स्पिन खेलना भूलते भारतीय
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ऑस्ट्रेलिया ने पुणे में खेले गए पहले टेस्ट में जिस तरह भारत को अपनी स्पिन गेंदबाजी के दम पर 333 रन से हराया, उससे फिर साबित हुआ कि भारतीय खिलाड़ी टर्निंग विकेट पर स्पिन गेंदबाजी खेलने की कला भूलते जा रहे हैं। स्पिन के दम पर ही भारत दिग्गज टीमों को पानी पिलाता रहा है। लेकिन भारत को घरेलू मैदान पर जब भी अच्छे टर्निंग विकेट पर क्वालिटी स्पिन खेलने का अवसर मिला, तो हमारी बल्लेबाजी पूरी तरह धराशायी हो गई। टर्निंग विकेट पर सही तकनीक के साथ कदमों का इस्तेमाल बहुत जरूरी है। सतर्कता, धैर्य और हालात के हिसाब से सही शॉट्स का चयन करना भी आवश्यक है। पुणे में भारतीय बल्लेबाजों में ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों के मुकाबले ये खूबियां कम देखने को मिलीं। जिस विकेट पर ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज 182 ओवर खेलने में सफल रहे, वहां भारतीय बल्लेबाज 74 ओवर में ही लुढ़क गए।
बेशक भारत 19 टेस्ट में अजेय रहने के बाद पहली बार हारा है। लेकिन हाल के दिनों में टर्निंग विकेट पर भारतीय बल्लेबाजों को दिक्कत का सामना करना पड़ा। वर्ष 2012 में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट सीरीज के लिए भारत ने टर्निंग विकेट तैयार कराए। लेकिन इंग्लैंड की टीम काफी होमवर्क करके आई थी और उसकी स्पिन जोड़ी ग्रीम स्वान और मोंटी पनेसर ने दूसरे टेस्ट को 10 विकेट से और तीसरे टेस्ट को सात विकेट से जीतकर सीरीज पर 2-1 से कब्जा जमा लिया था।
इसी तरह टीम इंडिया 2015 में जब श्रीलंका के दौरे पर खेलने गई, तो गॉल टेस्ट में टर्निंग विकेट मिला, जहां भारतीय टीम पहली पारी में 192 रन की बढ़त लेने के बाद भी टेस्ट हार गई। ऐसा लगता है कि पिछले चार वर्षों में जो भारतीय बल्लेबाज उभरे हैं, उनमें द्रविड़, लक्ष्मण, सौरव, सचिन और सहवाग जैसी स्पिन खेलने की क्षमता नहीं है। यही वजह है कि 2014 में ऑस्ट्रेलिया दौरे पर जाने पर इन्हीं नाथन लियोन ने 23 विकेट लेकर भारतीय बल्लेबाजों के लिए मुश्किलें खड़ी की थीं, तो 2013 में दक्षिण अफ्रीका का दौरा करने पर अनजान स्पिनर रोबिन पीटरसन ने भारत की हार में अहम भूमिका निभाई थी।
टर्निंग विकेट पर ढंग से न खेल पाने की समस्या बीते दशक के 1960 के दशक में थी, जब हमारे पास ईरापल्ली प्रसन्ना, बिशन सिंह बेदी और भगवत चंद्रशेखर जैसी सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ स्पिन तिकड़ी थी। 1969-70 में ऑस्ट्रेलिया टीम के भारतीय दौरे पर आने पर प्रसन्ना की अगुआई वाली स्पिन तिकड़ी की मौजूदगी में भी ऑस्ट्रेलिया 3-1 से सीरीज जीतने में सफल हो गई थी। उस जीत में ऑस्ट्रेलियाई ऑफ स्पिनर एशले मेलेट ने अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने प्रसन्ना के 26 विकेट के मुकाबले 28 विकेट लिए थे। लेकिन धीरे-धीरे स्पिन विकेट पर भारत की बादशाहत बनी। इसी का परिणाम था कि शेन वार्न और मुथैया मुरलीधरन जैसे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ स्पिनर भारत में जलवा दिखाने में कामयाब नहीं हो सके।
नई पीढ़ी के भारतीय बल्लेबाज स्पिनरों को ढंग से नहीं खेल पा रहे, तो इसकी वजह उनका ट्वंटी-20 और एकदिवसीय मैच अधिक खेलना है, जिससे उनमें धैर्य की कमी आ गई है। पिछले डेढ़ दशक से भी अधिक समय से भारत का लक्ष्य घरेलू क्रिकेट में पेस गेंदबाजी पर जोर देना है। इस कारण घरेलू टूर्नामेंटों में भी टर्निंग विकेट कम ही देखने को मिले हैं। अलबत्ता विराट की अगुआई वाली टीम इंडिया पहला टेस्ट भले हार गई है, पर वह इतनी कमजोर भी नहीं है कि सीरीज में वापसी न कर पाए।