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विश्लेषण: मजबूत होती अर्थव्यवस्था, तो शेयर बाजारों में यह निराशा क्यों?

Tue, 13 Feb 2024 07:09 AM IST
Ajay Bagga अजय बग्गा
Updated Tue, 13 Feb 2024 07:09 AM IST
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सार
पिछले 12 महीनों में ऋण दरों में औसतन 19 आधार अंकों की वृद्धि हुई है, जबकि जमा दरों में 80 आधार अंकों की तेज वृद्धि हुई है। चूंकि बैंकों के लिए जमा वृद्धि की तुलना में ऋण वृद्धि तेजी से बढ़ी है, इसलिए रिजर्व बैंक ने असुरक्षित खुदरा ऋण वृद्धि को कम करने के लिए और अधिक उपायों की घोषणा की है।
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India economy is strong then why is there disappointment in the stock market
भारतीय अर्थव्यवस्था - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बीते दिनों छह से आठ फरवरी के बीच भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की वित्तीय वर्ष 2024 की आखिरी बैठक संपन्न हुई, जिसके नतीजे काफी हद तक उम्मीदों के मुताबिक रहे। लेकिन सरकारी बॉन्डों का रिटर्न (लाभ) बढ़ गया और इसकी घोषणा होते ही शेयर बाजार में मामूली गिरावट देखने को मिली। जब एमपीसी का रुख काफी हद तक अपेक्षा के अनुकूल ही था, तो शेयर बाजारों में यह निराशा क्यों?



इस बैठक में एमपीसी ने सभी दरों को मौजूदा स्तर पर बनाए रखने का फैसला किया। यह लगातार छठी बार है, जब रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है। अर्थव्यवस्था में मजबूत विकास के मद्देनजर जीडीपी विकास का पूर्वानुमान उच्च स्तर पर रखा गया है। संसद में पेश अंतरिम केंद्रीय बजट के आंकड़ों के आधार पर वित्तीय घाटे को नियंत्रण में रखने की भी सराहना की गई। अनुमान लगाया गया कि मुद्रास्फीति लगातार कम होगी और वित्त वर्ष 2025 में औसत मुद्रास्फीति दर 4.5 फीसदी रहेगी। लेकिन चार कारणों से नीतिगत घोषणा अनुमान से अधिक कठोर रही। पहला, मुद्रास्फीति के दबाव को नियंत्रित करने के लिए अर्थव्यवस्था में धन आपूर्ति पर अंकुश लगाया जाएगा। फरवरी, 2023 से फरवरी, 2024 के शुरू तक पिछले 12 महीनों में रिजर्व बैंक ने तरलता पांच लाख करोड़ रुपये के बड़े दैनिक अधिशेष से घटाकर 1.1 लाख करोड़ रुपये के दैनिक घाटे में ला दिया है। बाजार इस तरलता घाटे को रिजर्व बैंक द्वारा पहले की गई दरों में बढ़ोतरी के तेजी से हस्तांतरण के रूप में देखता है।


वास्तव में, पिछले 12 महीनों में ऋण दरों में औसतन 19 आधार अंकों की वृद्धि हुई है, जबकि जमा दरों में 80 आधार अंकों की तेज वृद्धि हुई है। चूंकि बैंकों के लिए जमा वृद्धि की तुलना में ऋण वृद्धि तेजी से बढ़ी है, इसलिए रिजर्व बैंक ने असुरक्षित खुदरा ऋण वृद्धि को कम करने के लिए और अधिक उपायों की घोषणा की है। ऐसे में, उम्मीद यह थी कि रिजर्व बैंक तरलता बढ़ाने वाले कुछ उपायों की घोषणा करेगा और बैंकों की तरलता बढ़ाने के लिए नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) पर भी कुछ राहत देगा। लेकिन ऐसे किसी उपाय की घोषणा तो नहीं ही की गई, नीतिगत रुख को भी तटस्थ स्तर पर नहीं रखा गया। यह दूसरा कारण था, जिसने बाजार को अस्थिर किया।

तीसरा बिंदु अपेक्षित था, फिर भी इसने बॉन्ड और शेयर बाजारों को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया। वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंक इस सूचना को बार-बार प्रसारित करने के प्रति सतर्क रहे हैं कि वे ब्याज दरों में कटौती बाद में और बाजार की अपेक्षा से धीमी गति से करने के बारे में सोचेंगे। भारत में भी बाजार को उम्मीद थी कि अप्रैल से जून में रिजर्व बैंक दरों में कटौती करेगा। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने स्पष्ट किया कि मुद्रास्फीति के जोखिम अब भी संतुलित हैं, खासकर लाल सागर के व्यवधान और तेल की कीमतों के प्रभाव को देखते हुए। बाजार में इसे कठोर रुख के रूप में देखा गया और दर में कटौती की उम्मीदें आगे चली गईं। नतीजतन बॉन्ड पर रिटर्न बढ़ गया और बैंकों के शेयर में मामूली गिरावट देखी गई।

