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पड़ोस: चीन की शह पर भारत विरोधी रहा है मालदीव का रुख

Wed, 10 Jan 2024 07:29 AM IST
K S Tomar केएस तोमर
Updated Wed, 10 Jan 2024 07:29 AM IST
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सार
मालदीव सरकार ने भारत के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने वाले मंत्रियों को भले ही निलंबित कर दिया है, पर इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि मौजूदा मालदीव का रुख भारत विरोधी रहा है, जिसे चीन से समर्थन मिलता है। भारत को अन्य पड़ोसी देशों में भी चीन के बढ़ते प्रभाव के प्रति सजग रहना होगा।
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India Maldives Row China growing influence in neighboring countries Mohamed Muizzu anti-India remarks pm modi
Mohamed Muizzu - फोटो : Social Media

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लक्षद्वीप दौरे पर मालदीव के तीन मंत्रियों की आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद दोनों देशों के बीच पहले से ही खराब चल रहे रिश्ते को बड़ा झटका लगा है। सोशल मीडिया पर बॉयकॉट मालदीव ट्रेंड कर रहा है। मालदीव के विपक्षी नेताओं ने भी उन टिप्पणियों की जमकर आलोचना की है। हालांकि मालदीव सरकार नुकसान की भरपाई करने में जुट गई है और टिप्पणी करने वाले मंत्रियों मरियम शिउना, मालशा शरीफ और महजूम माजिद को निलंबित कर दिया है, लेकिन इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि मौजूदा मालदीव सरकार का रुख भारत विरोधी रहा है, जिसे चीन से समर्थन मिलता है।



बीजिंग ने अभी मालदीव के 1,200 द्वीपों में 17 को पट्टे पर लिया हुआ है, जो पूरे मालदीव में फैले हुए हैं और चीन की तीन सबसे बड़ी परियोजनाओं की लागत कुल मिलाकर 1.5 अरब डॉलर है, जो मालदीव की जीडीपी के 40 फीसदी से ज्यादा है। मालदीव में चीन का निवेश 97 करोड़ डॉलर को पार कर गया है, जिसे चुकाना मालदीव जैसे गरीब देश की क्षमता से बाहर है। फिर भी मौजूदा मुइज्जू सरकार भारत के प्रभाव को घटाने और चीन के प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।


मालदीव में चीन के प्रभाव को कम करने के लिए भारत ने 50 करोड़ डॉलर की सबसे बड़ी नागरिक बुनियादी ढांचा परियोजना की घोषणा करने का तार्किक कदम उठाया, जिसके तहत 6.7 किलोमीटर लंबा पुल और सड़क बनेगी, जो मालदीव की राजधानी माले को तीन नजदीकी द्वीपों से जोड़ेगी। इस तरह से भारत लंबाई, पैमाने और लागत के मामले में 20 करोड़ डॉलर की लागत से बने मालदीव-चीन मैत्री पुल को पीछे छोड़ देगा। लेकिन चीन के प्रति मुइज्जू के झुकाव को देखते हुए भारत का चिंतित होना स्वाभाविक है, जिन्होंने अभी हिंद महासागार द्वीप समूह में तैनात भारतीय सैनिकों को लौटाने का फैसला किया है। यह मुख्यतः मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह की ‘भारत पहले’ की नीति को पलटने के उद्देश्य से उठाया गया कदम है। इसके अलावा मुइज्जू सरकार ने एक और भारत-विरोधी निर्णय के तहत हाइड्रोग्राफी (जल सर्वेक्षण विज्ञान) के क्षेत्र में भारत के साथ सहयोग के सहमति पत्र के नवीनीकरण के खिलाफ फैसला लिया है।

सिर्फ मालदीव में ही नहीं, बल्कि नए वर्ष में भारतीय विदेश नीति के समक्ष कई चुनौतियां हैं। चीन अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका सहित दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के देशों में तेजी से अपनी पैठ बना रहा है, जिसके लिए इसकी खतरनाक कर्ज-जाल नीति, विस्तारवाद और बीआरआई के माध्यम से दिए जा रहे प्रलोभन को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

