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भारत-अमेरिका संबंध भी कसौटी पर, बता रहे हैं सुरेंद्र कुमार
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी पत्नी मेलानिया ट्रंप।
- फोटो : PTI
कुछ प्रमुख मुद्दों पर गंभीर मतभेदों के बावजूद भारत-अमेरिका संबंध अपने सबसे बेहतर दौर में है और मान्यताओं के परे चला गया है। चीन से अपमानजनक पराजय का सामना करते हुए नवंबर, 1962 में जब नेहरू ने अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी से सुपरसोनिक लड़ाकू विमानों के 12 दस्तों और बी-47 बमवर्षक विमानों के दो दस्तों सहित रणनीतिक सहयोग का अनुरोध किया था, तो उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान पर दबाव बनाया कि वह भारत की मुश्किलों का फायदा न उठाए और कश्मीर में मोर्चा न खोले।
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इस बात की संभावना है कि भारत को अमेरिका और ब्रिटेन का सहयोग मिला होगा और 21 नवंबर, 1962 को चीन के एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा के पीछे भारत का पक्ष लेने वाले इन दोनों देशों की भूमिका हो। भारत और अमेरिका के बीच 58 वर्ष पहले के इस महत्वपूर्ण रणनीतिक और सैन्य सहयोग को आज याद किया जा सकता है।
हालांकि 1971 में जब भारत पूर्वी पाकिस्तान के एक करोड़ से अधिक शरणार्थियों के अप्रत्याशित दबाव का सामना कर रहा था, तब अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने बड़ी बेशर्मी से पाकिस्तानी सैन्य तानाशाह याह्या खान का समर्थन किया था और भारत को धमकाने के लिए बंगाल की खाड़ी में सातवां बेड़ा भेज दिया था। मई, 1974 में पहले परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका ने भारत पर कड़े प्रतिबंध लाद दिए थे।
मार्च, 2000 में बिल क्लिटंन 22 साल के अंतराल के बाद भारत आने वाले पहले अमेरिकी डेमोक्रेट राष्ट्रपति थे और उन्होंने एक ऐसी प्रक्रिया शुरू की, जिसे बाद में अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वाभाविक साझेदारी करार दिया था।
वहीं रिपब्लिकन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में साहसिक और ऐतिहासिक असैन्य परमाणु समझौते पर 2005 में हस्ताक्षर हुआ, जो दोनों देशों के बीच अब तक का सबसे बड़ा मील का पत्थर है।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, 'आज भारत-अमेरिका द्विपक्षीय सहयोग व्यापक और बहुक्षेत्रीय है, जिसमें व्यापार और निवेश, रक्षा और सुरक्षा, शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा, उच्च प्रौद्योगिकी, असैनिक परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और अनुप्रयोग, स्वच्छ ऊर्जा, पर्यावरण, कृषि और स्वास्थ्य शामिल हैं।'
वस्तुओं और सेवाओं में द्विपक्षीय व्यापार 2018 तक 143 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जो अमेरिका को सबसे बड़ा व्यापार भागीदार बनाता है। लेकिन गंभीर वार्ताओं के बावजूद दोनों देश व्यापार समझौता करने में विफल रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत से जीएसपी का दर्जा वापस ले लिया और कई भारतीय उत्पादों पर दंडात्मक शुल्क लगा दिया।
अमेरिकी विदेश मंत्रालय के शब्दों में, 'अमेरिका और भारत ने व्यापार, निवेश और कनेक्टिविटी के माध्यम से वैश्विक सुरक्षा, स्थिरता और आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा देने में दिलचस्पी साझा की है। अमेरिका भारत के अग्रणी वैश्विक शक्ति के रूप में उभरने का समर्थन करता है और यह सुनिश्चित करने में अपना महत्वपूर्ण भागीदार मानता है कि एशिया-प्रशांत शांति, स्थिरता और बढ़ती समृद्धि का क्षेत्र है।'
मई से अगस्त, 2020 के बीच भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लगातार तनाव बना हुआ है। सीमा पर आक्रामकता के लिए चीन को दोषी ठहराने में अमेरिका बहुत ईमानदार रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने हाल ही में एक संवाददाता सम्मेलन कर स्पष्ट कहा कि 'चीनी सेना ने भारत के साथ सीमा तनाव बढ़ा दिया है: चीनी ने अविश्वसनीय रूप से आक्रामक कार्रवाई की। भारतीयों ने उस पर प्रतिक्रिया देने की पूरी कोशिश की है।'
कई विश्लेषकों का मानना है कि चीन-अमेरिका के खराब रिश्ते, ट्रंप का टैरिफ वार, जिसने चीनी अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया, कोविड-19 फैलाने के लिए चीन के खिलाफ खुला आरोप, साइबर जासूसी के लिए चीनी तकनीकी दिग्गज कंपनी हुवेई पर प्रतिबंध और चीन में मानवाधिकार के लिए अमेरिका द्वारा हांगकांग के कई महत्वपूर्ण अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाना, हटसन में चीन के वाणिज्य दूतावास को बंद करना तथा चेंगदू में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास को बंद करने जैसे घटनाक्रमों का भारत-अमेरिकी रिश्ते में प्रगाढ़ता बढ़ाने में योगदान है। हालांकि आईएएफए चर्चा में कार्नेगी स्थित टाटा चेयर के एसले टेलिस ने स्पष्ट कहा कि अमेरिका को मुख्य समस्या चीन के साथ है, भारत तो राष्ट्रपति ट्रंप के लिए बस एक उपकरण भर है।
पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन के अनुसार, 'जबसे ट्रंप ने पदभार संभाला है, वाशिंगटन का नई दिल्ली के साथ संबंध मजबूत होता गया है। भारत-अमेरिकी रक्षा और खुफिया सहयोग एक नई ऊंचाई पर पहुंच गया है और दोनों देशों ने नए समझौतों में समुद्री सुरक्षा पर काम किया है।'
कमला हैरिस को उप-राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार के रूप में चुनकर जॉय बिडेन अपराजेय दिख रहे हैं। हालांकि भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं की संख्या मात्र दस लाख है, लेकिन ट्रंप और बिडेन, दोनों उन्हें लुभाने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि प्रमुख प्रांतों में वे फर्क ला सकते है। बिडेन-हैरिस की जोड़ी की संभावनाएं भारत में कुछ चिंताओं का कारण बन रही हैं।
हैरिस अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश के रूप में पुनर्गठन, नागरिकता संशोधन अधिनियम, अल्पसंख्यकों की स्थिति और भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड को लेकर आलोचनात्मक रही हैं।
बिडेन ने भी इनमें से कुछ चीजों पर चिंता जताई। लेकिन उन्होंने स्पष्ट कहा कि अगर वह राष्ट्रपति चुने जाते हैं, तो वह सीमा पर खतरों का सामना करते हुए भारत के साथ खड़े रहेंगे और एच-1बी वीजा में सुधार करेंगे तथा ग्रीन कार्ड कोटा को खत्म करने की दिशा में काम करेंगे, जिसको लेकर भारतीयों और भारतीय-अमेरिकियों के बीच चिंता है।
उम्मीद है कि अगर वे चुने जाते हैं, तो चीनी खतरे के सामने अमेरिका के व्यापक हित बिडेन-हैरिस को भारत के महत्व का एहसास कराएंगे तथा वे अपने पूर्ववर्तियों द्वारा निर्मित द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाएंगे।