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जॉनसन की जीत में भारत का महत्व
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ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन
- फोटो : पीटीआई
ब्रिटेन के आम चुनाव में बोरिस जॉनसन के नेतृत्व में कंजरवेटिव पार्टी की ऐतिहासिक विजय ने आम ब्रिटिश नागरिकों के साथ वहां नजर रखने वाले भारतीयों को भी प्रसन्न किया है। कंजरवेटिव ने मार्गरेट थैचर के बाद सबसे बड़ी जीत हासिल की, वहीं लेबर पार्टी की इतनी बड़ी पराजय हुई कि इसके नेता जेरेमी कॉर्बिन ने स्वयं ऐलान कर दिया कि अब वह पार्टी का नेतृत्व नहीं करेंगे।
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भारतीयों के लिए यह महत्वपूर्ण एवं प्रसन्नता का कारण इसलिए नहीं है कि इस बार रिकॉर्ड संख्या में भारतीय जीते। वस्तुतः भारतीयों के अंदर कॉर्बिन को लेकर इसलिए नाराजगी थी कि उन्होंने कश्मीर पर खुलकर भारत विरोधी रुख अपनाया था। उन्होंने कहा था कि भारत को वहां भय की स्थिति समाप्त करनी चाहिए, हिंसा रोकनी चाहिए तथा कश्मीर के लोगों को खुद का फैसला करने देना चाहिए। पूरे चुनाव में पाकिस्तानी मूल के लोगों का मत पाने के लिए कॉर्बिन और उनके साथी नेताओं ने इसे मुद्दा बनाए रखा। यही नहीं, अनुच्छेद 370 हटाने के विरोध में भारतीय उच्चायोग पर पाकिस्तानियों के हिंसक प्रदर्शनों को लेबर पार्टी ने पूरा समर्थन दिया। वहीं ब्रिटेन के भारतीय समुदाय ने कंजरवेटिव पार्टी को समर्थन दिया। कॉर्बिन के नेतृत्व में लेबर पार्टी ने मुस्लिमों का मत पाने के लिए उनका सबसे बड़ा हितैषी साबित करने की कोशिश की और इसमें वह इतना आगे निकल गए कि आम ब्रिटिश को देश के सांप्रदायिक आधार पर राजनीतिक विभाजन की गंध आने लगी। इसके विपरीत जॉनसन भारतीयों के मंदिरों में गए, पंडितों की बताई विधियों से अर्चना की। कहने का तात्पर्य यह कि ब्रिटेन का चुनाव ब्रेग्जिट यानी यूरोपीय संघ से अलग होने के मुख्य मुद्दे पर केंद्रित अवश्य था, लेकिन इसका आयाम विस्तृत हो गया था।
ब्रिटेन में यह पांच साल में तीसरा आम चुनाव तो था ही, 100 साल में यह पहली बार है, जब चुनाव दिसंबर में हुए। ब्रेग्जिट पर गतिरोध के चलते करीब ढाई साल पहले चुनाव कराने पड़े। जॉनसन ने कंजरवेटिव पार्टी को बहुमत दिलाने और ब्रेग्जिट को लेकर हाउस ऑफ कॉमन्स में गतिरोध तोड़ने की कवायद के तहत मध्यावधि चुनाव की घोषणा की थी। मार्क्सवाद की रोमांटिक कल्पना करने वाले कॉर्बिन की पार्टी को यह विचार करना होगा कि आखिर उत्तरी इंग्लैंड के औद्योगिक क्षेत्र से लोगों ने उन्हें क्यों नकारा है? रोदर वैली संसदीय क्षेत्र में पिछले सौ साल में लेबर पार्टी हारी नहीं थी।
लेबर पार्टी के अध्यक्ष इयान लेवेरी ने कहा है कि ब्रेग्जिट के लिए दूसरी बार जनमत संग्रह का प्रस्ताव देकर उनकी पार्टी ने गलती की। किंतु यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कॉर्बिन ने जेहादी आतंकवाद और इस्लामिक कट्टरता के विरुद्ध न बोलकर लोगों में यह आशंका पैदा कर दी थी कि वह इसे न्यायसंगत ठहरा रहे हैं। दूसरी ओर कंजरवेटिव पार्टी ने इस्लामोफोबिया निष्प्रभावी करने पर जोर दिया। पिछले कई वर्षों से इस्लामी कट्टरता का सामना कर रही ब्रिटिश जनता का उसे समर्थन मिला। इस तरह कई मायनों में यह दो विचारधाराओं के बीच का भी चुनाव था।
लंदन के मेयर के रूप में अपने दो कार्यकाल में जॉनसन ने जहां जरूरत पड़ी लेबर पार्टी से बिना हिचक समर्थन लिया। अपनी पार्टी में भी वह प्रतिद्वंद्वियों को पूरा सम्मान देते हैं। उनका यह चरित्र बताता है कि ब्रिटेन की एकता को कायम रखने में वह सबका साथ लेंगे। इस विजय से इस्लामी कट्टरपंथियों तथा पाकिस्तान मूल के भारत विरोधियों को निस्संदेह आघात लगा है। इसका असर आने वाले समय में दिखेगा। कुल मिलाकर यह ब्रिटेन के लिए, यूरोप के लिए, दुनिया के लिए एक नए दौर की शुरुआत है और भारत के लिए इसके निहितार्थ महत्वपूर्ण हैं।