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कामयाबी की इंजीनियरिंग

Sat, 09 Feb 2013 12:59 AM IST
हेमेन्द्र मिश्र
हेमेन्द्र मिश्र Updated Sat, 09 Feb 2013 12:59 AM IST
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indian engineers dominated in united states of america

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के लिए वह 'अमेरिकी-भारतीय विज्ञान सहयोगी' हैं, तो दोस्तों के बीच हाजिर जवाब और बौद्धिक क्षमता की खान। वहीं, कर्मभूमि में नैनो बायोटेक्नोलॉजी में उल्लेखनीय शोध करने की वजह से उन्हें ख्याति मिली है। वाकई विज्ञान जगत का शायद ही कोई ऐसा शख्स होगा, जो सुब्र सुरेश से अपरिचित होगा।

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भारतीय मूल के इस इंजीनियर और वैज्ञानिक ने अपने शोध कार्यों और प्रशासकीय क्षमता का मिश्रण इस बारीकी से तैयार किया है कि अब वह कारनेगी मेलन यूनिवर्सिटी का प्रमुख बनने जा रहे हैं। अमेरिका के शीर्ष 25 शिक्षण संस्थानों में गिना जाने वाला यह विश्वविद्यालय रोबोटिक्स प्रौद्योगिकी का श्रेष्ठ अध्ययन केंद्र है और रजनीकांत अभिनीत फिल्म रोबोट भी इसका जिक्र है।
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सुब्र सुरेश का इस मुकाम पर पहुंचना अप्रत्याशित नहीं है। आईआईटी, मद्रास से स्नातक करने के बाद महज 21 वर्ष की उम्र में ही वह अमेरिका रवाना हो गए। उन्होंने पहले आयोवा स्टेट यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री हासिल की और फिर मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) से डॉक्टरी का दर्जा।
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कर्मक्षेत्र में उनका अनुभव इतना समृद्ध है कि अमेरिका के कई प्रांतों के प्रवास के बाद उन्होंने इंग्लैंड, फ्रांस, स्वीडन जैसे कई देशों में भी समय बिताया। इसलिए तो वह बेझिझक स्वीकार करते हैं कि जीवन और समाज की विविधता को समझने का यही अनुभव उन्हें कुशल प्रशासक बनाने में मददगार साबित हुआ।

अमेरिका के राष्ट्रीय विज्ञान फाउंडेशन का पहला एशियाई निदेशक बनने की वजह भी शायद उनका यही अनुभव था। इस पद के लिए उनका नाम बराक ओबामा ने खुद नामांकित किया था, जिसे वहां की सीनेट ने सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया। पदार्थों की सरंचना, उसके गुण और लक्षण से संबंधित नए खुलासे, विज्ञान के क्षेत्र में 21 पेटेंट हासिल करने सहित कई


उल्लेखनीय उपलब्धियों की वजह से कई सम्मानों से नवाजे जा चुके सुब्र के इंजीनियर बनने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। उस वक्त को आज भी वह नहीं भूल सके हैं, जब मां उन्हें बताती थीं कि सफलता वैज्ञानिक या इंजीनियर बनकर ही हासिल की जा सकती है, जबकि वह खुद कभी कॉलेज नहीं गईं। मां के सपने को पूरा करने के लिए ही उन्होंने आईआईटी का रुख किया और बकौल सुरेश, आज वह सफलता की उसी सीढ़ी से क्षितिज नापने की कोशिश कर रहे हैं।

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