विदेश नीति के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत एशिया में खुद को चीन की तुलना में एक प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है, हालांकि दोनों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। लेकिन अमेरिका के साथ बढ़ते भू-राजनीतिक सहयोग से वह चीन को मात दे सकता है। भारत के साथ अमेरिका का रक्षा और आर्थिक सहयोग दोनों देशों के रिश्ते को और मजबूत करेगा, जिसका असर वैश्विक मंच पर हो सकता है।

चीन की कर्ज जाल नीति में पाकिस्तान पूरी तरह से फंस चुका है, जिससे निकट भविष्य में निकलना उसके लिए असंभव है। आगामी फरवरी में पाकिस्तान में होने वाले आम चुनाव से राजनीतिक परिदृश्य बदल सकता है, क्योंकि नवाज शरीफ के सत्ता में लौटने की संभावनाएं बन रही हैं। नवाज शरीफ ने भारत के साथ रिश्ते सामान्य बनाने की इच्छा जताई है।

चीन नेपाल का सबसे बड़ा निवेशक और व्यापार भागीदार के रूप में उभरा है, जिसने दोनों देशों के आर्थिक एवं कूटनीतिक रिश्तों को बदल दिया है। चीन ने नेपाल में 1.34 अरब डॉलर का निवेश किया है और बीआरआई के क्रियान्वयन के लिए दबाव बना रहा है। नेपाल भारत के लिए बहुत प्रासंगिक है, लेकिन ओली सरकार ने भारत के साथ सदियों पुराने रिश्तों को बिगाड़ दिया था, जिसे मौजूदा प्रधानमंत्री प्रचंड ने सुधारने की बहुत कोशिश की है। अब भारत ने कई आर्थिक पहल की है, जिनमें दीर्घकालीन व्यापार समझौता, बिजली की खरीद और पारगमन संधि, आदि हैं, जो द्विपक्षीय रिश्तों को नया आयाम दे सकते हैं। भारत को बीआरआई की किसी भी प्रगति पर नजर रखनी होगी, क्योंकि 1,770 किलोमीटर की खुली सीमा के कारण सुरक्षा जोखिम होगा।

हम्बनटोटा में चीन ने 4.5 अरब डॉलर का निवेश किया था, जिसने नई दिल्ली के लिए सुरक्षा चिंताएं पैदा कर दी थीं। लेकिन श्रीलंका जब आर्थिक पतन के कगार पर था, तो चीन उसकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। ऐसे में, भारत को उदारता दिखाने का मौका मिला। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के साथ श्रीलंका का मौजूदा दोस्ताना रवैया जारी रह सकता है, क्योंकि भारत ने खुले दिल से सहयोग किया और चार अरब डॉलर से अधिक की वित्तीय सहायता दी, जो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के तीन अरब डॉलर के राहत पैकेज से ज्यादा है। भारत को श्रीलंका से रिश्ते और बेहतर बनाने के लिए कदम उठाने चाहिए।

बांग्लादेश में भारत समर्थक शेख हसीना फिर से सत्ता में लौट आई हैं। चीन ने हमेशा बांग्लादेश में गहरी दिलचस्पी दिखाई है, जो 2016-22 के दौरान 26 अरब डॉलर के निवेश से स्पष्ट है। आंकड़े बताते हैं कि बांग्लादेश में चीन सबसे बड़ा निवेशक बनकर उभरा है और वह अब वहां अपना निवेश और बढ़ा सकता है।

चीन ने म्यांमार में जातीय विद्रोही गुटों का समर्थन करने के अलावा वहां तानाशाही का पूरा समर्थन किया है। अमेरिका और उसके सहयोगी देश यूक्रेन और गाजा के युद्ध में व्यस्त हैं, जिससे तानाशाही शासकों को लोकतांत्रिक ताकतों को कुचलने की छूट मिल गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को चीन की 'दो महासागरीय रणनीति' और बीआरआई व अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के खेल पर नजर रखनी होगी। भूटान के रिश्ते भारत से अच्छे हैं, लेकिन चीन के बढ़ते प्रभाव से सुरक्षा का खतरा पैदा हो सकता है। भारत को भूटान को चीनी प्रलोभनों से दूर रखना होगा।

विश्लेषकों का मानना है कि सार्क देशों में चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए चिंताजनक है। इसलिए उसे नियंत्रण में रखने के लिए ठोस रणनीति अपनाने की आवश्यकता है, अन्यथा परिणाम गंभीर होंगे। 

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