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जेनेवा समझौते का भारतीय सबक

Mon, 09 Dec 2013 06:58 PM IST
प्रकाश करात/महासचिव, माकपा
प्रकाश करात/महासचिव, माकपा Updated Mon, 09 Dec 2013 06:58 PM IST
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Indian lesson of Jeneva convention

यह सच है कि ईरान के साथ अमेरिका के परमाणु विवाद का निपटारा भारत के लिए भी फायदेमंद होगा।

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यहां यह दर्ज करना महत्वपूर्ण है कि केंद्र की यूपीए सरकार ने अपने ही हितों के खिलाफ काम करते हुए और अमेरिका के दबाव के सामने घुटने टेकते हुए सितंबर, 2005 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) में ईरान के खिलाफ मतदान किया था। उसी के बाद यह मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पास पहुंचा था।

उसी दौरान मनमोहन सिंह सरकार ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन परियोजना से पीछे हट गई।

आगे चलकर भारत ने पाबंदियों के अमेरिकी दबाव के सामने भी घुटने टेक दिए और ईरान से भारत का तेल का आयात आधा कर दिया। अब जब खुद अमेरिका ईरान के साथ सुलह-समझौते की ओर बढ़ रहा है, तब भारत अदूरदर्शी तथा गिड़गिड़ाहट भरे अपने रुख पर पछताने के सिवाय कुछ नहीं कर सकता।
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यही समय है, जब हमारी सरकार को समझना होगा कि वह अमेरिका या यूरोपीय संघ के दबाव पर अपनी विदेश नीति नहीं बदल सकती। लेकिन हो यही रहा है।

हम ईरान या श्रीलंका के खिलाफ वही करते हैं, जो अमेरिका कहता है। अब अमेरिका को लगा कि ईरान से दुश्मनी खत्म करनी चाहिए, पर इसका नुकसान हमें भरना पड़ेगा, क्योंकि जिस देश के साथ हमारे पुराने संबंध रहे हैं, अमेरिका के कहने पर हमने अपने रिश्ते खराब किए।
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जिनेवा में परमाणु मुद्दे पर पी 5+1 शक्तियों और ईरान के बीच जो समझौता हुआ है, वह एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रगति को दर्शाता है। छह महीने के लिए हुआ यह अंतरिम समझौता अपने भीतर एक चौतरफा समझौते की संभावनाएं छिपाए हुए है।

यह समझौता एक ओर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य देशों और जर्मनी तथा दूसरी ओर ईरान के बीच वार्ताओं के एक के बाद एक कई दौरों के बाद हुआ है। इस समझौते के जरिये ईरान ने यह मान लिया है कि वह यूरेनियम का पांच फीसदी से अधिक संवर्द्धन नहीं करेगा।

इसके अलावा वह अपने मौजूदा 20 प्रतिशत संवर्द्धित यूरेनियन की शक्ति भी घटाएगा। ईरान ने आईएईए द्वारा बढ़ी हुई निगरानी तथा जांच-पड़ताल भी मंजूर कर ली है।

इसके बदले में पश्चिमी ताकतें इसके लिए राजी हो गई हैं कि उसके खिलाफ लगी कुछ पाबंदियों में ढील दी जाएगी और ईरान के जब्तशुदा तेल फंड में से एक हिस्सा निकालने की इजाजत दी जाएगी।

ईरान बराबर यह कहता आया है कि परमाणु अप्रसार संधि के हस्ताक्षरकर्ता के नाते उसे यूरेनियन संवर्द्धन करने का अधिकार है। अंतरिम समझौता इसका प्रावधान करता है कि तेहरान निचले स्तर तक ऐसा करता रह सकता है।

लेकिन अमेरिका इससे इन्कार कर रहा है, जबकि रूस का कहना है कि हम परमाणु के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के ईरान के अधिकार को, जिसमें संवर्द्धन का अधिकार भी शामिल है, मान्यता देने की अनिवार्यता पर इस समझदारी के साथ सहमत होते हैं कि उक्त कार्यक्रम के संबंध में इस समय हमारे जितने भी सवाल हैं, उनका निपटारा होगा तथा समूचे कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग के कड़े नियंत्रण के अधीन लाया जाएगा।

समझौते की अलग-अलग व्याख्याएं इसी ओर इशारा करती हैं कि एक चौतरफा समझौते तक पहुंचने के रास्ते में अब भी समस्याएं बनी हुई हैं। लेकिन इतना तो है ही कि दोनों पक्ष थोड़ा-थोड़ा झुके हैं।

जिनेवा समझौते की सफलता के पीछे दरअसल वह खामोश कूटनीति है, जो पिछले कुछ महीनों में अमेरिका और ईरान के वार्ताकारों के बीच हुई है।

मौजूदा परमाणु विवाद के पीछे वास्तव में ईरान के खिलाफ अमेरिका की लगातार बनी हुई शत्रुता ही काम करती आई है।

वर्ष 1979 की क्रांति के बाद से चली आ रही इस शत्रुता को अमेरिका पर हुए आतंकी हमले के बाद राष्ट्रपति बुश ने और आगे ही बढ़ाया तथा इराक और उत्तर कोरिया के साथ ईरान को भी ‘पाप की धुरी’ घोषित कर दिया था।

वर्ष 2006 में परमाणु मुद्दा विवाद के केंद्र में आ गया। अमेरिका और पश्चिमी ताकतें यूरेनियम संवर्द्धन के ईरान के अधिकार पर लगातार सवाल उठाती रही हैं।

उनका आरोप है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के कदम उठा रहा है। नतीजतन संयुक्त राष्ट्र ने ईरान के रक्षा संबंधी प्रौद्योगिकी हासिल करने पर पाबंदियां लगा दीं, अमेरिका ने एकतरफा तरीके से ऐसी कड़ी पाबंदियां थोप दीं, जो ईरान के तेल उद्योग तथा उसके पूरे वित्तीय क्षेत्र का गला दबाती थीं और पिछले साल यूरोपीय संघ ने ईरान के तेल पर ही पाबंदी लगा दी।

इस मामले में अमेरिका इस्राइल के साथ तालमेल बिठाकर चलता आया है। ईरान को और अलग-थलग करने के लिए अमेरिका ने सऊदी अरब तथा खाड़ी देशों के परंपरागत सहयोगियों का भी सहारा लिया है।

इराक पर कब्जे के बाद से अमेरिका तथा उसके अरब सहयोगियों ने अपनी ताकत सीरिया को अस्थिर करने पर लगा दी, जो ईरान के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा है।

इसका नतीजा यह हुआ है कि सीरिया में जारी गृहयुद्ध में बसर असद सरकार के खिलाफ लड़ाई की कमान चरमपंथियों ने संभाल ली है।

पश्चिम एशिया में अमेरिकी रणनीति ने सांप्रदायिक तकरार और इस्लामी ताकतों को आगे बढ़ाने का ही काम किया है। लेकिन अब वह भी यह पहचानने के लिए मजबूर हुआ है कि सीरियाई टकराव के बाद इस समूचे क्षेत्र के अस्थिर होने के निहितार्थ बेहद खतरनाक होंगे।


अब जब काबुल से अमेरिकी फौज की वापसी का समय करीब आ चुका है, तब अमेरिका को यह स्वीकार करना ही होगा कि अफगानिस्तान में हालात को स्थिर करने में एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में ईरान महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है।

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