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लैटिन अमेरिका की राह पर भारत!
अश्विनी महाजन
Updated Wed, 05 Jun 2013 09:52 PM IST
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बीते दिनों केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने वर्ष 2012-13 के जीडीपी के आंकड़े प्रकाशित किए हैं। बीते वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर मात्र पांच प्रतिशत रही।
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गौरतलब है कि वर्ष 2011-12 में यह 6.2 फीसदी थी और उससे भी पहले के वर्ष में यह दर 8.3 प्रतिशत आंकी गई थी। ताजा आंकड़े इस कारण महत्वपूर्ण हैं कि यह बारहवीं पंचवर्षीय योजना का पहला वर्ष है। इस वर्ष में शुरू से ही विकास दर को लेकर असमंजस बना हुआ था।
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पूर्व अनुमानों में सरकार की ओर से संभावित विकास दर सात फीसदी के आसपास बताई गई थी, जिसे बाद में अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने घटाते हुए 4.9 प्रतिशत कर दिया था। वर्ष 2013-14 के लिए सरकार का अब भी यह मानना है कि विकास दर सात प्रतिशत के आसपास रहेगी।
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उधर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां अलग ही दास्तान बयान कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने अपनी रपट में कहा है कि दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों और लैटिन अमेरिकी देशों की भांति भारतीय अर्थव्यवस्था में भी गिरावट के चिह्न दिखाई देने लगे हैं।
गौरतलब है कि थाईलैंड, मलयेशिया, इंडोनेशिया, ताइवान, फिलीपींस और दक्षिण कोरिया सरीखे देशों ने 1980 के दशक में और लैटिन अमेरिकी देशों ने उससे पूर्व ही 10 से 12 प्रतिशत की विकास दर प्राप्त कर ली थी।
विकास दर और प्रति व्यक्ति आय में हुई वृद्धि के कारण उन अर्थव्यवस्थाओं को न केवल उभरती अर्थव्यवस्था कहा जाने लगा था, बल्कि लोग इन देशों को एशियाई चीते भी कहने लगे थे। ये अर्थव्यवस्थाएं भारी विदेशी निवेश भी आकर्षित कर रही थीं और इनके निर्यात भी बढ़ रहे थे।
विकास के उस आभास के चलते जमीन-जायदाद की कीमतें कई गुना बढ़ गई थीं। लेकिन अचानक कुछ ऐसा हुआ कि जमीन-जायदाद की कीमतें घटने लगीं और निर्यात भी कम होने शुरू हो गए। भुगतान शेष केवल घाटे में ही नहीं चला गया, बल्कि असहनीय भी हो गया।
विदेशी निवेशक अपना पैसा लेकर उड़नछू होने लगे और विदेशी मुद्रा का संकट गहराने लगा। विदेशी निवेश की वापसी और जायदाद का बुलबुला फूटने के बाद न सिर्फ उत्पादन घटने लगा, बल्कि वास्तविक मजदूरी भी कम होने लगी और लोगों के जीवन स्तर में भारी गिरावट आ गई। नतीजतन उन्हें अपनी मुद्राओं का अवमूल्यन करना पड़ा था।
आईएमएफ की हालिया रपट भारत के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पिछले लगभग 10 वर्षों तक लगातार औसत आठ प्रतिशत की विकास दर होने के बाद यह घटकर पांच प्रतिशत रह गई है।
हालांकि चीन में विकास दर के घटने का संदर्भ भी आईएमएफ ने लिया है, लेकिन भारत में आर्थिक संकट अधिक गहराया हुआ जान पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की रपट में कहा गया है कि भारत भी उसी जाल में फंस रहा है, जिसमें पहले लैटिन अमेरिकी देश और बाद में दक्षिण पूर्वी एशियाई देश फंसे थे।
मुद्दा सिर्फ एक वर्ष में विकास दर घटने का ही नहीं है। पिछले दो-तीन वर्षों से अर्थव्यवस्था की सेहत के बारे में मिलने वाले संकेत अच्छे नहीं हैं। विनिर्माण के साथ ही कृषि विकास दर नीचे गई है। जिस सेवा क्षेत्र के बल पर विकास दर ऊपर जा रही थी, वह दर भी घटकर 7.1 फीसदी रह गई है।
हमारा व्यापार घाटा भी लगातार बढ़ता हुआ 200 अरब डॉलर के पार पहुंच चुका है। अनिवासी भारतीयों द्वारा भेजी जा रही भारी रकम और सॉफ्टवेयर निर्यात से होने वाली भारी आमदनी के बावजूद हमारे भुगतान शेष का घाटा बीते वर्ष 100 अरब डॉलर पार कर गया।
ऐसे में विदेशी मुद्रा का घटता भंडार और बढ़ते विदेशी कर्ज के चलते रुपये पर दबाव बनना शुरू हो गया है। रुपये में और गिरावट आ सकती है, जिसके चलते देश का व्यापार घाटा और महंगाई, दोनों में बढ़ोतरी मुमकिन है।
घटती आय मांग को प्रभावित कर रही है और विनिर्माण क्षेत्र में विकास की संभावनाओं को क्षीण कर रही है। ऐसे में आईएमएफ द्वारा भारत को दी गई चेतावनी ध्यान देने लायक है।
विदेशी संस्थागत निवेशकों पर यह शर्त लागू करनी होगी कि वे अपना पैसा तीन साल से पहले न ले जा सकें। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो भारत पर विदेशी मुद्रा संकट गहरा सकता है।