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जानना जरूरी है: दधीचि ने क्यों दान कीं अपनी अस्थियां? ब्रह्मा जी से मिले पुत्र के वरदान से जुड़ी है कथा...

Sun, 20 Jul 2025 06:35 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 20 Jul 2025 06:35 AM IST
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सार
त्वष्टा ने तपस्या कर ब्रह्मा जी से ऐसा पुत्र मांगा, जो इंद्र का वध करने में समर्थ हो। इसके बाद वृत्रासुर उत्पन्न हुआ। देवताओं के आग्रह पर वृत्रासुर के वध के लिए महर्षि दधीचि ने अपनी अस्थियां वज्र बनाने के लिए दान कर दीं।
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Indian mythology Why did Dadhichi donated bones relation with boon of son given by Brahma
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

इंद्र को अपने गुरु विश्वरूप पर संदेह हुआ, तो उन्होंने उनकी हत्या कर दी। विश्वरूप तपस्वी ब्राह्मण थे। यह समाचार जब उनके पिता त्वष्टा को मिला, तो वह अत्यंत क्रोधित हो उठे। त्वष्टा ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा से वर मांगा, ‘मुझे ऐसा पुत्र दीजिए, जो इंद्र का वध करने में समर्थ हो और जो देवताओं के लिए भय का कारण बने।’ ब्रह्मा ने त्वष्टा को इच्छा-पूर्ति का वरदान दे दिया, जिसके फलस्वरूप त्वष्टा की यज्ञ-अग्नि से एक भयानक असुर उत्पन्न हुआ। उसका नाम वृत्रासुर था। उसका शरीर इतना विशाल था कि वह प्रतिदिन सौ धनुष (लगभग चार सौ हाथ) तक बढ़ जाता था। उसकी शक्ति को देखकर पाताललोक के असुर, जिनमें से कई अमृत-मंथन के समय मारे जा चुके थे और जिन्हें शुक्राचार्य ने पुनः जीवित कर दिया था, वृत्रासुर के पास आ गए। सभी ने वृत्रासुर को अपना अधिपति मान लिया।



वृत्रासुर ने अपना प्रभुत्व बढ़ाते हुए तीनों लोकों में आतंक मचा दिया। उसकी शक्ति से त्रस्त होकर अनेक ऋषि-मुनि भगवान ब्रह्मा के पास पहुंचे और उन्हें अपनी पीड़ा बताई। ब्रह्मा जी बोले, ‘यह असुर त्वष्टा की तपस्या से उत्पन्न हुआ है। कोई उपाय खोजना होगा, जिससे यह मारा जा सके।’ देवताओं ने कहा, ‘जब इंद्र को ब्रह्महत्या से मुक्त कर फिर से स्वर्ग का राजा बनाया गया, तब हमसे एक भूल हो गई। हमने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र महर्षि दधीचि के आश्रम में रख दिए थे। अब वे अस्त्र हमारे पास नहीं हैं, तो हम वृत्रासुर से युद्ध कैसे करें?’ ब्रह्मा ने देवताओं को सुझाव दिया और कहा, ‘तुम महर्षि दधीचि के पास जाओ और उनसे उनकी अस्थियां मांग लो। दधीचि की अस्थियों से वज्र बनाया जा सकता है और उसी से वृत्रासुर का वध संभव हो पाएगा।’


देवताओं ने दधीचि के आश्रम की ओर प्रस्थान किया। रास्ते में इंद्र ने संकोच से कहा, 'वृत्रासुर ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुआ है। उसकी हत्या करना क्या उचित होगा?'

तब ब्रह्मा ने समझाया, 'यदि कोई ब्राह्मण भी आततायी हो, लोगों को क्षति पहुंचाता हो, तो उसे मारना धर्मसम्मत है। ऐसे व्यक्ति की हत्या ब्रह्महत्या नहीं मानी जाती।' वृत्रासुर पूर्वजन्म में चित्ररथ नामक राजा था। एक बार वह आकाश में विहार करता हुआ कैलास पर्वत पहुंचा। वहां उसने भगवान शिव को पार्वती के साथ बैठे देखा, तो उपहास करते हुए बोला, 'शिव जैसे योगी को भी स्त्री का मोह हो गया है।' यह सुन देवी पार्वती को क्रोध आ गया और उन्होंने चित्ररथ को शाप दे दिया, 'तू दैत्य बनकर जन्म लेगा।' वही चित्ररथ अब वृत्रासुर के रूप में जन्मा था।

इस बीच, सभी देवता दधीचि के आश्रम पर पहुंचे। दधीचि का आश्रम अत्यंत शांत था। वहां शेर और हिरण, सांप और नेवले, बिल्ली और चूहे-सभी एकसाथ प्रेम से रहते थे। किसी को किसी से भय नहीं था। दधीचि अपनी पत्नी सुवर्चा के साथ रहते थे। उनके चेहरे पर करुणा की अद्भुत झलक थी। देवताओं ने दधीचि को प्रणाम कर कहा, 'हे मुनिवर ! हम सब एक भारी संकट में हैं। कृपया हमारी सहायता करें।' दधीचि बोले, 'मुझे बताओ, तुम्हें क्या चाहिए?' देवता बोले, 'यदि हमें आपकी अस्थियां मिल जाएं, तो उनसे वैज्र बनाकर वृत्रासुर का वध किया जा सकता है।' दधीचि मुस्कराकर बोले, 'यह कोई कठिन बात नहीं है। परोपकार के लिए शरीर त्यागना मेरा सौभाग्य होगा। तुम मेरी अस्थियां ले सकते हो।' उन्होंने पत्नी को भीतर भेज दिया और बोले, 'कुछ क्षण रुकिए, मैं अभी शरीर त्याग देता हूं।' यह कहकर दधीचि तुरंत ध्यान में लीन हो गए और समाधि में चले गए। फिर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। देवताओं ने दधीचि के मृतं शरीर से अस्थियां प्राप्त कर लीं और उनसे बने वज्र नामक घातक अस्त्र से इंद्र ने वृत्रासुर का वध किया। इस तरह महर्षि दधीचि ने देवताओं की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनका यह बलिदान आज भी त्याग, परोपकार और धर्म के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है। 

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