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अमेरिका की भारत को लुभाने की कोशिश, बन रहे ऐतिहासिक संबंध

Thu, 29 Oct 2020 02:28 AM IST
सुरेंद्र कुमार सुरेंद्र कुमार
सुरेंद्र कुमार Published by: सुरेंद्र कुमार Updated Thu, 29 Oct 2020 02:28 AM IST
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India USA historic tie and counter of china
अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और रक्षा मंत्री मार्क एस्पर के साथ एनएसए अजीत डोभाल। - फोटो : ANI

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और रक्षा मंत्री मार्क एस्पर ने भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ बीते दिनों दिल्ली में तीसरा मंत्री स्तरीय संवाद किया। हालांकि कोविड-19 के कारण निर्धारित बैठक स्थगित कर दी गई थी, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से मात्र एक हफ्ते पहले अमेरिका द्वारा इस वार्ता को आगे बढ़ाना हैरान करने वाला है। यदि व्हाइट हाउस में कोई बदलाव हो गया, तब क्या होगा? सामरिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस वार्ता में लिए गए फैसलों का हश्र ईरान के परमाणु समझौते जैसा नहीं होगा। भारत के साथ रिश्ते को वहां की दोनों पार्टियों का समर्थन है। अगला राष्ट्रपति चाहे जो भी बने, भारत के साथ रिश्तों में बदलाव नहीं होगा।


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इस मोड़ पर 2+2 वार्ता होने के कई संदेश हैं। राष्ट्रपति ट्रंप कोविड-19 संकट को ठीक से न संभाल पाने के चलते आलोचनाओं के केंद्र में हैं, जिससे अमेरिका में 2.30 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। अर्थव्यवस्था भारी मंदी में है और सबसे ज्यादा अमेरिकी युवाओं ने बेरोजगारी भत्ता के लिए पंजीकरण कराया है। अमेरिका और चीन के बीच चल रहा व्यापार युद्ध केवल चीन को ही नुकसान नहीं पहुंचा रहा है, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी क्षति पहुंचा रहा है। ट्रंप और पोम्पियो, दोनों चीन पर आक्रामकता और विस्तारवाद का आरोप लगाते रहे हैं और आसियान, दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों तथा भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया से चीन का मुकाबला करने के लिए हाथ मिलाने का आग्रह कर रहे हैं। हाल ही में टोक्यो में संपन्न क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक और ऑस्ट्रेलिया के साथ मालाबार अभ्यासों का आगामी आयोजन भी उस दिशा में एक प्रयास है। 

ट्रंप और मोदी के बीच व्यक्तिगत रिश्ते गर्मजोशी भरे हैं। व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हो पाने तथा टैरिफ, बौद्धिक संपदा अधिकारों, जीएसपी, बाजार पहुंच, एच 1बी तथा एल 1 वीजा से संबंधित मुद्दों का निपटारा न होने और रूस, ईरान तथा अफगानिस्तान, पाकिस्तान के घटनाक्रम को लेकर मतभेदों के बावजूद भारत और अमेरिका के रिश्ते बेहतर ही हुए हैं। बेका (बेसिक एक्सचेंज ऐंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर करने के साथ, जो अमेरिका और भारतीय सेना के बीच उच्च स्तरीय सैन्य प्रौद्योगिकी, रसद, एन्क्रिप्टेड सूचना और भू-स्थानिक नक्शे, उपग्रह छवियों आदि को साझा करने की सुविधा प्रदान करेगा, भारत ने सभी बेसिक फाउंडेशन कम्यूनिकेशन एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए हैं, जिन पर हस्ताक्षर करने में यूपीए सरकार संकोच कर रही थी। भारत ने अतीत के संकोच पर काबू पा लिया है और अब वह सैन्य रूप से अमेरिका के करीब आ गया है।

