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मुद्दा : भारत से '71' में ही हो गई थी बड़ी चूक, तभी करा देना था अल्पसंख्यकों की रक्षा का प्रावधान

Sat, 17 Aug 2024 06:39 AM IST
Shivdan Singh शिवदान सिंह
Updated Sat, 17 Aug 2024 06:39 AM IST
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सार
भारत ने जब बांग्लादेश को आजाद करवाया, तो उसी वक्त उसके संविधान में अल्पसंख्यकों की रक्षा का प्रावधान करवा देना चाहिए था।
 
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India had committed big mistake in '1971, provision for protection of minorities should have been made then
बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार के खिलाफ प्रदर्शन - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

बांग्लादेश में हिंसा और विरोध प्रदर्शन के चलते प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर भारत आईं शेख हसीना ने पूरे घटनाक्रम पर पहली बार चुप्पी तोड़ी और आरोप लगाया कि उनकी सरकार को गिराने के पीछे अमेरिका का हाथ है। अमेरिका ने बांग्लादेश के लिए कोई ऐसा कार्य नहीं किया है, जिसके कारण वह बंगाल की खाड़ी में स्थित सेंट मार्टिन द्वीप अमेरिका को दे दे। लेकिन विचारणीय पहलू यह है कि भारत ने सन 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के लिए पाकिस्तान से युद्ध किया और 16 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान को बुरी तरह परास्त करके बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा की।



भारतीय सैनिकों ने पूर्वी पाकिस्तान में मौजूद 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों और उनके कमांडर जनरल नियाजी को आत्मसमर्पण करने के लिए विवश कर दिया था। इस युद्ध में 3,000 भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए और 12,000 घायल हुए। इसके अलावा इस युद्ध में भारत की एक पंचवर्षीय योजना पर होने वाले धन के बराबर धन खर्च हुआ, जबकि उस समय देश आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। यह धन देश की विकास योजनाओं पर खर्च किया जाना था। परंतु मानवता की पुकार के कारण भारत सरकार ने यह धन बांग्लादेश के निर्माण पर खर्च किया। युद्ध समाप्ति के बाद भारत सरकार और खासकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने विश्वस्तर पर अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता के बगैर ही बांग्लादेश का निर्माण कर दिया और युद्ध समाप्ति के 15 दिन बाद ही अपनी सेना को बांग्लादेश से वापस बुला लिया। यहां पर विचारणीय यह कि लंबे समय से पूरे पाकिस्तान में, जिसमें बांग्लादेश भी सम्मिलित है, हिंदू अल्पसंख्यकों पर तरह-तरह के अत्याचार हो रहे थे, जिसके कारण या तो वे पलायन कर रहे थे या फिर धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर हो रहे थे। आजादी से पहले 1946 में बांग्लादेश स्थित नोहा खाली नाम के स्थान पर हुए सांप्रदायिक दंगे में कई हिंदुओं की हत्याएं की गईं और महिलाओं से दुष्कर्म किए गए। महात्मा गांधी भी इन दंगों को नहीं रोक पाए थे।


1947 में पश्चिमी पाकिस्तान में हिंदू आबादी 18 फीसदी और पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में 25 फीसदी थी, लेकिन आज पाकिस्तान में हिंदू आबादी घटकर एक प्रतिशत और बांग्लादेश में केवल पांच फीसदी रह गई है। दोनों ही देशों से अब भी हिंदुओं पर किए जाने वाले अत्याचारों की खबरें आती रहती हैं। इतना सब होने के बाद भी बांग्लादेश को स्वतंत्रता दिलाने और उसका निर्माण करने में अपने 3,000 सैनिकों की कुर्बानी और अपनी एक पंचवर्षीय योजना का पूरा धन खर्च करने के बाद भी भारत सरकार बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए कोई पुख्ता इंतजाम नहीं कर पाई। न्याय और मानवता के आधार पर बांग्लादेश के संविधान में उसके निर्माण के समय ऐसे प्रावधान किए जा सकते थे, जिससे वहां की कानून व्यवस्था हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। उस समय बांग्लादेश की सरकार भारत की हर शर्त मानने के लिए तैयार थी, क्योंकि भारत ने ही उसे पाकिस्तान की गुलामी से मुक्ति दिलाई थी। पूरे विश्व के इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है, जहां पर किसी देश ने दूसरे देश को बांग्लादेश की तरह स्वतंत्रता दिलाई हो।

भारत ने बांग्लादेश के संविधान में सेक्युलर शब्द शामिल करवाया था। शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद आई नई सरकार ने  संविधान से सेक्युलर  शब्द हटाकर इस्लामिक देश घोषित कर दिया। इसके अलावा भारत की ओर से किए गए अनके आर्थिक अनुबंधों की वजह से बांग्लादेश आज दक्षिण एशिया की एक उभरती आर्थिक शक्ति बन रहा है। सीमाओं पर भी भारत ने उसे सुरक्षा प्रदान की है। पूरी बंगाल की खाड़ी में भारत की नौसेना अपनी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा के साथ-साथ बांग्लादेश की सीमाओं की सुरक्षा भी कर रही है। परंतु आज उसी बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर तरह-तरह के अत्याचार हो रहे हैं और उनकी महिलाओं के साथ दुष्कर्म किया जा रहा है, जिससे मानवता शर्मसार हो रही है।

इस समय भारत सरकार को चाहिए कि बांग्लादेश में जो भी सरकार आती है, उसे साफ शब्दों में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए प्रबंध करने के लिए कहे, अन्यथा भारत अपने आर्थिक संबंध बांग्लादेश से समाप्त कर देगा। उसके विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र में आवाज उठाकर उसको भी पाकिस्तान की तरह एक आतंकी देश घोषित करवा सकता है। इस्राइल एक छोट-सा देश है, लेकिन पूरे विश्व के यहूदियों को वह संरक्षण उपलब्ध करा रहा है। क्या भारत भी इस प्रकार हिंदुओं की रक्षा कर सकता है? परंतु हमारे देश में धर्म निरपेक्षता की आड़ में हिंदुओं की बात ही नहीं की जाती। अल्पसंख्यकों को वोट बैंक माना जाता है। बांग्लादेश और पाकिस्तान की घटनाओं को देखते हुए अब समय आ गया है कि भारत सरकार विश्व पटल पर खुलकर हिंदुओं की रक्षा की बात रखे।

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