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अंतरराष्ट्रीय: किस दिशा में बढ़ रही दुनिया, क्या बहुपक्षवाद के क्षरण का रेखांकन हैं ये राहें

Mon, 05 Jan 2026 07:56 AM IST
पवन पांडेय आनंद कुमार
आनंद कुमार Published by: पवन पांडेय Updated Mon, 05 Jan 2026 07:56 AM IST
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सार
अंतरराष्ट्रीय कानून स्पष्ट रूप से संप्रभुता और आंतरिक मामलों में गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांतों पर आधारित है। किसी देश के निर्वाचित या मौजूदा राष्ट्रपति को उसके ही देश से जबरन पकड़कर ले जाना, बिना उस देश की सहमति या संयुक्त राष्ट्र की अनुमति के, आधुनिक इतिहास में लगभग अभूतपूर्व है। यहां तक कि मादुरो शासन की आलोचना करने वाले देश भी इसका समर्थन करने से हिचकिचा रहे हैं।
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International: In which direction is the world moving? Do these paths mark the erosion of multilateralism?
दुनिया किस दिशा में बढ़ रही है? - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में तीन जनवरी की रात वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे नाटकीय और विवादास्पद घटनाओं में से एक के रूप में दर्ज की जाएगी। अमेरिका ने इसे मादक पदार्थ तस्करी और तानाशाही के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई बताया, लेकिन दुनिया के बड़े हिस्से ने इसे एक संप्रभु देश में जबरन सत्ता परिवर्तन के प्रयास के रूप में देखा है।


ट्रंप के दृष्टिकोण से यह कार्रवाई उनके लंबे समय से चले आ रहे नजरिये के अनुरूप है। निकोलस मादुरो पर अमेरिका में 2020 से ही नार्को-टेररिज्म, ड्रग तस्करी और हथियारों की अवैध आपूर्ति के आरोप लगे हैं। ट्रंप प्रशासन मादुरो को ऐसा ‘अपराधी शासक’ मानता है, जो सत्ता की आड़ में अंतरराष्ट्रीय ड्रग कार्टेल चला रहा है। ट्रंप ने इसे पश्चिमी गोलार्ध की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया, लेकिन यह तर्क वैश्विक स्तर पर व्यापक स्वीकार्यता नहीं पा सका।


अंतरराष्ट्रीय कानून स्पष्ट रूप से संप्रभुता और आंतरिक मामलों में गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांतों पर आधारित है। किसी देश के निर्वाचित या मौजूदा राष्ट्रपति को उसके ही देश से जबरन पकड़कर ले जाना, बिना उस देश की सहमति या संयुक्त राष्ट्र की अनुमति के, आधुनिक इतिहास में लगभग अभूतपूर्व है। यहां तक कि मादुरो शासन की आलोचना करने वाले देश भी इसका समर्थन करने से हिचकिचा रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का यह कहना कि यह कदम एक ‘खतरनाक मिसाल’ बन सकता है, इसी चिंता को दर्शाता है कि यदि ऐसी कार्रवाइयों को वैध माना गया, तो वैश्विक व्यवस्था में बल प्रयोग की सीमाएं पूरी तरह टूट सकती हैं। ट्रंप के बाद के बयानों ने इस आशंका को और मजबूत किया है। वेनेजुएला, जो पहले ही आर्थिक बदहाली, प्रतिबंधों और राजनीतिक ध्रुवीकरण से जूझ रहा है, वहां विदेशी नियंत्रण की कल्पना भी गहरे प्रतिरोध और अस्थिरता को जन्म दे सकती है। वेनेजुएला में स्थिति फिलहाल तनावपूर्ण, लेकिन अपेक्षाकृत शांत है। सुप्रीम कोर्ट ने उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज को कार्यवाहक राष्ट्रपति बनने का आदेश दिया, ताकि प्रशासनिक निरंतरता बनी रहे। पर रोड्रिगेज के बयान से संकेत मिलता है कि सत्ता प्रतिष्ठान फिलहाल एकजुट रहकर अमेरिकी कार्रवाई का विरोध करना चाहता है। यह शांति कब तक बनी रहेगी, कहना मुश्किल है।

रूस और चीन ने खुलकर अमेरिकी कार्रवाई की निंदा की और इसे संप्रभुता का उल्लंघन बताया। लैटिन अमेरिका के कई देशों, जैसे ब्राजील, मेक्सिको और कोलंबिया ने चेतावनी दी है कि यह कदम क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरनाक है और अमेरिका के पुराने हस्तक्षेपवादी इतिहास की याद दिलाता है। यूरोपीय संघ ने यह कहते हुए कि मादुरो की वैधता संदिग्ध है, अपेक्षाकृत संतुलित रुख अपनाया, साथ ही अंतरराष्ट्रीय कानून और संयम की आवश्यकता पर भी जोर दिया।



भारत और वेनेजुएला के बीच प्रत्यक्ष आर्थिक या राजनीतिक हित सीमित हैं। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद तेल व्यापार लगभग समाप्त हो चुका है और वहां भारतीय समुदाय की संख्या भी बहुत कम है। लेकिन भारत के लिए असली चुनौती आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक और सैद्धांतिक है। भारत लंबे समय से संप्रभुता, गैर-हस्तक्षेप तथा नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का समर्थक रहा है। यदि वह ऐसी कार्रवाई पर चुप रहता है, तो उसकी नैतिक स्थिति कमजोर पड़ सकती है।

दूसरी ओर, अमेरिका के साथ भारत के रणनीतिक संबंध आज अभूतपूर्व स्तर पर हैं। रक्षा, प्रौद्योगिकी और हिंद-प्रशांत रणनीति में दोनों देशों की साझेदारी गहरी हुई है। व्यापार विवाद और रूसी तेल जैसे मुद्दों पर मतभेद के बावजूद, अमेरिका भारत का प्रमुख रणनीतिक साझेदार है। ऐसे में वाशिंगटन की खुली आलोचना भारत के लिए कठिन है। भारत का अब तक का संतुलित बयान, जिसमें चिंता व्यक्त की गई, संवाद की अपील की गई और नागरिकों की सुरक्षा पर जोर दिया गया, इसी दुविधा को दर्शाता है। यह स्थिति इस सच्चाई को उजागर करती है कि आज की दुनिया में मध्यम शक्तियों को अक्सर सिद्धांतों और हितों के बीच कठिन चुनाव करने पड़ते हैं।

वेनेजुएला का मामला बहुपक्षवाद के क्षरण को भी रेखांकित करता है। इससे यह प्रवृत्ति और मजबूत होती है कि शक्तिशाली देश पहले कार्रवाई करें, फिर वैधता की तलाश करें। बहुपक्षीय संस्थाओं की मजबूती की वकालत करने वाले भारत जैसे देशों के लिए यह चिंताजनक है। इतिहास बताता है कि बाहर से थोपी गई राजनीतिक व्यवस्थाएं शायद ही कभी स्थायी शांति व लोकतंत्र ला पाती हैं। सवाल यह नहीं है कि वेनेजुएला में अगला शासक कौन होगा, बल्कि यह है कि दुनिया किस दिशा में बढ़ रही है? काराकस में जो हुआ, उसके प्रभाव वैश्विक राजनीति में लंबे समय तक महसूस किए जाएंगे और यह तय करेंगे कि आने वाले वर्षों में शक्ति और सिद्धांतों के बीच संतुलन कैसा रहेगा। edit@amarujala.com
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