भारत के विकास की क्षमता

अदनान नसीमुल्लाह Updated Sun, 17 Jun 2018 07:04 PM IST
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चार वर्ष पूर्व नरेंद्र मोदी को मिली चुनावी जीत से भारतीय अर्थव्यवस्था के अनेक पर्यवेक्षक भारी उत्साहित थे। अनेक लोगों ने उम्मीद जताई थी कि जिस शख्स ने गुजरात में आर्थिक चमत्कार पैदा कर दिया आखिरकार भारत की कमान उसके हाथ में होगी और घरेलू और विदेशी निवेश को बढ़ावा मिलेगा, जिससे बाजार की पूरी क्षमता का उपयोग हो सकेगा और भारत में आर्थिक बदलाव आएगा। चार वर्ष बाद ऐसा लगता है कि मोदी के प्रशासन में सुधार की परियोजना थम-सी गई है। सुधार संबंधी कुछ चमकदार नीतियां, मसलन नोटबंदी और नए सेल्स टैक्स वाली व्यवस्था (जीएसटी), सांकेतिक अधिक साबित हुई हैं। यहां तक कि इनकी वजह से विकास की गति मंद तक पड़ी है।
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मोदी की प्रतिबद्ध और परिश्रमी नेता की अर्जित प्रतिष्ठा और संसद में भारी बहुमत के बावजूद ऐसे प्रमाण कुछ कम ही दिखते हैं, जिनसे पता चले कि उनके नेतृत्व में भारत सरकार अर्थव्यवस्था के संचालन में अधिक प्रभावी हो गई हो। द इकॉनॉमिस्ट ने टिप्पणी की है, मोदी सुधारक के बजाय तेजतर्रार राष्ट्रवादी अधिक लगते हैं। अनेक राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों और 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा का चुनावी अभियान आर्थिक बदलाव के वायदे के बजाय तेजी से जातीय राष्ट्रवाद की ओर मुड़ता दिख रहा है।
सुधार और अंततः भारतीय अर्थव्यवस्था में अपेक्षित बदलाव न दिखने के पीछे अकेले मोदी जिम्मेदार नहीं हैं। दरअसल भारतीय राज्य ने अर्थव्यवस्था में व्यापक ढांचागत बदलाव लाने के लिए जो तरीके अपनाए यह उसका परिणाम है, जिसकी शुरुआत 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के साथ इनके जुड़ाव के कारण हो गई थी। इस बदलाव की प्रकृति को समझने और किस तरह इसने समकालीन भारत में संस्थागत सुधार के जरिये आर्थिक बदलाव की असंभाव्यता को बढ़ाया है, हमें नेहरू युग में आर्थिक शासन (इकॉनामिक गवर्नेंस) का फिर से मूल्यांकन करना चाहिए, जब राज्य का हस्तक्षेप कहीं अधिक हुआ करता था।
1947 में स्वंत्रता प्राप्ति के समय भारत एक गरीब और व्यापक रूप से कृषि पर निर्भर समाज था। राष्ट्रवादी नेताओं ने ऐसी नीतियों के प्रभावी अमल की शिनाख्त की, जो तेज आर्थिक विकास लाने में, पूंजी और श्रम को कम उत्पादकता वाली आर्थिक गतिविधियों से उच्च उत्पादकता की ओर मोड़ने में सक्षम हों, ताकि लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठ सके और स्वतंत्रता प्राप्ति के समय किए गए वायदों को पूरा किया जा सके।

लेकिन इन नीतियों ने भारत में ऐसी व्यवस्था ला दी, जोकि लाइसेंस-परमिट-कोटा राज के नाम से बदनाम है, भारतीय राज ने भिन्न तरीकों से अर्थव्यवस्था को विनियमित किया और बाजार की शक्तियों को नियंत्रित किया, ऐसे शांत तरीके भी थे, जिनके जरिये राज्य के हस्तक्षेप ने भारतीय उद्योगों के विकास को गति दी। व्यापार और विदेशी विनिमय नीति ने नवजात उद्योगों को संरक्षण प्रदान किया और भारतीय कंपनियों को मशीनी कलपुर्जे और कच्चा माल आयात करने की इजाजत दी, ताकि भारत में ही निर्माण हो सके, अन्यथा जिनका विदेश से आयात करना होता था।

