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अंतरराष्ट्रीय संबंध: संतुलन बनाने की चुनौती और साझेदारियों की प्रबंधन

Thu, 06 Nov 2025 10:19 AM IST
K S Tomar केएस तोमर
Updated Thu, 06 Nov 2025 10:19 AM IST
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सार
भारत व अमेरिका के बीच हुआ सैन्य समझौता निस्संदेह ऐतिहासिक है, पर अपने रूसी संबंधों को देखते हुए भारत को एक संतुलन बनाना होगा।
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International Relations: The Challenge of Balancing and Managing Partnerships
भारत अमेरिका में रक्षा समझौता - फोटो : एक्स/पीट हेगसेथ

विस्तार

भारत की विकसित होती रणनीतिक दिशा में अक्तूब अक्तूबर के अंत में कुआलालंपुर में हस्ताक्षरित दस वर्षीय फ्रेमवर्क फॉर द यूएस-इंडिया मेजर डिफेंस पार्टनरशिप एक निर्णायक लम्हा है। कुआलालंपुर समझौता रक्षा सहयोग के लिए व्यापक नीतिगत दिशा प्रदान करता है, जिसमें खुफिया जानकारी साझा करना, संयुक्त सैन्य अभ्यास, उन्नत प्रणालियों का सह-विकास व सशस्त्र बलों के बीच बेहतर अंतर-संचालन क्षमता शामिल है। यह समझौता पहले के बुनियादी करारों लेमोआ (एलईएमओए) कॉमकासा (सीओएमसीएएसए) और बेका (बीईसीए) पर आधारित है, जो दोनों देशों को समुद्र, हवा व जमीनी मोचों पर बेहतर ढंग से कार्य करने में सक्षम बनाते हैं।



भारत के लिए यह फ्रेमवर्क रणनीतिक विविधीकरण की दिशा में एक सुनियोजित रुख का संकेत देता है। हालांकि, भारत की ऐतिहासिक निर्भरता रूस पर अब भी बनी हुई है, लेकिन निगरानी ड्रोन से लेकर हैवी लिफ्ट हेलिकॉप्टर तक, अमेरिकी प्रणालियों का लगातार समावेश, परिचालन लचीलापन, समुद्री वर्चस्व और तकनीकी एकीकरण की दिशा में सैन्य सिद्धांत के पुनर्गठन का स्पष्ट संकेत देता है। यह परिवर्तन ठोस आंकडों से भी जाहिर होता है। भारत ने अमेरिका से 31 एमक्यू-१ची स्काईगार्डियन/सीगार्डियन ड्रोन खरीदने के लिए 3.99 अरब अमेरिकी डॉलर के समझौतों को अंतिम रूप दिया है, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में लंबी दूरी की समुद्री निगरानी तथा आक्रामक क्षमताओं में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। इसके अलावा, भारतीय नौसेना ने 2.4 अरब अमेरिकी डॉलर के अनुबंध के तहत 24 एमएच-60आर सीहोंक हेलिकॉप्टरों को अपने बेड़े में शामिल किया है, जिनका उद्देश्य पनडुब्बी रोधी युद्ध व बहु-मिशन अभियानों की क्षमता को सशक्त बनाना है। लगभग 1.5 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य वाले जीई एफ414 जेट इंजनों के सह-उत्पादन पर बातचीत जारी है, जो भारत के अगली पीढ़ी के स्वदेशी लड़ाकू विमानों को शक्ति देंगे। इसी तरह, स्ट्राइकर बख्तरबंद वाहनों के संयुक्त निर्माण को लेकर भी वार्ताएं आगे बढ़ रही हैं। ये परियोजनाएं भारत-अमेरिका रक्षा उद्योग सहयोग को कई अरब डॉलर के स्तर तक पहुंचा सकती हैं।


अमेरिका के लिए यह समझौता कोई परोपकारी कदम नहीं, बल्कि एशिया में अपनी रणनीतिक पकड़ बनाए रखने का एक सोचा-समझा रणनीतिक निवेश है। तकनीकी रूप से सक्षम भारत चीन के प्रभाव का संतुलन साधने वाला देश बनकर उभर रहा है और क्षेत्र के लोकतांत्रिक देशों के लिए एक स्थिर साझेदार की भूमिका निभा रहा है। यह सब अमेरिका की इंडो-पैसिफिक नीति के उस दृष्टिकोण से मेल खाता है, जिसमें फ्री एंड ओपन समुद्री व्यवस्था स्थापित करने पर जोर दिया गया है।

आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक प्लस (एडीएमएम प्लस) के दौरान हुआ यह समझौता भारत, अमेरिका और आसियान देशों के बीच एक उभरते त्रिपक्षीय संतुलन की ओर इशारा करता है, जो दक्षिण चीन सागर में दबाव या धमकी वाली समुद्री गतिविधियों का विरोध करने तथा नियम-आधारित नौवहन को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह समझौता अप्रत्यक्ष रूप से चतुर्भुज सुरक्षा संवाद (क्वाड) ढांचे को मजबूत करता है, जिससे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा में भारत की भूमिका एक अहम साझेदार के रूप में और सशक्त होती है।

बीजिंग ने इस समझौते को असहजता के साथ देखा और इसे वाशिंगटन की नियंत्रण रणनीति (कंटेनमेंट स्ट्रेटजी) तथा भारत के चीन-विरोधी धुरी की ओर बढ़ने का हिस्सा माना। हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सैन्य उपस्थिति, जिबूती में उसके मजबूत ठिकाने तथा ग्वादर में उसकी क्षमता, और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर उसका आक्रामक रवैया, ये सभी कारण भारत के समुद्री आधुनिकीकरण को चीन के प्रभाव के संतुलन के रूप में और अधिक स्पष्ट बनाते हैं। पाकिस्तान के लिए इस समझौते का प्रभाव मनोवैज्ञानिक व रणनीतिक, दोनों ही स्तरों पर है। एक अहम सवाल यह भी उठता है कि क्या अमेरिका-भारत समझौता नई दिल्ली के लंबे समय से चले आ रहे मॉस्को के साथ रक्षा संबंधों को कमजोर करेगा? इसका जवाब अचानक बदलाव में नहीं, बल्कि एक क्रमिक परिवर्तन में छिपा है। भारत के लगभग 45 फीसदी रक्षा आयात अब भी रूस से होते हैं, हालांकि एक दशक पहले यह हिस्सा करीब 70 प्रतिशत था।

फिर भी, अमेरिका के साथ संबंध प्रगाढ़ होते हुए भी, रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए अपने रूसी संबंधों को जीवित रखते हुए भारत संभवतः एक संतुलित संतुलन बनाए रखेगा। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती किसी भी गुट में कनिष्ठ भागीदार बने बिना अपनी साझेदारियों का प्रबंधन करना होगी। उसे वाशिंगटन के साथ रणनीतिक तालमेल को रणनीतिक निर्भरता में बदलने से बचाना होगा। एक स्वायत्त शक्ति के रूप में भारत की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने हितों का तालमेल इस तरह बिठाए कि निर्णय लेने की स्वतंत्रता से समझौता न करना पड़े।

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