दक्षिण कोरिया से भारत की दोस्ती

जी यिओन जुंग Updated Thu, 16 Nov 2017 06:06 PM IST
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पिछले कुछ महीनों के राजनीतिक घटनाक्रम से भारत और दक्षिण कोरिया को एशिया में अपने सुरक्षा हितों को साझा करने का मौका मिला है। दक्षिण कोरिया का राष्ट्रपति बनने के बाद मून जे इन ने संस्कृति, खेल और पर्यटन मंत्री चुंग दोंग चे को विशेष दूत बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने के लिए भेजा था। चुंग दोंग चे ने मोदी से मुलाकात कर मून का संदेश उन तक पहुंचाया कि उनके प्रशासन ने भारत को अमेरिका, रूस, चीन और जापान जैसा दर्जा दिया है।
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मून का यह संदेश सार्वजनिक रूप से भारत के प्रति जताई गई सद्भावना की तरह देखा गया। इसका इसलिए महत्व है, क्योंकि अमेरिका ने उसके क्षेत्र में मिसाइलों और रडार की तैनाती की है, जिससे चीन के साथ उसके रिश्ते तल्ख हो गए हैं। टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस (थाड) की तैनाती के कारण विगत दो वर्षों से दक्षिण कोरिया और चीन के द्विपक्षीय संबंधों पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। हालांकि अक्टूबर में दोनों देशों में तनाव कम करने को लेकर सहमति बनी, लेकिन जनता और बुद्धिजीवी दोनों ही आश्वस्त नहीं हैं कि इस मौजूदा तनाव का बीजिंग और सियोल के रिश्तों पर नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।
दक्षिण कोरिया के नजरिये से देखें, तो भारत और चीन के बीच हाल के तनाव ने दक्षिण कोरिया और भारत को इस क्षेत्र की स्थिरता के मद्देनजर सहयोग का मौका दिया है। दोनों देशों की करीबी की एक वजह यह भी है कि जहां सियोल कोरिया प्रायद्वीप के अपने परमाणु संपन्न पड़ोसी से परेशान है, वहीं भारत के लिए पाकिस्तान ऐसी चिंता पैदा करता है। उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार विकसित करने के कार्यक्रम और परमाणु मिसाइलों के परीक्षण से दक्षिण कोरिया पर दबाव बढ़ रहा है। हालांकि अमेरिकी गठबंधन, जिसमें दक्षिण कोरिया और जापान भी शामिल है, ने उत्तर कोरिया पर अपने परमाणु कार्यक्रम पर अंकुश लगाने का दबाव बनाया है; इसके बावजूद भड़काने वाली गतिविधियां जारी हैं और इसके सभी पक्षों के बीच पारंपरिक हथियारों की होड़ भी जारी है। इसीलिए दक्षिण कोरिया के रणनीतिक आकलन से ऐसा लगता है कि वह आसन्न क्षेत्रीय मुद्दों पर गठबंधन से बाहर भी कूटनीतिक पहल कर रहा है। इस लिहाज से मून प्रशासन का भारत से संपर्क वहां की पिछली सरकारों की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय कदम लगता है। यह इस उत्कट आशावाद से उपजा लगता है, जिसमें उम्मीद है कि नई दिल्ली से रिश्ते की प्रगाढ़ता से वैश्विक और क्षेत्रीय रणनीतिक नियोजन में दोनों देशों के हित जुड़े होंगे। इसी वर्ष मध्य जून में भारत के रक्षा और वित्त मंत्री अरुण जेटली की सियोल यात्रा के दौरान दक्षिण कोरिया ने भारत के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया था। भारत के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन की जुलाई में हुई यात्रा के दौरान भी सियोल ने दिल्ली के साथ रणनीतिक और सैन्य संबंधों की मजबूती में गहरी रुचि दिखाई थी।
 
मून प्रशासन की इस पहल पर मोदी सरकार ने भी सकारात्मक रुख दिखाया है। इस वर्ष की शुरुआत में भारत ने उत्तर कोरिया के प्रति अपनी बेरुखी व्यक्त की थी। भारत ने संयुक्त राष्ट्र की इस पहल का समर्थन किया है कि उत्तर कोरिया के साथ मानवीय सहायता को छोड़कर कोई और सहयोग न किया जाए। भारत-दक्षिण कोरिया के मजबूत होते संबंध से एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका-जापान की अगुआई वाले बहुस्तरीय सुरक्षा ढांचे को मजबूती मिलेगी, जिसका प्राथमिक लक्ष्य चीन और उत्तर कोरिया पर अंकुश लगाना है।

-लेखिका हैनकुक यूनिवर्सिटी में व्याख्याता हैं
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