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चुनौतियां अभी बाकी हैं: भारत-अमेरिका के बीच संबंधों पर बड़े दावे, लेकिन मतभेदों को लेकर खड़े हैं कई सवाल

Wed, 24 Jun 2026 07:00 AM IST
सुरेंद्र कुमार सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजनयिक
सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजनयिक Published by: सुरेंद्र कुमार Updated Wed, 24 Jun 2026 07:00 AM IST
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सार
जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान 16 महीने की तल्खियों के बाद मोदी व ट्रंप के बीच दिखी गर्मजोशी सुर्खी तो बनी, पर अपने पीछे कई सवाल भी छोड़ गई।
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पीएम मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : ANI

विस्तार

फ्रांस के एवियन-लेस-बेंस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की 16 महीने बाद मुलाकात हुई। इस दौरान कई ऐसे घटनाक्रम हुए, जिनकी वजह से भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव और दूरी बढ़ी। इनमें भारत-पाकिस्तान युद्धविराम को लेकर दोनों देशों के अलग-अलग दावे प्रमुख रहे। तनाव तब और बढ़ा, जब अमेरिका ने रूस से तेल आयात पर भारत पर 25 फीसदी दंडात्मक शुल्क लगाया। साथ ही, भारत पर यूक्रेन युद्ध में रूस को वित्तीय मदद देने का आरोप भी लगाया गया, जिसे भारत ने अनुचित बताया था।


व्यापार समझौते में अपनी शर्तें मनवाने के लिए अमेरिका का दबाव, भारत से लौट रहे एक ईरानी जहाज को रोके जाने की घटना, भारत को ‘नरक’ (हेल होल) कहना, ‘माउंट सेटे बेलो’ जहाज पर हुए हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत, और समुद्री नाकेबंदी के नियमों से जुड़ी भारत की आपत्तियों को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो द्वारा खारिज किया जाना भी विवाद के मुख्य कारणों में रहे। दोनों नेताओं की मुलाकात में सब कुछ बहुत अच्छा लग रहा था, पर क्या पिछले 16 महीनों में जो कुछ हुआ, वह कोई बुरा सपना था? शायद नहीं! इसीलिए, दोनों नेता अपने-अपने समर्थकों को नाराज किए बिना रिश्तों को पटरी पर लाने के लिए प्रतिबद्ध थे।


16 जून को आयोजित नेताओं के आउटरीच सत्र में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कई महत्वपूर्ण सुझाव रखे। ये सुझाव केवल जी-7 देशों के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के अन्य नेताओं, विशेष रूप से अमेरिका के लिए भी अहम संदेश लेकर आए, जो ट्रंप तक जरूर पहुंचा होगा। यह देश में मोदी की आलोचना करने वालों को भी जवाब था।

प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा कि वैश्विक कानूनों का सम्मान न करना वैश्विक एकजुटता और आपसी विश्वास को कमजोर करने वाली सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। उन्होंने यह भी कहा कि व्यापार और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल संकीर्ण राजनीतिक या आर्थिक हितों के लिए हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने विवादों को सुलझाने के लिए बातचीत व कूटनीति को प्राथमिकता देने की बात दोहराई। साथ ही, ‘वैश्विक दक्षिण’ को केंद्र में रखकर कई नई पहलों का प्रस्ताव भी रखा। इनका उद्देश्य सम्मानजनक साझेदारी और साझा प्रगति को बढ़ावा देना है। इन्हीं प्रस्तावों में एक है इंपैक्ट (इंटरनेशनल मोबिलाइजेशन फॉर पार्टनरशिप इन कनेक्टिविटी एंड ट्रेड)। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (आईएमईसी) की तर्ज पर बनी इस पहल का मकसद बुनियादी ढांचे और व्यापार के निर्माण के लिए अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और प्रशांत द्वीपों में संपर्क बनाना है। दूसरी पहल है ग्लोबल स्किल पार्टनरशिप। इसका मकसद विकासशील देशों के युवाओं की स्किल मैपिंग व प्रशिक्षण को सरल बनाकर उन्हें वृद्ध होती आबादी वाले विकसित देशों में रोजगार के अवसरों से जोड़ना है। ‘शॉक-एब्जॉर्प्शन सपोर्ट मैकेनिज्म’ कमजोर अर्थव्यवस्थाओं को आपूर्ति शृंखला में रुकावटों से बचाने के लिए एक वित्तीय ढांचे का प्रस्ताव देता है।

प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने उनकी खुलकर प्रशंसा की। हालांकि, तारीफों की बारिश से दोनों देशों के बीच मौजूद मतभेद और चुनौतियां खत्म नहीं हो जातीं। अब नजर इस बात पर रहेगी कि ट्रंप का जी-2 आइडिया कैसे आगे बढ़ता है। अमेरिकी सैन्य कमान के लिए पुराने नाम ‘एशियन पैसिफिक कमांड’ को फिर से अपनाने के संकेत इशारा करते हैं कि भारत का महत्व कम हो रहा है और चीन-विरोधी बयानबाजी धीमी पड़ रही है। इसका असर क्वाड पर भी पड़ने की पूरी संभावना है। इसके अलावा, अंतरिम व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर होने से पहले, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि  द्वारा सेक्शन 301 के तहत जांच किए जाने वाले देशों की सूची में भारत को शामिल करना अच्छा संकेत नहीं है। दूसरी ओर, यदि होर्मुज जलडमरूमध्य खुला रहता है और वहां किसी प्रकार की नाकेबंदी नहीं होती, तो पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए सबसे स्वाभाविक और व्यावहारिक आपूर्तिकर्ता बना रहेगा।

इसके बावजूद, अमेरिका भारत पर अपने यहां से ऊर्जा आयात बढ़ाने का दबाव बना सकता है। यही बात हमारे रक्षा आयात (टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के बिना) और नागरिक विमानन क्षेत्र में भी देखने को मिल सकती है। साथ ही, भारतीय कंपनियों द्वारा अमेरिका में बढ़ाए गए निवेश को देखते हुए बेहतर एच-1बी वीजा व्यवस्था की जरूरत है।
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