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वाघा में भारत पर नहीं था निशाना

सुशांत सरीन Updated Wed, 05 Nov 2014 08:28 PM IST
India was not on target in wagha
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ऐसा लगता है कि वाघा सीमा पर परेड क्षेत्र के नजदीक हुए आत्मघाती धमाके ने भारत के पाकिस्तान समर्थकों को रेडक्लिफ लाइन के उस पार के लोगों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावित किया है। इससे उद्वेलित होकर उन्होंने यह राय तक दे डाली कि यह घटना हालात बदलने वाली साबित हो सकती है और अब समय आ गया है कि आतंकवाद को जड़ से खत्म करने के लिए भारत और पाकिस्तान एक-दूसरे का सहयोग करें। मानो यही काफी नहीं था, ये आशंकाएं भी जता दी गईं कि पाकिस्तान को दहशतजदा करने वाला आतंकवाद भारतीय सीमा तक आ पहुंचा है और जल्द ही इसका असर यहां भी दिख सकता है। कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा कि हमलावर का असली निशाना तो भारत था, ताकि दोनों देशों के बीच हो रहे व्यापारिक और लोगों के बीच के संपर्क को तोड़ा जा सके, और शांति प्रक्रिया को धक्का पहुंचाया जा सके। इस भय को तब और बल मिला, जब इस धमाके की जिम्मेदारी लेने के कुछ घंटे के बाद आतंकी संगठन जमात-उल-अहरार (जेयूए) के प्रवक्ता ने 'कश्मीर और गुजरात' के नाम पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बदला लेने की धमकी दी! यह संगठन तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान से अलग हुआ धड़ा है।
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वाघा में हुए धमाके को मोदी को मिलने वाली जेहादी धमकियों से जोड़कर कुछ लोग गलत निष्कर्ष निकाल सकते हैं। ऐसे निष्कर्ष को सही मानने से बड़ी चूक हो सकती है, क्योंकि इससे भारत किसी गलत नीतिगत कदम की ओर बढ़ सकता है, जिससे जेहादी आतंकवाद की चुनौती और बढ़ सकती है। किसी को रत्ती भर भी यह संदेह नहीं होना चाहिए कि पाकिस्तान के भीतर हमला कर रहे आतंकी भारत के मित्र नहीं हैं। इनमें से कई लोग भारत को लक्ष्य करके ही जेहादी बने हैं। असल में, 9/11 के हमले के बाद जब पाकिस्तान ने अपना रुख बदला और जब वह अमेरिका का सहयोगी बन गया, तब ये भारत विरोधी जेहादी समूह अपने आका पाकिस्तान के ही खिलाफ हो गए। हालांकि लश्कर-ए-तैयबा और हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों ने पाकिस्तानी फौज की रहनुमाई मंजूर कर ली, जिससे उन्हें पाकिस्तान का संरक्षण और समर्थन मिलता रहा।

इसका मतलब है कि भविष्य में तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान और उससे अलग हुए धड़े भारत में हमले कर सकते हैं। हालांकि भारत में अब तक हुए अधिकांश हमलों को इस संगठन ने नहीं, बल्कि पाकिस्तान के छद्म गुटों ने अंजाम दिया है। दूसरे शब्दों में कहें, तो भारत और पाकिस्तान में होने वाले आतंकी हमलों में बुनियादी फर्क है। भारत में जहां पाकिस्तान प्रायोजित हमले होते हैं, वहीं पाकिस्तान में होने वाले हमले उसकी दशकों पुरानी नीति में आए बदलाव का नतीजा हैं। वास्तव में इंडियन मुजाहिदीन से जुड़े अनेक भारतीय जेहादियों ने टीटीपी-जेयूए और अल कायदा से गठजोड़ बना लिया है, जिनसे मिलने वाली धमकियों को भारत नजरंदाज नहीं कर सकता। मगर अभी भारत के लिए आतंकवाद से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौती पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी गुट ही हैं। वाघा पर हुए हमले के तुरंत बाद जेयूए की भारत को दी गई धमकी के पीछे संभवतः एक बड़ा कारण यह है कि वह पाकिस्तान के उस दुष्प्रचार को खारिज करना चाहता है कि वाघा के हमले को भारत ने अंजाम दिया। इस तरह वह अपने कैडर, दानदाताओं को यह संदेश देना चाहता है कि उसके लिए भारत भी पाकिस्तान की तरह दुश्मन है।

वाघा में हुए हमले का भारत के लिए सिर्फ यही मतलब है कि इसे भारतीय सीमा के नजदीक अंजाम दिया गया। इस जगह के चुनाव की एक वजह यह हो सकती है कि इससे सारी दुनिया का ध्यान हमले की ओर गया। हमलावरों के लिए 60 से अधिक लोगों की मौत सिर्फ एक आंकड़ा है। यदि हमले में एक या दो लोगों की मौत होती, तब भी उनका मकसद पूरा हो जाता। इस हमले को जेयूए या दूसरे गुटों की उत्तरी वजीरिस्तान और फाटा (केंद्र शासित कबायली क्षेत्र) में पाकिस्तानी फौज के हमलों की जवाबी कार्रवाई के रूप में भी देखा जा रहा है। इस हमले की जिम्मेदारी तीन गुटों ने ली है, जिससे लगता है कि इन तीनों ने मिलकर इसे अंजाम दिया हो, या फिर उन जेहादी गुटों में वर्चस्व स्थापित करने की होड़ हो।

इन संगठनों का भारत से कोई सीधा संपर्क नहीं दिखता। यही नहीं, भारत और पाकिस्तान के बीच अभी शांति प्रक्रिया भी नहीं चल रही है, जो इस हमले से प्रभावित होती। दोनों देशों के बीच लोगों का संपर्क भी उस स्तर का नहीं है, जिसे नुकसान पहुंचे और यह माना जाए कि इससे द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ा है। जहां तक द्विपक्षीय व्यापार की बात है, तो अभी यह सिर्फ दो अरब डॉलर का है, जो सिर्फ वाघा से नहीं होता। भारत का कुल विदेशी कारोबार तकरीबन 700 अरब डॉलर का है। इसका मतलब है कि इसमें पाकिस्तान से होने वाला कारोबार नगण्य है। दूसरी ओर पाकिस्तान भी भारत से होने वाले व्यापार पर निर्भर नहीं है। लिहाजा ऐसा नहीं है कि भारत से कारोबार बाधित होने से उसकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचे।

पाकिस्तानियों के मन में ऐसी बातें कूट-कूटकर भर दी गई हैं, जिनसे भारत और खासकर हिंदुओं के प्रति घृणा का भाव आतंकवाद या जेहादी गुटों की धमकियों से उपजे भय को कम कर देता है। पाकिस्तान का 'नापाक गठजोड़' यह मानता है कि भारत से रिश्ते सामान्य करने के लिए यदि वह कश्मीर पर अपना दावा छोड़ दे, तो उससे जो नुकसान होगा, उसकी तुलना में जेहादी आतंकवाद से होने वाला नुकसान कुछ भी नहीं है। पाकिस्तान जब तक भारत के प्रति बैर की नीति नहीं छोड़ देता, तब तक उससे आतंकवाद के खिलाफ सहयोग की उम्मीद नहीं की जा सकती और तब तक दोनों देशों के रिश्ते भी सामान्य नहीं हो सकते।

(लेखक विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के सीनियर फेलो हैं)
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