जल संस्कृति के वारिस
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भारत नदियों की संस्कृति का वारिस है। यहां की तमाम नदियां करोड़ों लोगों की आजीविका का स्थायी स्रोत होने के साथ-साथ जैव विविधता, पर्यावरण और पारिस्थितिक संतुलन की पोषक रही हैं। यहां तमाम नदियां मात्र जल स्रोत नहीं मानी जाती हैं बल्कि मातृ रूप में पूजित हैं। ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी भी इनमें से एक थी। करीब पांच हजार वर्ष पहले सरस्वती के विलुप्त होने के कारण चाहे कुछ भी रहे हों, लेकिन उसकी याद दिलाने वाले स्तोत्र को करोड़ों लोग आज भी गुनगुनाते हैं। हजारों वर्ष पहले विलुप्त हुई सरस्वती नदी से जुड़ी मामूली खबर भी सरकारों और आमजन के लिए कौतूहल का विषय बन जाती है। पर आज हमारी गैर-जिम्मेदार और संवेदनहीन जीवन शैली के कारण नदियों, तालाबों समेत तमाम प्राकृतिक जलस्रोत न केवल दूषित होते जा रहे हैं बल्कि दम भी तोड़ रहे हैं।
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अपने देश की कोई भी सांस्कृतिक गाथा नदियों के पुण्यधर्मी प्रवाह को बिसरा कर नहीं लिखी जा सकती। लेकिन आज हम नदियों के महत्व को भूलकर उन्हें बर्बाद करने पर तुले हुए हैं। इसी का नतीजा है कि चारों ओर जल संकट छाया हुआ है। हमें इस बात का एहसास जितनी जल्दी हो जाए उतना ही अच्छा है कि अगर हम जल संस्कृति के वारिस रहना चाहते हैं, तो हमें नदियों, तालाबों, जोहड़ों, डबरों, बावड़ियों, कुओं और अन्य जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने का प्रण लेना होगा।
भारत के उत्तरी भाग को गंगा और यमुना ने ही संसार का सबसे विस्तृत उर्वर क्षेत्र बनाया है। पश्चिम भाग अपनी पांच नदियों के कारण पंचनद प्रदेश कहलाता है। नर्मदा, महानदी, ताप्ती और सोन नदियां जहां मध्य भाग का गौरव हैं, वहीं दक्षिण भाग कृष्णा, कावेरी और गोदावरी के कारण धन-धान्य से पोषित रहा है। उत्तर-पूर्व भाग भला ब्रह्मपुत्र और तीस्ता के उपकारों को कैसे भूल सकता है। इन सबके बीच भी सैकड़ों नदियां ऐसी हैं जो सदियों से देश के जन-गण के लिए प्राकृतिक नीति आयोग का काम करती आ रही हैं।
अफसोस है कि सांस्कृतिक शिक्षा के अभाव ने हमारे काल-बोध को कमजोर कर दिया है। बेशक विकास की गाद इन नदियों के पाट समेटने में लगी हुई है, इसके बावजूद आम भारतीय जनमानस नदियों की निर्मलता से आज भी अपने जीवन का सार खोजता है। हमारा वैदिक और पौराणिक साहित्य नदियों की स्तुतियों भरा पड़ा है। प्रत्येक नदी के स्तोत्र हैं, आरती-पूजा का विधान है। लेकिन इन्हें बचाए रखने का विधान कहीं खो गया है।
सरस्वती नदी का उद्गम स्थल आदिबद्री (यमुनानगर) माना जाता है, लेकिन हैरानी की बात है कि इस क्षेत्र में प्लाइवुड उद्योग धड़ल्ले से जंगलों पर कुल्हाड़ी चला रहा है। साधारण सी बात है कि जिन इलाकों में पेड़ कटान बहुत अधिक हो वहां का भू-जल स्तर भी बहुत तेजी से गिरता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जीवन को चलाने के लिए कारोबार जरूरी हैं। लेकिन क्या यह संभव है कि प्रत्येक प्लाइवुड लाइसेंस धारक प्रतिवर्ष अपना लाइसेंस रिन्यू करवाने से पूर्व कम से कम पांच सौ पेड़ अवश्य लगाए? हरियाणा सरकार का पहला कार्यकाल खत्म हो गया लेकिन अब जबकि दोबारा सरकार बनी है, तो उसको कुछ गंभीर प्रयास अवश्य करने चाहिए।
सरकार का यह दायित्व है कि वह लोगों के साथ मिलकर निर्मल नदी, तालाब, जोहड़, बावड़ी और जल के संकल्प को योजनाबद्ध तरीके से फलदायी बनाए। हरियाणा अपनी भूजल संपदा के मामले में बड़े संकट के मुहाने पर है। यमुना नदी आज सीवरेज और औद्योगिक कचरे का जहरीला कॉकटेल मात्र बची है। हरियाणा में कुल 108 जलसंभर क्षेत्र हैं, जिनमें से 82 डार्क जोन में बदल चुके हैं। मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र करनाल के सभी छह ब्लॉक डार्क जोन में बदल चुके हैं। हरियाणा देश का एकमात्र राज्य है, जहां छह फीसद वन बचे हैं। जिस प्रदेश में वन इतने कम हों वहां कभी भी अकाल की स्थिति पैदा हो सकती है। हरियाणा सरकार को नए सपनों के साथ प्रदेश की शुष्क पर्यावरणीय स्थिति को संभालना होगा।
हालांकि हरियाणा सौभाग्यशाली है कि प्रदेश में सरस्वती के प्रकट होने की खबरें यदा-कदा आ रही हैं, लेकिन सरकार को मात्र दिखावा कर अपने कर्तव्य से पल्ला नहीं झाड़ना होगा बल्कि प्रदेश के सभी पुरातन जल स्रोतों के संरक्षण का जिम्मा उठाना होगा। सरस्वती बोर्ड की सार्थकता तभी है जब हरियाणा की नदियां, तालाब, जोहड़, डबरे, बावड़ियां और कुएं संरक्षित किए जाएं। अन्यथा अक्सर ऐसी संस्थाएं कुछ ज्ञात-अज्ञात कार्यकर्ताओं या परिचितों के पेट की भेंट चढ़ जाती हैं। यदि प्रदेश सरकार जल स्रोतों को बचाने में सफल होती है तो यकीन मानें इससे न केवल विलुप्त हो रही यमुना बच पाएगी बल्कि कोई 'सरस्वती कभी लुप्त नहीं होगी।