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समाज: घरेलू कामगारों के हितों की सुरक्षा के लिए कानून पर विचार करने की जरूरत

Mon, 20 Feb 2023 05:28 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Mon, 20 Feb 2023 05:28 AM IST
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सार
हाल ही में गुरुग्राम में एक अवयस्क घरेलू सहायिका को प्रताड़ित करने वाले एक दंपति की गिरफ्तारी से देश की विशाल अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी करने वाले घरेलू कामगारों की घनघोर अनिश्चितता सामने आई है। उनके हितों को सुरक्षित रखने के लिए कानून पर विचार करने की जरूरत है।
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india need a law to protect domestic workers rights
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

यह अब आए दिन की कहानी जैसा है। ऐसा घिनौनापन घटनाओं को पहले पन्ने की सुर्खियां बना देता है। कुछ दिनों तक यह चर्चा में रहता है। तीखी आलोचनाएं भी होती हैं। और फिर इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। जमीन पर बहुत कम बदलाव नजर आता है। लेकिन यह भारत के शहरी मध्यवर्ग का सबसे ज्ञात रहस्य है।



इसलिए जब हाल ही में मैंने अखबारों में घरेलू सहायिका के रूप में काम करने वाली झारखंड की एक अवयस्क आदिवासी लड़की को कथित रूप से प्रताड़ित करने और उस पर हमला करने वाले एक दंपति को गुरुग्राम पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बारे में पढ़ा, तो मुझे कोई हैरत नहीं हुई। पुलिस का कहना है कि इस 17 वर्षीय लड़की को कथित रूप से करीब पांच महीने से प्रताड़ित किया जा रहा था। किसी तरह उसे बचाया गया और उसे अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। उसके शरीर में काफी चोटें आई थीं। आरोपी दंपति गुरुग्राम में रहते हैं।


यह एक और घटना है, जो देश की विशाल अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी करने वाले घरेलू कामगारों की घनघोर अनिश्चितता को दिखाती है। उनके बिना, भारतीय शहरों के अनेक मध्यवर्गीय और समृद्ध परिवारों का दैनिक जीवन अचानक थम जाएगा, इसके बावजूद घरेलू कामगारों को प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। उनके बुनियादी अधिकारों को सुरक्षित रखने से संबंधित कानूनों और उपायों पर बहुत कम चर्चा होती है। यह केवल राज्य की उदासीनता नहीं है। समाज के विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों में भी इस समूह के प्रति गहरी उदासीनता है। यही वजह है कि वे शक्तिहीन और बेआवाज बने हुए हैं।

हमारे यहां उन्हें संरक्षण देने वाली कोई राष्ट्रीय नीति नहीं है। इसलिए घरेलू कामगार अक्सर शोषण का शिकार बनते हैं। ऐसा करना आसान है, क्योंकि यह क्षेत्र व्यापक रूप से असंगठित है और ये कामगार अपने नियोक्ता की दया पर निर्भर होते हैं और उनमें से अधिकांश कम शिक्षित होते हैं, जिससे वे पारिश्रमिक के लिए मोलभाव नहीं कर पाते। कानून की नजर में घरेलू कामगार 'कामगार' की श्रेणी में नहीं आते और न ही उनका कार्यस्थल 'प्रतिष्ठान' है। सरकार इस क्षेत्र में नियमन की कमी का बचाव करने के लिए अक्सर यही तर्क देती है।

इस मुद्दे पर गहराई से काम करने वाली सेंटर फॉर वीमन्स डेवलपमेंट स्टडीज में कार्यरत प्रोफेसर नीता एन अप्रभावी कानून को लेकर राज्य सरकारों की तीखी आलोचना करती हैं, जो कि न तो न्यूनतम वेतन के लिए दबाव बनाती हैं और न ही काम के घंटों से जुड़ी खामियों को दूर करती हैं। उदाहरण के लिए, भले ही आठ घंटे निर्धारित दैनिक कार्य समय है, लेकिन यह प्रावधान केवल प्रति नियोक्ता पर लागू होता है, जिसका यह अर्थ है कि एक से अधिक घरों में काम करने वाला व्यक्ति निर्धारित समय से अधिक काम कर सकता है।

