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इंडिया इलेक्ट्स 2014

Sat, 27 Sep 2014 08:19 PM IST
सुदीप ठाकुर
सुदीप ठाकुर Updated Sat, 27 Sep 2014 08:19 PM IST
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india elects 2014 book review

जिस देश में हर महीने कहीं न कहीं चुनाव हो रहे हैं, वहां राजनीति किसी शगल से कम नहीं है। चौबीस घंटे वाले खबरिया टीवी चैनलों और मीडिया समूहों से जुड़ी वेबसाइट्स ने चुनावी विश्लेषणों को दिलचस्प बना दिया है। हालांकि, चुनाव पूर्व सर्वेक्षण और चुनाव के बाद नतीजों का विश्लेषण दो भिन्न चीजें हैं। भारत जैसे देश में, जहां 60 करोड़ से अधिक मतदाता चुनाव में हिस्सा लेते हैं, चुनाव परिणाम बदलते सामाजिक ताने-बाने, शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों के बदलते मिजाज और कुल मिलाकर देश की बदलती राजनीति को रेखांकित करते हैं। जाने-माने चुनाव विश्लेषक प्रणव राय, बटलर डेविड और अशोक लाहिड़ी ने 1980 के दशक में ‘ए कंपेंडियम ऑफ इंडियन इलेक्शन’ नाम से पहली बार लोकसभा और विधानसभा चुनावों का वृहत विश्लेषण पेश किया था। इसमें 1952 से लेकर 1980 तक के चुनावों का विश्लेषण किया गया था।

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इसके बाद इन तीनों ने 1991 में ‘इंडिया डिसाइड्स’ के नाम से 1952 से 1991 तक के चुनावों का विश्लेषण किया था। इसके अलावा भी चुनाव विश्लेषण का काम भिन्न संस्थानों और लेखकों ने किया है। ‘इलेक्शन्स इन इंडिया डॉट कॉम’ ने इस दिशा में अपनी एक पहचान बनाई है। ‘इंडिया इलेक्ट्स’ उसी का नया उपक्रम है। ‘इंडिया इलेक्ट्स’ में 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों का विश्लेषण किया गया है। इस किताब से प्रणव राय का बस इतना ही संबंध है कि उन्होंने इसकी प्रस्तावना लिखी है। ‘इंडिया इलेक्ट्स’ के संपादक और निदेशक डॉ. आरके ठुकराल हैं। वास्तव में भारत में डाटा एनालिसिस ही अपने आपमें बेहद जटिल काम है। जब बात चुनावों की आती है, तो यह अपने आप में और कठिन हो जाता है। दुनिया के देश इस बात से हैरान होंगे कि हमारे देश में लद्दाख जैसा सबसे बड़ा लोकसभा क्षेत्र है, जिसका भौगोलिक क्षेत्र बांग्लादेश, नेपाल और उत्तर कोरिया जैसे देशों से भी बड़ा है!
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मई में हुए लोकसभा चुनाव पर संभवतः यह पहला वृहत विश्लेषण है। इसमें 205 नक्शों और 235 ग्राफों के जरिये पंद्रहवीं और सोलहवीं लोकसभा के चुनावों का विश्लेषण किया गया है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में वोटों के बदलते पैटर्न का पता चलता है। मसलन, 2009 में यूपीए को जहां ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों क्रमशः 32.56 फीसदी और 54.05 फीसदी वोट मिले थे, वहीं 2014 में भाजपा को क्रमशः 54.65 फीसदी और 59.46 फीसदी मत मिले।
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2014 के चुनाव पूरी तरह से नरेंद्र मोदी पर केंद्रित हो गए थे। भाजपा का यह दांव सही भी साबित हुआ, क्योंकि उनकी अगुआई में पार्टी ने अकेले 282 सीटें जीत लीं। मगर सच यह भी है कि भाजपा को कुल 31 फीसदी वोट मिले हैं। यह जानना वाकई दिलचस्प है कि 2009 की तुलना में एनडीए ने 13 फीसदी अधिक वोट हासिल कर जहां 336 सीटें हासिल की वहीं, तकरीबन 13 फीसदी कम वोट हासिल कर यूपीए सिर्फ 59 सीटों पर सिमट गया! मगर इससे भी अहम बात यह भी है कि छह राष्ट्रीय पार्टियों को, जिनमें बसपा, सीपीएम, सीपीआई, एनसीपी भी शामिल हैं, कुल 60.04 फीसदी वोट मिले हैं। वहीं राज्य स्तरीय पार्टियों, छोटे और गैर मान्यता प्राप्त दलों एवं निर्दलीय के पास 40 फीसदी वोट हैं।


चुनावी आंकड़ों, विश्लेषणों वाली इस किताब में हालांकि एक महत्वपूर्ण तथ्य की अनदेखी कर दी गई है। आरके ठुकराल ने 2014 के लोकसभा चुनाव के संदर्भ में लिखा है कि ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी गैर कांग्रेसी पार्टी ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया। यह ठीक नहीं है। सही बात तो यह है कि 1977 के चुनाव में पहली बार किसी गैर कांग्रेसी दल ने अपने दम पर बहुमत हासिल किया था। बेशक, वह चुनाव जनता पार्टी के नाम पर लड़ा गया था, जिसमें संगठन कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, जनसंघ और भारतीय लोकदल जैसे दल शामिल थे। लेकिन वास्तविकता यह है कि उस समय जनता पार्टी का पंजीयन चुनाव आयोग में नहीं हुआ था। उस समय जनता पार्टी के सारे उम्मीदवारों ने भारतीय लोकदल के चुनाव चिह्न हलधर किसान पर चुनाव लड़ा था। भारतीय लोकदल को कुल 295 सीटें मिली थीं। आश्चर्य की बात है कि इतनी महत्वपूर्ण जानकारी को इंडिया इलेक्ट्स में कैसे अनदेखा कर दिया गया।

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