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जानना जरूरी है: उग्रश्रवस के शाप से दुष्पण्य की मृत्यु... महर्षि अगस्त्य ने दिलाई प्रेतयोनि से मुक्ति
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राजा की आत्मा को महर्षि अगस्त्य ने दिलाई प्रेतयोनि से मुक्ति
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
एक राजा था, जिसके पुत्र का नाम दुष्पण्य था। वह बचपन से ही क्रूर एवं निर्दयी था। उसे लोगों को सताने में बहुत आनंद आता था। जैसे-जैसे दुष्पण्य बड़ा हुआ, तो वह और अधिक अत्याचारी हो गया। दुष्पण्य ने अनाचार का नया तरीका खोज लिया। वह किसी छोटे बच्चे को बहला-फुसला कर अपने साथ ले जाता और उसे पानी में डुबाकर मार डालता था। पानी में डूबते हुए बच्चे की छटपटाहट देखकर दुष्पण्य को अजीब-सा सुख मिलता था। इस तरह, दुष्पण्य ने राज्य के अनेक अबोध बालकों को मौत के घाट उतार दिया। आखिर दुष्पण्य के इन अत्याचारों को देखते हुए राजा ने अपने पुत्र दुष्पण्य को राज्य से निकाल दिया।निष्कासित हो जाने के बाद दुष्पण्य एक दिन घूमता हुआ ऋषि उग्रश्रवस के आश्रम तक पहुंच गया। उसने देखा कि आश्रम के पास ऋषिपुत्र खेल रहा था। वह उग्रश्रवस का पुत्र था। बच्चे को देखते ही दुष्पण्य के भीतर सोया हुआ राक्षस जाग उठा। उसके हाथ, नन्हे बालक की हत्या के लिए मचल उठे। दुष्पण्य ने आसपास देखा; वहां कोई नहीं था। वह दबे पांव आगे बढ़ा और उसने बालक को उठा लिया। फिर दुष्पण्य ने बालक को शांत करने के लिए उसका मुंह दबाया और उसे उठाकर आश्रम से थोड़ी दूरी पर बहती नदी के पास ले आया। फिर उसने बच्चे को पानी में डुबा दिया। बालक चिल्लाता रहा और दुष्पण्य उसे छटपटाता देखकर हंसता रहा। आखिर, मौत से संघर्ष करने के कुछ देर बाद पानी में डूब जाने से उग्रश्रवस के पुत्र की मृत्यु हो गई।
यह बात उग्रश्रवस से छिपी न रह सकी। उन्हें योगबल से तत्काल अपने पुत्र की मृत्यु और उसके कारण का पता लग गया। उग्रश्रवस ने दुष्पण्य को शाप दे दिया, ‘दुष्ट! तूने मेरे पुत्र को पानी में डुबाकर मारा है, इसलिए मैं तुझे शाप देता हूं कि तू भी पानी में डूबकर मरेगा और फिर प्रेतात्मा बनकर भटकता रहेगा।’ यह सुनकर दुष्पण्य रोने लगा। उसने उग्रश्रवस से क्षमा मांगी और अपनी मुक्ति का उपाय पूछा। तब उग्रश्रवस ने कहा, ‘प्रेतात्माओं की मुक्ति सहज नहीं होती। महर्षि अगस्त्य के अतिरिक्त तेरे त्राण का उपाय किसी के पास नहीं है।’
उग्रश्रवस का शाप सुनकर दुष्पण्य को अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ, किंतु तब तक देर हो चुकी थी। उसने उग्रश्रवस से कई बार क्षमा मांगी, लेकिन ऋषि ने शाप वापस लेने या उसे कम करने से मना कर दिया।
दुष्पण्य के ऊपर उग्रश्रवस के शाप का प्रभाव तुरंत शुरू हो गया। वह अकारण नदी के तट पर पहुंच गया और उसके किनारे पर दौड़ने लगा। तभी दुष्पण्य का पैर फिसला और वह नदी के गहरे पानी में गिर पड़ा। उसे तैरना भी नहीं आता था। उसने बहुत हाथ-पैर मारे, लेकिन यह भी शाप का ही प्रभाव था कि उसे कोई बचाने नहीं आया। आखिर, पानी में डूबने से दुष्पण्य की मृत्यु हो गई, लेकिन शाप के कारण उसकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिली। तब दुष्पण्य की आत्मा ने महर्षि अगस्त्य को खोजना आरंभ कर दिया। कुछ समय भटकने के बाद, दुष्पण्य की आत्मा को महर्षि अगस्त्य के दर्शन हो गए। वह तत्काल उनके पास गया और बोला, ‘महर्षि, मेरी रक्षा कीजिए। केवल आप ही मुझे बचा सकते हैं। मेरा उद्धार कीजिए।’
महर्षि अगस्त्य ने दुष्पण्य को देखते ही योगबल से उसे पहचान लिया और उसका अतीत भी जान लिया। उन्हें उस प्रेतात्मा पर दया आ गई। उन्होंने अपने प्रिय शिष्य सुतीक्ष्ण को बुलाया और उससे कहा, ‘तुम गंधमादन पर्वत पर जाओ। वहां तुम्हें अग्नितीर्थ नाम का एक पवित्र स्थान मिलेगा। पहले तुम स्वयं उस स्थान पर बने पावन सरोवर में स्नान करना और फिर उसका पवित्र जल लेकर मेरे पास वापस आ जाना।’
सुतीक्ष्ण ने अपने गुरु की आज्ञा का पालन किया और वह गंधमादन पर्वत पर स्थित अग्नितीर्थ के पवित्र सरोवर पर जा पहुंचे। सुतीक्ष्ण ने उसमें स्नान किया और फिर एक पात्र में पावन जल लेकर महर्षि अगस्त्य के पास लौट आए। अगस्त्य ने पात्र से जल लिया और दुष्पण्य की भटकती आत्मा पर छिड़क दिया। अगस्त्य के हाथ से पवित्र जल के छींटे पड़ते ही दुष्पण्य को प्रेतयोनि से मुक्ति मिल गई। इसके बाद दुष्पण्य ने अगस्त्य और सुतीक्ष्ण को प्रणाम किया और परलोक सिधार गया।