संभवतः सबसे अहम कदम था, राज्य प्रायोजित वित्तीय संस्थानों का निजी और सार्वजनिक, दोनों ही क्षेत्रों में दीर्घकालीन उत्पादक गतिविधियों में निवेश करना। भारत के जिन सफल बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कहानियां आज बहुत चर्चित हैं, उनमें कार के क्षेत्र में टाटा इंजीनियरिंग ऐंड लोकोमोटिव कंपनी (अब टाटा मोटर्स) और दवाओं के क्षेत्र में सिपला है, जिनकी शुरुआत भारत सरकार के वित्तीय और संस्थागत सहयोग से शुरू हुई थी। ऐसी मदद के ठोस परिणाम निकले; सांख्यिकी विकास के इस दौर में यह कम ही रेखांकित किया जाता है कि 1950 के दशक के मध्य से लेकर 1960 के दशक के मध्य तक औसतन वार्षिक औद्योगिक विकास दर 6.9 फीसदी थी।

राज्य निर्देशित विकास के दौर की अपनी खुद की भी अनेक समस्याएं थीं। जैसा कि अतुल कोहली और विवेक छिब्बर ने अपने दिखाया कि अर्थव्यवस्था में बदलाव लाने के भारत सरकार के प्रयास उतने सफल नहीं हुए जिस तरह की पूर्वी एशिया के देशों में देखा जा सकता है। 

1970 और 1980 के दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत खराब हुई, जिसके लिए उच्च लागत, श्रमिक आंदोलन और किसानों जैसे समूहों का राजनीतिक उभार, जोकि उद्योगों पर ध्यान केंद्रित किए जाने से नाराज थे, जिम्मेदार थे। उस वक्त भारतीय राजनीति बहुदलीय व्यवस्था में बंट गई, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों ने संसाधनों की मांग की, जिन्हें पहले औद्योगिकीकरण के लिए सुरक्षित रखा जा सका था।

 जड़ व्यवस्था में सुधार की दो दशकों की सुस्त और थकी-हारी कोशिशों के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के अनेक टिप्पणीकारों ने 1991 के उदारीकरण का स्वागत किया था, जिसने अर्थव्यवस्था को दिशा देने में राज्य की भूमिका सीमित कर दी। सुधार की इन नीतियों के साथ ही आर्थिक विकास में भी वृद्धि हुई, जिससे अनेक लोगों ने तर्क दिया कि सुधारों के कारण ही ऐसा हुआ वर्ना सरकारी नियंत्रण ने आर्थिक विकास को रोक रखा था।

लेकिन ऐसा कहने वाले संभवतः यह नजरअंदाज कर गए कि औद्योगिक विकास को प्रभावी मदद देने के लिए जरूरी संसाधन और राजनीतिक दिशा देने में राज्य आज पहले जैसा सक्षम नहीं है। अर्थव्यवस्था में पर्याप्त क्षमता है और सफलता की अनेक स्थानीय कहानियां भी हैं, लेकिन औद्योगिक नीति को लेकर व्यापक समन्वय का अभाव है। मोदी ने इस कमी को दूर करने के वायदे के साथ चुनाव जीता था। लेकिन सरकार के पास दशकों पहले की तुलना में आज दीर्घकालीन उत्पादन के लिए अर्थव्यवस्था को दिशा देने के लिए संसाधन कम हैं। 

भारत के वित्तीय निगम अपनी पूंजी उपभोक्तावादी वस्तुओं, उपभोक्ता ऋण या रियल एस्टेट में लगा रहे है। भारत के औद्योगिक निगमों ने किराना, बैंकिंग और प्रौद्योगिकी सेवाओं का रुख कर लिया है। प्रत्यक्ष विदेश निवेश भारत को विनिर्माण और नवोन्मेष के केंद्र के बजाय मध्य वर्ग के उभरते बाजार या खनिज संपदा के स्रोत के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।

- लेखक किंग्स कॉलेज लंदन में व्याख्याता हैं।
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