौती अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कोरोना के असर की है। दुनिया के सभी देश कोविड-19 से प्रभावित हुए हैं, लेकिन उन पर पड़ा असर भिन्न-भिन्न है। इससे उत्पादन और व्यापार का पूरा परिदृश्य उथल-पुथल भरा हो गया है और यह कोई नहीं कह सकता कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थिरता कब लौटेगी। सिर्फ एक उदाहरण लीजिए।
कोरोना के कारण आयात में भारी कमी आई है, और निर्यात भी न होने के कारण पिछले इक्कीस वर्ष में पहली बार भारत के पास निर्यात सरप्लस है। लेकिन निर्यात के मुकाबले आयात में भारी कमी आई है। पर निर्यात के मुकाबले में आयात में ज्यादा कमी की यह प्रवृत्ति क्या स्थायी होगी? स्थिति सुधरने पर आने वाले दिनों में आवश्यक वस्तुओं का आयात होगा ही। फिर आने वाले दिनों में यह भी पता चलेगा कि निर्यात घटने से भारतीय अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान हुआ।
मुश्किल यह है कि सभी देश निर्यात सरप्लस की स्थिति को लंबे समय तक बरकरार नहीं रख सकते। मांग घट जाने के कारण अनेक देशों के पास अनबिकी वस्तुओं का स्टॉक जमा हो रहा है। ये कैसे बिकेंगी? ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और दूसरी संस्थाओं के सुझावों का ध्यान आता है। उनका कहना है कि सरकारों को उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता बढ़ाने की कोशिश करनी होगी। जाहिर है, खरीद क्षमता बढ़ेगी, तभी बाजार में मांग बढ़ेगी। लेकिन सवाल यह है कि मौजूदा स्थिति में लोगों की खरीद क्षमता में वृद्धि कर पाना भला किस तरह संभव है।
आगे बढ़ने से पहले मैं एक बिंदु पर ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा। मेरा मानना है कि घरेलू अर्थव्यवस्था की बदहाली का कारण कोविड-19 महामारी है, जिससे वैश्विक मांग बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसलिए मैं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा खरीद क्षमता बढ़ाने के सुझाव से सहमत नहीं हूं। वैश्विक बदहाली के कारण घरेलू स्तर पर सरकार के लिए लोगों की खरीद क्षमता में वृद्धि कर पाना संभव नहीं है। उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता तो तभी बढ़ेगी, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार के चिह्न दिखाई देंगे। ऐसे में सरकार क्या करेगी? ऐसी स्थिति में खरीद क्षमता बढ़ाने के मामले में मैं वित्तीय और आर्थिक नीतियों की पारंपरिक संदर्भ पृष्ठभूमि का इस्तेमाल करूंगा।
मौद्रिक नीतियों का मानक तय करने के लिए वैश्वीकरण बहुत महत्वपूर्ण है। अब किसी भी देश की आयकर और कॉरपोरेट टैक्स की दर उसकी प्रतिद्वंद्वी अर्थव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में तय होती है। जब मोरारजी देसाई आयकर की दर को 95 फीसदी से ऊपर ले गए थे, तब आयकरदाताओं के पास बचने का कोई रास्ता ही नहीं था।
वैसे में, आयकरदाताओं ने टैक्स बचाने के लिए अपनी आय छिपाने का विकल्प चुना था। लेकिन अब, जब आय और संपत्ति देश की सीमाओं से परे गतिशील हैं, तब किसी भी देश के लिए अपने धनी करदाताओं के लिए आयकर बढ़ाकर अपने राजस्व में वृद्धि करना संभव और व्यावहारिक नहीं है। और एक प्रतिद्वंद्वी विश्व बाजार में अप्रत्यक्ष करों और शुल्कों को वित्तीय नीति के मनमाने प्रयोग के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जैसा कि डॉ. मनमोहन सिंह ने तीन दशक पहले किया था।
न ही हमारी सरकार निचले स्तर के 40 फीसदी लोगों पर आयकर थोप सकती है, जिसके पास कोई आय नहीं है और जो कुछ ही महीने पहले सड़क और रेलवे लाइन से होकर घर लौट रहे थे। देश का मध्यवर्ग आयकर चुकाता है, लेकिन कुल कर राजस्व में उसकी हिस्सेदारी बहुत कम है। ऐसे में, सरकार को मौद्रिक नीति पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। पर मौद्रिक नीति में सब कुछ अर्थशास्त्र पर निर्भर है, ऐसा भी नहीं है। आम तौर पर माना जाता है कि बड़े राष्ट्रीयकृत बैंक और उन्हें नियंत्रित करने वाले रिजर्व बैंक ही मौद्रिक नीति के केंद्र में है।
जबकि रिजर्व बैंक पर राजनीतिक नियंत्रण ही कटु सच्चाई है। राजनेता इस देश के स्कूल, कॉलेज और कॉरपोरेट सेक्टर को भी नियंत्रित करते हैं। इसलिए राजनेताओं के प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन के बगैर रिजर्व बैंक के लिए बैंकों का संचालन करना असंभव है। उर्जित पटेल ने अपनी ताजा किताब में कॉरपोरेट सेक्टर के हित में इनसॉल्वेंसी कानून के विलयन की जो बात कही है, यह इसका ताजा उदाहरण है। इस महीने की शुरुआत में घोषित मौद्रिक नीति में रिजर्व बैंक की दुविधा ही सामने आई है। एक तरफ निवेशक भविष्य के बारे में चिंतित हैं, दूसरी ओर, ब्याज दर कम नहीं हो रही, ऐसे में, बैंक भला किसको कर्ज देंगे और कैसे?
अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति को देखकर केन्स कहीं हंस रहे होंगे। देश में निर्यात सरप्लस है, लेकिन किसी देश को निर्यात करने की संभावना नहीं है, किसी विदेशी निवेशक को लुभाने या आमंत्रित करने की कोई सूरत नहीं है और न ही कोई घरेलू निवेशक है, जिसके बारे में आशान्वित हुआ जाए। दरअसल आर्थिक मोर्चे पर ठोस नीति न होने का नतीजा देश की 40 प्रतिशत गरीब आबादी को लंबे समय तक भुगतना पड़ेगा।
मौद्रिक नीति की विफलता ही श्रम कानूनों की विफलता के तौर पर हमारे सामने है और जिसका नतीजा एमएसएमई क्षेत्र और प्रवासी मजदूर भुगत रहे हैं। इसमें शक नहीं कि कोविड-19 के कारण पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। लेकिन ठोस आर्थिक नीति के अभाव में हमें इसका भीषण नतीजा भुगतना पड़ेगा। हमें लंबे समय तक विपरीत परिस्थिति का मुकाबला करने के लिए खुद को तैयार रखना पड़ेगा। (लेखक प्रोफेसर और पूर्व निदेशक दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स हैं।)