दोनों देशों ने 2016 में लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें आपूर्ति की मरम्मत और पुनःपूर्ति के लिए एक दूसरे के ठिकानों के उपयोग की व्यवस्था की गई है और 2018 में सीओएमसीएएसए (संचार और अनुकूलता सुरक्षा समझौते) पर हस्ताक्षर किए गए, जिसने अमेरिका से उच्च स्तरीय रक्षा प्रौद्योगिकियों की खरीद खातिर भारत के लिए दरवाजे खोले और दोनों सेनाओं के बीच सूचना साझा करने की क्षमता प्रदान की। जाहिर है, बेका पर हस्ताक्षर की संभावना ट्रंप की विदेश नीति की सफलता सूची में उनके प्रचार प्रबंधकों द्वारा भारतवंशियों का वोट हासिल करने के लिए जोड़ी गई। ट्रंप पहले से ही भारतीय अमेरिकियों की आबादी वाले राज्यों में रैलियों में मोदी के साथ अपनी तस्वीरों को प्रदर्शित कर रहे हैं। विडंबना यह है कि पिछले प्रेसिडेंसियल डिबेट के दौरान जलवायु परिवर्तन पर चर्चा करते हुए उन्होंने भारत को लेकर असंवेदनशील टिप्पणी की, जिससे उन्हें हजारों वोट का नुकसान हो सकता है। उनके डेमोक्रेटिक प्रतिद्वंद्वी जो बिडेन ने पहले ही कहा कि अपने मित्रों को इस तरह से संबोधित नहीं किया जाता है।

भारत को अमेरिकी रक्षा निर्यात 20 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। कथित तौर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने समकक्ष से संयुक्त अनुसंधान को प्रोत्साहित करने और अमेरिकी रक्षा उत्पादन कंपनियों को भारत और तीसरी दुनिया के देशों के लिए भारत में रक्षा उपकरणों का उत्पादन करने के लिए कहा है। पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ गतिरोध के बीच पोम्पियो द्वारा चीन की तीखी आलोचना भारतीयों को अच्छी लगी होगी। जैसी कि उम्मीद थी, इसने चीन को झकझोर दिया। उसने तीखी प्रतिक्रिया जताते हुए अमेरिका पर 'चीन और क्षेत्रीय देशों के बीच कलह का बीज बोने के साथ क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को नुकसान पहुंचाने' का आरोप लगाया है। 

पोम्पियो ने कहा,'मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि भारत और अमेरिका सिर्फ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के ही नहीं, बल्कि सभी खतरों के खिलाफ सहयोग को मजबूत करने के लिए कदम उठा रहे हैं। हमने गलवां घाटी में शहीद होने वाले जवानों के प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया। अमेरिका भारत की संप्रभुता और उसकी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए भारत के साथ खड़ा रहेगा। हम भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का समर्थन करते हैं: अमेरिका और भारत हमारे लोकतंत्रों और साझा मूल्यों की रक्षा के लिए बेहतर गठबंधन है।' 

अमेरिकी रक्षा मंत्री मार्क एस्पर का स्वर भी भारत के प्रति काफी सकारात्मक था। वहीं भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा, 'ऐसे समय में जब कानून-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बनाए रखना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, भारत और अमेरिका की रक्षा और विदेश नीति में नजदीकी का एक बड़ा महत्व है। जहां तक क्षेत्रीय और वैश्विक चुनौतियों की बात है, तो हम एक वास्तविक बदलाव ला सकते हैं, चाहे वह क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने, समुद्री क्षेत्र में जागरूकता बढ़ाने, आतंकवाद का मुकाबला करने या समृद्धि सुनिश्चित करने की बात हो।' 

अमेरिका न तो हमारी धरती पर कदम रखेगा और न ही हमारी तरफ से लड़ेगा, लेकिन पोम्पियो की घोषणा चीन को एलएसी पर ताजा विवाद पैदा करने से जरूर रोकेगी। भारत नाटो की तरह अमेरिका का रणनीतिक सहयोगी नहीं बन पाया है, हालांकि सैन्य सहयोग और खुफिया जानकारी साझा करने के वह काफी करीब है। रणनीतिक साझेदार के रूप में भारत बेहतर स्थिति में है। वह अपनी पारंपरिक रणनीतिक स्वायत्तता बरकरार रखे हुए है। आज, भारत और अमेरिका पहले से कहीं ज्यादा एक दूसरे के करीब हैं। 

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