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चीन के दोहरेपन से क्यों संभलकर रहना होगा हमें, बता रहे हैं हर्ष कक्कड़
Mon, 07 Sep 2020 01:29 AM IST
हर्ष कक्कड़
हर्ष कक्कड़
हर्ष कक्कड़
Published by: हर्ष कक्कड़
Updated Mon, 07 Sep 2020 01:29 AM IST
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LAC
लद्दाख में गतिरोध चीनियों के पक्ष में जा रहा था, इसलिए अब तक बातचीत की प्रक्रिया धीरे चल रही थी। बातचीत के लिए भारत के अनुरोध का न सिर्फ चीन अपने ढंग से जवाब दे रहा था, बल्कि वार्ता का नतीजा भी नहीं निकला था। चीनियों ने कदाचित मान लिया था कि माहौल उनके पक्ष में है, भारत रक्षात्मक है और एक बफर जोन बनने से शारीरिक संघर्ष की संभावना लगभग न के बराबर है। गलवां घाटी का डर, जिसने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के मिथक को तोड़ दिया था, पीछे छूट चुका था। वे आश्वस्त थे कि उन्होंने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया है और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की सीमा को अपने लाभ के लिए आगे बढ़ा सकते हैं।
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लेकिन अगस्त के अंत में भारत ने जवाबी हमले के जरिये चीन को हैरान करते हुए सुनियोजित एवं समन्वित ढंग से उसके प्रभुत्व के खाली इलाके पर हमला किया, तो चीनियों की नींद उड़ गई। एक ही झटके में भारत ने माहौल को अपने पक्ष में कर लिया। चीनियों ने महसूस किया कि उन्हें परास्त किया गया है और उनकी ओर से कोई भी कदम भारतीय निगरानी और वर्चस्व के तहत होगा। तिब्बती शरणार्थी वार्डों में शामिल स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (विकास बटालियन) को तैनात करना एक और मास्टरस्ट्रोक था। इसने संदेश दिया कि भारत ने अपनी 'एक चीन नीति' त्याग दी है। चीन ने यह दावा करते हुए प्रतिक्रिया दी कि भारत ने एलएसी का उल्लंघन किया था, जिसे उसने खुद एक दिन पहले तक स्वीकारने से इन्कार कर दिया था और
भारतीयों की वापसी की मांग की थी। चीन की चोट और बढ़ाने तथा उसके सॉफ्टवेयर उद्योग पर असर डालने के लिए भारत ने फिर से कई चीनी एप पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। नतीजतन अचानक चीन से हर स्तर पर बातचीत की मांग की गई।
ब्रिगेड कमांडर्स लगभग एक हफ्ते तक लगातार बिना किसी नतीजे के मिलते रहे, क्योंकि भारत ने चीनी मांगों को स्वीकारने से इन्कार कर दिया था। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ने अपना दुष्प्रचार लगातार जारी रखा। चीन ने दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों के बीच बैठक का अनुरोध भी किया, जो शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में मॉस्को में हुआ। चीन की तरफ से यह तीसरा अनुरोध वर्चस्व वाली ऊंचाइयों पर कब्जा करने की भारत की आगे बढ़कर की गई कार्रवाई के बाद किया गया था। जाहिर है, चीन समाधान चाह रहा था। दोनों पक्षों ने एक दूसरे पर एलएसी के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए बयान जारी किए। चीनी विदेश मंत्री ने बैठक के बाद अपनी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि 'भारत और चीन के बीच सीमा पर मौजूदा तनाव का सच और कारण स्पष्ट है, और यह जिम्मेदारी पूरी तरह से भारत की है।
