फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   India in the eyes of Marx

मार्क्स की नजर में भारत

Fri, 04 May 2018 07:04 PM IST
subrat mukherjee सुब्रत मुखर्जी
Updated Fri, 04 May 2018 07:04 PM IST
विज्ञापन
India in the eyes of Marx
कार्ल मार्क्स
एशियाई खांचे के दायरे में भारत का विश्लेषण करते हुए कार्ल हेनरिक मार्क्स (1818-83) इस बात से सहमत थे कि साम्राज्यवादी ब्रिटेन भारत में पश्चिमी समाज की स्थापना करेगा, क्योंकि अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने एशिया की एकमात्र सामाजिक क्रांति का प्रतिनिधित्व किया था।

loader

यह विश्वास इस तर्क पर आधारित था कि उपनिवेशवाद हालांकि बर्बर था, लेकिन यह दुनिया में सर्वहारा की क्रांति के लिए द्वंद्वात्मक रूप से महत्वपूर्ण था। उपनिवेशवाद आधुनिकीकरण की ताकतों को खड़ा करेगा, जो कि अंततः इन क्षेत्रों की मुक्ति का कारण बन जाएगा। मार्क्स ने गौर किया कि भारत में अंग्रेजी राज दो तरह के कार्य करेगा, पहला है विनाशकारी और दूसरा है पुनरुत्पादक।

पुनर्जागरण बल के रूप में औपनिवेशिकरण राजनीतिक एकीकरण, रेलवे, एक मुक्त प्रेस, एक प्रशिक्षित सेना, पश्चिमी शिक्षा, विचार की तर्कसंगत तरीके लेकर आया और साझा भूमि अधिकार को खत्म कर दिया। साझा भूमि अधिकार को खत्म किया जाना महत्वपूर्ण था, क्योंकि एशियाई ढांचे का निर्माण ही संपत्ति के साझा स्वामित्व से हुआ था। फ्रांसीसी क्रांति की तुलना में मार्क्स के मुताबिक, उपरोक्त सभी परिवर्तनों का संचयी प्रभाव अधिक गहरा था, क्योंकि यह स्थिर भारतीय समाज को बदल गया जो तब तक पश्चिमी अर्थ में वर्ग समाज नहीं था।

जहां तक इसके विध्वंसकारी होने की बात है, तो ब्रिटिश औपनिवेशकरण ने स्वदेशी उद्योगों और हस्तशिल्प को खत्म कर दिया। मार्क्स ने ईस्ट इंडिया कंपनी की शोषणकारी भूमिका और उसके एकाधिकार के खिलाफ अंग्रेज पूंजीपतियों में बढ़ती नाराजगी और अतिशेष ब्रिटिश पूंजी को भारत स्थानांतरित किए जाने के विरोध के बारे में लिखा है। इन सारे परिवर्तनों ने भारतीय समाज की स्थिर प्रकृति को गहराई से प्रभावित किया।

इस संदर्भ में उन्होंने अंधविश्वास और संकीर्ण मानसिकता का जिक्र किया, जिसने पशु पूजा को मजबूती दी और स्थानीय हस्तशिल्प तथा कृषि के बीच असाधारण समन्वय का जिक्र किया, जिसने ऐतिहासिक विकास के विरुद्ध काम किया। इससे सिर्फ स्थानीय जरूरतें ही पूरी हुईं और इनमें अधिशेष उत्पादन की क्षमता नहीं थी। उन्होंने इस प्राचीन स्थिति को तोड़ने के लिए अंग्रेजों की भूमिका की तारीफ की, जिससे पूंजीवाद और औद्योगिकीकरण का विकास संभव हो पाया जिसने गांवों के अलगाव को खत्म कर दिया। यानी ब्रिटिश साम्राज्यवाद सिर्फ अपने हितों का खयाल रख रहा था और इस प्रक्रिया में भारी क्रूरता भी शामिल थी, इसके बावजूद इसने प्रगतिशील भूमिका भी निभाई।  