चौथा बिंदु उपभोक्ताओं के समर्थन में उठाए गए कदम को लेकर था, जिसके तहत रिजर्व बैंक ने बैंकों के लिए ऋण ग्राहकों की खातिर सभी शुल्कों को एक ब्याज दर गणना में शामिल करना अनिवार्य कर दिया। हम देखते हैं कि बैंक ऋण के लिए आकर्षक ब्याज दर की घोषणा करते हैं, मसलन वे 8.4 फीसदी ब्याज दर की घोषणा करते हैं, और फिर उसमें प्रोसेसिंग फीस, डाक्यूमेंटेशन फीस, अग्रिम ईएमआई और न जाने क्या-क्या जोड़ देते हैं। इतने सारे शुल्कों के कारण ग्राहकों को यह पता ही नहीं चल पाता कि उनके ऋण की वास्तविक लागत क्या है। इसलिए रिजर्व बैंक ने बैंकों के लिए सर्व-समावेशी ऋण दर घोषित करना अनिवार्य कर दिया है। इससे बैंकों के लाभ पर असर पड़ सकता है, खासकर निजी बैंकों को, जो ऐसे बहुत से शुल्क वसूलते हैं। अगले तीन महीनों में बैंकिंग प्रणाली 1.5 से 2.5 लाख करोड़ रुपये के घाटे में रह सकती है, बशर्ते रिजर्व बैंक तरलता बढ़ाने के लिए कोई उपाय नहीं कर देता। तरलता की आपूर्ति में कमी ने नीतिगत हस्तांतरण में तेजी ला दी है, लेकिन कम तरलता और बैंक ऋण पर सख्ती के साथ यह चिंता भी है कि ऋण वृद्धि में मौजूदा मजबूती कायम नहीं रह सकती है। यह बैंकों के लिए आत्म-सुधार तंत्र के रूप में कार्य कर सकता है और हम तरलता पर अधिक संतुलित रुख देख सकते हैं: बहुत सख्त नहीं, लेकिन बहुत ढीला भी नहीं।

अनुमान है कि जुलाई में जब वित्त वर्ष 2025 के लिए पूर्ण केंद्रीय बजट पेश किया जाएगा, तब रिजर्व बैंक सबसे पहले तरलता को ज्यादा संतुलित स्तर पर ले जाएगा। फिर यह अपने नीतिगत रुख को वर्तमान प्रतिबंधात्मक स्तर से बदलकर तटस्थ कर देगा। और तीसरे चरण में वास्तविक दर में कटौती शुरू हो जाएगी। इस मामले में बहुत कुछ अमेरिकी फेड, यूरोप के ईसीबी और बैंक ऑफ इंग्लैंड के रुख पर निर्भर करेगा। उम्मीद है कि जून-जुलाई में ये सब केंद्रीय बैंक दरों में कटौती शुरू कर देंगे। इसलिए रिजर्व बैंक भी अगस्त या अक्तूबर में पहली बार दर में कटौती करेगा। रिजर्व बैंक के पिछले रिकॉर्ड के विश्लेषण से पता चलता है कि यह आम तौर पर अपना नीतिगत रुख बदलने में सुस्त रहा है, जो दरों की तुलना में ब्याज दरों से काफी निकटता से जुड़ा हुआ है। लेकिन एक बार जब ब्याज दरों में कटौती शुरू हो जाएगी, तो उम्मीद है कि एमपीसी की चार बैठकों में 100 आधार अंकों या ब्याज दर में एक प्रति की कटौती होगी। भारतीय अर्थव्यवस्था में इतनी ताकत है कि यह रिजर्व बैंक को कटौती की सुविधा देगी।

जाहिर है, बैंकों में ऋण वृद्धि धीमी हो जाएगी, जमा दरें कम से कम जून-जुलाई तक ऊंची रहेंगी और लाभ में कमी आएगी, क्योंकि धन की लागत ऋण शुल्क से अधिक बढ़ जाएगी। ऐसे में बैंकों का प्रदर्शन खराब हो सकता है। जहां तक बॉन्ड रिटर्न की बात है, जुलाई, 2024 तक धीरे-धीरे इसमें गिरावट आएगी और उसके बाद तेज गिरावट आएगी, क्योंकि बॉन्ड बाजार रिजर्व बैंक द्वारा दर में कटौती की उम्मीद करेगा और इसी उम्मीद में रिटर्न घटा देगा। फिलहाल एमपीसी ने इन सबको स्थगित रखा है, जिसे रिजर्व बैंक के कठोर रुख के रूप में देखा जा रहा है।

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