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पुलिस का अमानवीय चेहरा

Mon, 14 Nov 2016 06:40 PM IST
शिवदान सिंह
शिवदान सिंह Updated Mon, 14 Nov 2016 06:40 PM IST
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 Inhuman face of police
शिवदान सिंह

विश्व के हर भाग में स्त्री की इज्जत की जाती है और भारतवर्ष में तो स्त्री को देवीरूप में पूजा जाता है। परंतु देखने में आता है कि उसी स्त्री को कानून की रखवाली करने वाली करने वाली पुलिस के पास जाना पड़ता है, तो वहां पर मदद, सांत्वना तथा उचित न्याय देने के बजाय पुलिस द्वारा दुत्कार, असहयोग तथा अमानवीय प्रश्नों के रूप में उसके घावों को और कुरेदकर उन पर नमक छिड़का जाता है। इसी महीने ग्रेटर नोएडा के रबूपुरा थाने में कुछ महिलाओं को ऐसी ही त्रासदी से गुजरना पड़ा। ये महिलाएं करौली गांव में ईंट भट्ठे में कुछ डकैतों द्वारा उनके साथ किए गए सामूहिक दुष्कर्म की रिपोर्ट दर्ज करवाने थाने पहुंची थीं। दो दिन तक पुलिस इस घटना को दबाने में लगी रही, परंतु मीडिया के शोर-के बाद जब केस दर्ज करने के लिए तैयार भी हुई, तो महिलाओं को डरा धमकाकर केस को हल्का बनाने का प्रयास किया।

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पुलिस का ऐसा ही रवैया बुलंदशहर के सामूहिक बलात्कार मामले में भी दिखा था, जब शुरू में उसने रिपोर्ट लिखने से मना कर दिया था। ऐसा नहीं है कि केवल उत्तर प्रदेश में ही पुलिस का ऐसा रवैया है। सबसे ज्यादा शिक्षित राज्य केरल भी इससे अछूता नहीं है। हाल ही में वहां की एक टीवी प्रस्तोता भाग्यलक्ष्मी ने पत्रकार वार्ता कर एक सामूहिक बलात्कार की शिकार महिला की व्यथा व्यक्त की थी। उन्होंने बताया था कि उस पीड़ित महिला से पुलिस ने बेहद अपमानजक तरीके से सवाल किए थे, जिनका यहां जिक्र तक नहीं किया जा सकता।
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इसी प्रकार की घटना कुछ समय पहले पंजाब में उस समय देखने में आई, जब वहां की एक ट्रांसपोर्ट कंपनी की बस में एक मां-बेटी की इज्जत लूटने का प्रयास बसकर्मियों ने किया तथा प्रतिरोध करने पर मां को चलती बस से नीचे फेंक दिया था। इसके बाद पंजाब पुलिस का रवैया पूरे देश ने देखा, क्योंकि ट्रांसपोर्ट कंपनी एक विशेष परिवार से संबंधित थी।
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महिलाओं के प्रति अपराध खत्म करने के दावे किए जाते हैं, लेकिन इसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि पुलिस शिष्टता के साथ पीड़ित महिलाओं के साथ पेश आए। कानून के अनुसार पीड़ित महिलाओं का मानसिक तनाव दूर करने के लिए जहां पर मनोवैज्ञानिकों द्वारा काउंसिलिंग इत्यादि का प्रावधान है, मगर पुलिस जो सर्वप्रथम पीड़िता के संपर्क में आती है, उसका रवैया अमानवीय तथा शुष्क क्यों होता है? तो इसका उत्तर होगा कि समाज में नैतिक मूल्यों में आई गिरावट तथा व्याप्त भ्रष्टाचार से पुलिस भी अछूती नहीं है। अपराधी जहां अब इंटरनेट का दुरुपयोग करके तरह तरह के घिनौने अपराध कर रहे हैं, वहीं पुलिस व्यवस्था 1861 के कानून द्वारा ही चलाई जा रही है। इसका स्वरूप सामंती है और सामंती व्यवस्था में महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता के लिए कोई स्थान नहीं होता।


देश के प्रसिद्ध वरिष्ठ पूर्व पुलिस अधिकारी प्रकाशसिंह ने पुलिस सुधारों पर कॉमनवेल्थ मानव अधिकार सम्मेलन में सुझाव दिए थे कि अब देश की पुलिस को सामाजिक अपराध, जैसे महिलाओं, वैवाहिक तथा यौन अपराधों के अलावा साइबर संबंधी अपराधों को सुलझाने के लिए प्रशिक्षित विशेष स्टाफ हर थाने में रखना चाहिए। देश में जहां तरह-तरह के विकास की योजनाएं बनाई जा रही हैं, वहीं कानून तथा पुलिस व्यवस्था को भी आधारभूत ढांचे का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानकर इसका भी आधुनिकीकरण करना चाहिए।

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