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चीन में भारतीय वसंत

Wed, 25 Apr 2018 06:51 PM IST
तरुण विजय
तरुण विजय Updated Wed, 25 Apr 2018 06:51 PM IST
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Indian spring in China
भारत-चीन संबंध
याद नहीं कि पिछले सत्तर वर्षों में कभी ऐसा हुआ हो कि एक पखवाड़े में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और फिर प्रधानमंत्री चीन यात्रा पर रहे हों। दोकलम में 73 दिवसीय तनावपूर्ण गतिरोध के एक साल बाद यह परिदृश्य क्या अचानक चीन में भारतीय वसंत का अहसास दिलाता नहीं लगता?

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पर चीन कठिन है और विशेषकर शी जिनपिंग के आजीवन सम्राट समान शासक बने रहने के पार्टी निर्णय के बाद उसकी भावी कूटनीति का आकलन प्रभाव-वृद्धि की असीम महत्वाकांक्षा के रूप में ही किया जा सकता है। वह एशिया, यूरोप व अफ्रीका में निर्बाध प्रभुत्व की ओर बढ़ना चाहता है, लेकिन उसे इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अमेरिका से बढ़ कर भारत से चुनौती दिखती है। 

शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन के माध्यम से भारत से उच्च स्तरीय वार्ताएं न केवल भारत की बढ़ती शक्ति और राजनयिक दृढ़ता को मान्यता है, बल्कि दोनों देशों में इस परिपक्व भाव का भी द्योतक है कि 'चलना' तो साथ साथ है- या तो झगड़ते हुए चलो या सहयोग से बढ़ो।

आठ सदस्य देशों वाला सहयोग संगठन मूलतः चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, रूस, तजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान ने मिलकर बनाया था, सुरक्षा, सैन्य सहयोग और आतंकवाद विरोधी संयुक्त चिंताओं को एजेंडे में रखकर। गत वर्ष भारत और पाकिस्तान (चीन के समर्थन से भारत की स्थिति अपने लिए संतुलित करने) सदस्य बने और प्रधानमंत्री मोदी ने अस्ताना में बयान दिया कि भारत-चीन संबंधों में मतभेद-विवाद में न बदलते हुए, ठीक से संभालें जाएं, तो अवसरों में बदल सकते हैं।

इस बीच, दलाई लामा तथा उनके कार्यक्रमों को लेकर कुछ परिवर्तन हुए, जो प्रकटतया भारत-चीन संबंधों को आहत होने से रोकने के लिए ही प्रतीत हुए। यद्यपि इससे परंपरागत दृष्टि से दलाई लामा के समर्थकों को विस्मय हुआ।

अनेक सांस्कृतिक अकादमिक प्रतिनिधि मंडल चीन गए और 13 अप्रैल को भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने प्रधानमंत्री की 27 अप्रैल को होने वाली चीन यात्रा की तैयारी के लिए चीन के प्रमुख राजनयिक यांग जेयची से भेंट की, जो सीमा वार्ता के लिए अधिकृत प्रतिनिधि वांग यी से कहीं अधिक वरिष्ठ हैं। चीन में यही पद्धति है किसी वार्ता को बेहतर एवं सामान्य से अधिक महत्व देने की। 

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण शंघाई सहयोग संगठन के पृथक-पृथक संपन्न विदेश व रक्षा मंत्रियों के सम्मेलनों में आईं और संगठन के सभी पुरुष मंत्री-सदस्यों में वे दोनों अकेली महिलाएं थीं। यही तथ्य बढ़ते भारत और महिला नेतृत्व के उभार को दुनिया में दर्शा गया। जहां भारत के सिवाय अन्य सदस्य देशों ने चीन के वन बेल्ट, वन रोड' प्रस्ताव का समर्थन किया, वहीं तेज तर्रार दोनों मंत्रियों ने आतंकवाद के विरोध में भारत का रुख दृढ़ता से रखा। 

सीमा पार का आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और मादक द्रव्यों की तस्करी रोकने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है। दोनों ने ही भारत की बढ़ती ताकत का जिक्र कर आतंकवाद को मूलभूत मानवाधिकार हनन की चुनौती बताया।

कुल मिलाकर भारत के तीनों वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने चीन में नरेंद्र मोदी की शी जिनपिंग की अनौपचारिक वार्ता के लिए वातावरण तथा आधारभूमि बना दी। मोदी इस अवसर का भारत की चिंताओं और विकास के लिए उपयोग करेंगे ही। 

पहली चिंता है, सीमा पर विवादों का समाधान। भारत यह स्पष्ट कर चुका है कि चीन के साथ भविष्य में सामान्य से बेहतर संबंध बनाने के लिए सीमा पर शांति पहली आवश्यकता है। दोकलम विवाद के दौरान नरेंद्र मोदी की दृढ़ता और सेना की निर्भीक तैयारी ने विश्व में भारत की साख बढ़ाई, पर ऐसा विवाद दोबारा न हो।

भारत के साथ व्यापार असंतुलन दूर हो। ये बातें जरूरी हैं, क्योंकि एशिया एवं पश्चिम एशिया में भारत को अपने नेतृत्व की धुरी मजबूत जमानी है। उत्तर कोरिया का प्रश्न चीन तथा अमेरिका में शक्ति स्पर्द्धा का विषय बना है। भारत इसे देख रहा है। मालदीव, श्रीलंका से लेकर बांग्लादेश, म्यांमार व आसियान में चीन सीधे-सीधे भारत के बढ़ते प्रभाव को रोकने का प्रयास कर रहा है। 

चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के सामने उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (मुंबई-बंदर अब्बास, तेहरान, चाबहार, बाकू-अजरबेजान, अस्त्राखान, मास्को, सेंट पीटर्स बर्ग- 7200 किलोमीटर) भारत का बहुत बड़ा सामरिक अस्त्र है। गत 13 अप्रैल को चीन में सामरिक आर्थिक सम्मेलन में चीनी विदेश मंत्री ने भारत-नेपाल-चीन आर्थिक गलियारे का विषय छेड़कर संकेत दिया था कि चीन किसी भी तरह भारत को वन बेल्ट, वन रोड के लिए सहमत करना चाहता है। 

पर भारत के लिए तीन प्राथमिकताएं हैं, पहली, सीमा पर शांति और सुरक्षा; दूसरी,पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद बढ़ाने पर रोकने के लिए विश्व जनमत उभारना तथा चीन-पाकिस्तान नजदीकी को विश्व शांति के लिए खतरा सिद्ध करना; तीसरा, विश्व नेतृत्व में ट्रंप-शी जिनपिंग के अखाड़े को भारत के नवीन शक्ति केंद्र के सापेक्ष ला बिठाना।

पर चार हजार किलोमीटर की सीमा, परमाणु शक्ति और आने वाले समय में एशिया में अपना प्रभाव स्थापित करने की सामरिक प्रतिस्पर्द्धा भारत-चीन के अघोषित एजेंडा में है। हिंद महासागर क्षेत्र इस दृष्टि से एक चुनौती का क्षेत्र बना है, जहां चीन की उपस्थिति लगातार बढ़ी है। 

वुहान (चीन) में मोदी-शी प्रस्तावित वार्ता विवादों को अवसर में बदल सामरिक मुद्दों को वार्ता के जरिये हल करते हुए एशिया के नए नेतृत्व को हासिल करने की दिशा में बढ़ा कदम है। मोदी इस अवसर को भारत के रणनीतिक लाभ में बदलेंगे और गत वर्ष चीन से बढ़ते विवाद देख प्रसन्न हो रहे भारत-शत्रुओं को निराश करेंगे, यह निश्चित है।
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