प्रोफेसर नीता एन ने 2021 में द इंडियन जर्नल ऑफ लेबर इकनॉमिक्स में प्रकाशित अपने लेख में एक स्पष्ट अंतर को रेखांकित किया था, जो घरेलू कामगारों के प्रति नीतिगत उपेक्षा की सुविधा देता है। उन्होंने लिखा, 'घरेलू कामगारों पर डाटा की आश्चर्यजनक कमी है, जिससे इस क्षेत्र में अदृश्यता की उच्च दर के कारण अनेक चर्चाओं में भिन्न-भिन्न तरह के आंकड़े उद्धृत और संदर्भित किए जाते हैं। यदि हम भारत में घरेलू कामगारों की समकालीन संख्या को देखें तो, पीएफएलएस (आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण) 2017-18 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 52.35 लाख घरेलू कामगार थे।' यह आधिकारिक अनुमान है, जबकि गैरसरकारी अनुमानों के मुताबिक उनकी संख्या इससे कहीं अधिक है। वह रेखांकित करती हैं कि यह क्षेत्र शहरी क्षेत्रों में, जहां बड़ी संख्या में अशिक्षित या कम शिक्षित प्रवासी महिलाओं की मौजूदगी होती है, महिलाओं को रोजगार देने वाले बड़े क्षेत्रों में से एक है।

इस क्षेत्र को समझने के लिए यह स्वीकार करना जरूरी है कि जाति और लिंग अहम पहलू हैं। उनका तर्क है कि हालांकि इस क्षेत्र की जाति संरचना बढ़ी हुई मांग के साथ समय के साथ बदल गई है, इसमें अब भी हाशिये की महिलाओं, विशेषकर अनुसूचित जाति वर्ग की महिलाओं का प्रभुत्व है। इसके अलावा आदिवासी महिलाएं भी बड़ी संख्या में इसमें आ रही हैं। विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में इन सेवाओं की बढ़ती मांगों के बावजूद घरेलू कामगारों के वेतन और काम की परिस्थितियों में सुधार नहीं हुआ है। इसकी एक वजह आपूर्ति से जुड़े कारक हो सकते हैं, क्योंकि इनमें से बड़ी संख्या संकट से प्रेरित ग्रामीण-शहरी प्रवासन से जुड़ी हुई है।

अपने निजी अनुभव से यह मैं कह सकती हूं कि इस कमजोर और अनिश्चित क्षेत्र में जिन थोड़े से लोगों की संबद्धता किसी एनजीओ से होती है, वे उन लोगों की तुलना में कम असुरक्षित होते हैं, जिनके पास किसी तरह का संस्थात्मक संरक्षण नहीं होता और उन्हें जिन्हें पैसे भी कम मिलते हैं तथा उन्हें निजी घरों में बंधकर काम करना होता है। प्रोफेसर नीता एन ने घरेलू कामगारों के प्रशिक्षण और कौशल विकास से जुड़े एक एनजीओ सेवा का जिक्र किया। यह एनजीओ 1990 के दशक के आखिर से केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में घरेलू कामगारों की नियुक्ति करवा रहा है। स्वसरया सेवा महिला संघ (एसएमएसएस) सेवा का एक पंजीकृत संगठन है और केरल में सेवा के जरिये भर्ती किए जाने वाले/वाली सारे/सारी घरेलू कामगार इस संगठन के सदस्य हैं।

लेकिन दुखद यह है कि घरेलू कामगारों को प्रशिक्षण और मदद देने वाले ऐसे कम संगठन हैं। अधिकांश प्लेसमेंट एजेंसियां अपने व्यावसायिक हितों से आगे नहीं देखतीं। लिहाजा घरेलू कामगारों के हित असुरक्षित हैं। जो लोग खतरनाक परिस्थितियों में रहते हैं और काम करते हैं वे अक्सर लड़ने में सक्षम नहीं होते हैं, लेकिन हममें से जो अपेक्षाकृत विशेषाधिकार प्राप्त हैं, उन्हें घरेलू कामगारों, हमारे साथी नागरिकों की सुरक्षा के लिए कानूनों और सुरक्षा तंत्रों की वकालत करनी चाहिए।

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