चीन अपनी सीमा खो नहीं सकता, और चीनी सेना राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने में सक्षम है।' इसके विपरीत भारत का बयान था कि 'बड़ी संख्या में चीनी सैनिकों की कार्रवाई उनके आक्रामक व्यवहार और एकतरफा यथास्थिति को बदलने का प्रयास द्विपक्षीय समझौतों का उल्लंघन था। भारतीय सैनिकों ने हमेशा सीमा प्रबंधन के लिए जिम्मेदार दृष्टिकोण अपनाया है, पर भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के हमारे दृढ़ संकल्प के बारे में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।' जैसी कि अपेक्षा थी, दोनों रक्षा मंत्रियों के बीच बैठक बेनतीजा रही। दोनों पक्ष एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते रहे। ढाई घंटे से ज्यादा समय तक चली इस बैठक में सिर्फ अगले स्तर की वार्ता के लिए मंच तैयार किया गया, जो मॉस्को में आगामी 10 सितंबर को विदेश मंत्रियों के बीच होगा।
भारत अप्रैल 2020 की स्थिति की बहाली और क्षेत्र से अतिरिक्त सैनिकों की वापसी की मांग करता है, जबकि चीन चाहता है कि भारत एलएसी के उसके रुख को स्वीकार करे और हाल ही में कब्जे वाले इलाके से पीछे हट जाए। इस समय चीनी रवैए के कारण दोनों देशों के बीच विश्वास की भारी कमी है। यदि चीन भारत के प्रस्ताव को स्वीकार कर अप्रैल, 2020 की अपनी स्थिति पर वापस लौटता है, तो इससे उसकी छवि को नुकसान पहुंचेगा और पीएलए की वैश्विक प्रतिष्ठा प्रभावित होगी। यदि वर्तमान स्थिति जारी रहती है, तो उसकी स्थिति और गतिविधियां भारतीय निगरानी और वर्चस्व के अधीन होंगी। मोल्डो स्थित उसके मुख्य शिविर को निशाना बनाया जा सकता है। भारतीय सेनाओं को खदेड़ने के लिए किसी भी सैन्य कार्रवाई से चीनी जीवन को भारी नुकसान होगा, क्योंकि वहां भारत का दबदबा है। भारतीय सेना चीनी दुस्साहस का सामना करने के लिए तैयार है।
भारत को यह भरोसा नहीं है कि चीन स्वीकृत समझौतों का पालन करेगा। चीन ने लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की वार्ता में बनी सहमति को मानने से इन्कार कर दिया है। भारत को चीन के इरादे पर संदेह है और वह इसको लेकर भी अनिश्चित है कि चीन ऊंचाई पर कब्जे की कोशिश करेगा, जिस पर अभी भारत का कब्जा है। वर्ष 1965 में सिक्किम के जेलेप ला में चीन ने ऐसा किया था और दोकलम में वह अपने क्षेत्र में लगातार बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहा है। ऐसी गतिविधियां भारत के लिए समस्या पैदा करेंगी। इसके अलावा चीन आगे भी एलएसी का उल्लंघन कर सकता है। इसका सबसे अच्छा समाधान है लद्दाख में एलएसी सीमा का निर्धारण, पर यह चीन को स्वीकार्य नहीं हो सकता, क्योंकि यह उसे उस क्षेत्र में दुस्साहस करने
से रोकेगा।
दूसरा समाधान यह हो सकता है कि जब तक सीमा समझौता नहीं होता, तब तक यथास्थिति बरकरार रखी जाए। ऐसे में दोनों सेनाएं एक-दूसरे से दूरी बनाए रखेंगी। इससे दोनों देश प्रभावित होंगे, क्योंकि लद्दाख में लंबे समय तक भारी संख्या में सैन्य बल को बनाए रखना होगा। यह फिर से चीन को अस्वीकार्य हो सकता है, क्योंकि वैसे में उसकी चौकियां चौबीसों घंटे भारत की निगरानी में रहेंगी। मौजूदा संकट का समाधान कैसे होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों विदेश मंत्री किस तरह से वार्ता करते हुए एक सौहार्दपूर्ण समाधान तक पहुंचते हैं। ऐसे में, भारतीय राजनयिकों को सावधान रहना होगा कि वे त्वरित समाधान की तलाश में मौजूदा सैन्य बढ़त को खोने न दें।