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हमारे लिए महत्वपूर्ण है भारत
रेणु कौल वर्मा
Updated Fri, 20 Sep 2013 08:10 PM IST
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आगामी अक्तूबर में फ्रेंकफर्ट में पुस्तक मेले का आयोजन हो रहा है। पिछले 500 वर्षों से लगने वाला यह पुस्तक मेला दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक एवं सांस्कृतिक आयोजन है। इस मेले में भारत के छोटे प्रकाशकों के लिए कितनी संभावनाएं हैं? क्या जर्मन प्रकाशन उद्योग भारत में निवेश के लिए तैयार है? इन्हीं विषयों पर मेले की वायस प्रेसिडेंट क्लाउडिया कैसर से वितस्ता पब्लिशिंग की रेणु कौल वर्मा ने अमर उजाला के लिए बातचीत की-
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भारत को एक महत्वपूर्ण बाजार के रूप में आप कैसे देखती हैं? यहां के कुछ छोटे प्रकाशक विश्वस्तरीय साहित्य प्रकाशित कर रहे हैं। लेकिन इस मेले में शामिल हो पाना उनकी क्षमता से बाहर है। क्या ऐसे प्रकाशकों के लिए आपके पास कोई योजना है?
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फ्रेंकफर्ट पुस्तक मेला और जर्मनी के विदेश मंत्रालय ने भारत में जर्मन बुक ऑफिस खोला है, जो इस बात का सुबूत है कि हम भारत को एक महत्वपूर्ण बाजार मानते हैं। भारत में बहुत-सी भाषाएं हैं और उसके काफी पाठक हैं। यहां जर्मनी के प्रकाशकों के लिए काफी संभावनाएं हैं। भारत इसलिए भी दिलचस्प है, क्योंकि यह अंग्रेजी भाषा का बाजार है। चूंकि अमेरिका और ब्रिटेन के बाजार आत्मनिर्भर हैं, इसलिए वहां के प्रकाशकों को अपनी चीजें बेचना जर्मन कंपनियों के लिए आसान नहीं है। ऐसे में भारत में ही अवसर है। भारत पहला देश है, जिसे फ्रेंकफर्ट पुस्तक मेले में दो बार (पहले 1986, फिर 2006 में) गेस्ट ऑफ ऑनर मिला है। इससे स्पष्ट है कि भारत हमारे लिए महत्वपूर्ण है। भारत के छोटे प्रकाशकों की समस्याओं से हम वाकिफ हैं। जो फ्रेंकफर्ट आने में सक्षम नहीं हैं, दुनिया भर के ऐसे तमाम स्वतंत्र प्रकाशकों को हम आमंत्रित करते हैं। पिछले कुछ वर्षों से भारत से एक-दो प्रकाशकों को हम आमंत्रित कर रहे हैं और कई प्रकाशकों ने इसमें हिस्सा भी लिया है।
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अनुवाद का भारी खर्च उठाते हुए जर्मन कंपनियां भारतीय बाजार में अपनी पैठ कैसे बना सकती हैं? क्या जर्मनी के प्रकाशक भारत में निवेश के लिए तैयार हैं?
इस दिशा में हम कदम उठा रहे हैं। दिल्ली में जर्मन बुक ऑफिस हमने इसीलिए खोला है। हम जर्मन प्रकाशकों की मदद करते हैं कि वे भारतीय प्रकाशकों के साथ सहयोगी कार्यक्रम शुरू करें। ऐसी जर्मन कंपनियों की संख्या सचमुच बहुत कम है, जिन्होंने भारत में अपनी दुकानें खोली हैं। भारत और जर्मन प्रकाशन कंपनी का एक संयुक्त उपक्रम है भी, लेकिन उसका अब तक अपेक्षित विस्तार नहीं हुआ है। एक बार जब जर्मन प्रकाशकों के सामने संभावनाएं स्पष्ट हो जाएंगी, तो निश्चित रूप से वे निवेश के लिए तैयार हो जाएंगे।
मेले में भाग लेने वाले भारतीय प्रकाशकों को आप कोई सलाह देना चाहेंगी?
वर्ष 2011 तक भारत के ज्यादातर प्रकाशक हॉल नंबर पांच एवं छह में एशिया एवं दुनिया के अन्य हिस्सों के प्रकाशकों के साथ अपना स्टॉल लगाते थे। भारतीय प्रकाशकों का कोई सामूहिक स्टैंड नहीं था, ऐसे में भारतीय प्रकाशकों को ढूंढना बहुत मुश्किल होता था। लेकिन 2012 से भारतीय प्रकाशकों के लिए अंग्रेजी भाषी हॉल में विशाल स्टैंड लगाया जाता है। इसने कई नई संभावनाएं जगाई हैं। मैं भारतीय प्रकाशकों को सलाह देना चाहूंगी कि वे पुस्तकों का ज्यादा से ज्यादा प्रदर्शन करें।
इस बार मेले में नया और खास क्या है?
इस बार एशियाई देशों की पुस्तकों एवं रुझानों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए एशिया लाउंज कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इसके अलावा हम सेल्फ पब्लिशिंग एवं स्टार्ट-अप जोन भी शुरू कर रहे हैं, जो काफी आकर्षक है। यह बाल पुस्तकों का भी सबसे बड़ा मेला है। बाल पुस्तकों के प्रकाशकों को अपना कार्यक्रम करने के लिए हमने 'किड्स बबल' भी तैयार कराया है।