इसके साथ ही जमींदारी व्यवस्था के परिचय के साथ एक विशेष प्रकार का भूमि स्वामित्व विकसित हुआ और हालांकि ब्रिटिश शासन को मजबूत करने के लिए स्थायी स्वामित्व व्यवस्था शुरू की गई थी, लेकिन इससे अनिवार्य रूप से किराएदार व्यवस्था और भूमिहीन श्रमिकों के उभार को नहीं रोका जा सका। मार्क्स ने ब्रिटिश शासन के दौरान राजनीतिक एकीकरण की उपलब्धि पर भी विचार किया था, जिसने मुगल काल के दौरान हासिल की गई उपलब्धियों को पीछे छोड़ दिया।

इसका सबसे बड़ा कारण था रेलवे और टेलीग्राफ का विकास। 1857-58 के दौरान अपने लेखन में उन्होंने भारतीय क्रांति में भारत की आकांक्षाओं के अक्स तो देखे, लेकिन उन्होंने बहुत सावधानी के साथ लिखा कि क्रांति के सफल होने की कोई उम्मीद नहीं थी। उन्होंने भारत की स्वतंत्रता की संभावनाओं पर भी विचार किया था। उन्होंने दो संभावनाएं देखीं, पहली, जब अंग्रेज सर्वहारा ग्रेट ब्रिटेन की सत्ता में आ जाएं और दूसरी, जब भारत के लोग इतने सक्षम हो जाएं कि खुद को ब्रिटिश राज से मुक्त कर लें। 

रेलवे के प्रभाव का विश्लेषण करते हुए मार्क्स ने कुछ दिलचस्प टिप्पणियां कीं। उन्होंने भविष्यवाणी की कि हालांकि अंग्रेजों ने इस विशेष दृष्टिकोण के साथ रेलवे की शुरुआत की ताकि इसके जरिये वे कम खर्च पर मैन्यूफैक्चरिंग की अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए कपास और अन्य कच्चे माल का इंतजाम कर सकेंगे, लेकिन जब आप एक ऐसे देश के संचालन के लिए मशीन का इस्तेमाल करते हैं, जहां लोहे और कोयले के अकूत भंडार हों, तो आप इनका दोहन अधिक दिनों तक नहीं रोक सकते। 

ऐसा इसलिए था, क्योंकि इतने विशाल देश में रेलवे नेटवर्क का रखरखाव इसके लिए जरूरी आधारभूत संरचना के विकास के बिना संभव ही नहीं था। रेलवे प्रणाली के बारे में मार्क्स की भविष्यवाणी सच साबित हुई। सचमुच यह आधुनिक उद्योग की अगुआ है।

भारत में ब्रिटिश शासन के भावी परिणामों को लेकर मार्क्स का अधिकांश आकलन भविष्यसूचक जैसा साबित हुआ है। भारत की एकजुटता रेलवे, डाक और टेलीग्राफ तथा प्रेस के जरिये मजबूत हुई है। नई, संगठित और प्रशिक्षित सेना की महत्वपूर्ण भूमिका के संबंध में उनकी भविष्यवाणी सही साबित हुई है। शिक्षा के नए और आधुनिक तरीकों का जीवन के सारे पक्षों पर व्यापक प्रभाव है। रेलवे के विस्तार से जातिगत भेदभाव को कम करने जैसे अनेक अप्रत्यक्ष लाभ भी हुए हैं।

मार्क्स व्यापक रूप में भारत के ऐतिहासक उद्भव से उपजे परिणामों को बताने में काफी हद तक सफल रहे। भारत में बदलाव सिर्फ ब्रिटिश शासन की कमान तत्कालीन शासक वर्ग की जगह औद्योगिक सर्वहारा वर्ग के हाथ में आने से या फिर भारतीयों के इतनी शक्ति अर्जित करने से होगा कि वह अपने दम पर स्वतंत्रता हासिल कर सकें, उनके इस आकलन की पुष्टि इतिहास ने खुद कर दी है। 

लास्की ने 1945 में ब्रिटेन के आम चुनाव में लेबर पार्टी की जीत पर टिप्पणी की थी कि यह सहमति से हुई क्रांति है। लेबर पार्टी की जीत ने भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया, जोकि महात्मा गांधी की अगुआई में हुए अहिंसक आंदोलन और सुभाष चंद्र बोस के छिटपुट हिंसक प्रयासों से उपजे राष्ट्रवाद से संभव हो सकी। 
 
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed