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सीमा विवाद: नाम बदलने से कुछ नहीं बदलेगा, अरुणाचल भारत का हिस्सा है और रहेगा

Tue, 11 Apr 2023 07:08 AM IST
Shivdan Singh शिवदान सिंह
Updated Tue, 11 Apr 2023 07:08 AM IST
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सार
यह जानते हुए भी, कि यह 1962 का भारत नहीं है, चीन अरुणाचल में नाम बदलने की हरकत कर रहा है। अरुणाचल भारत का हिस्सा है और रहेगा।
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India China Border Dispute pla attempt to rename places will not alter reality in Arunachal Pradesh
अरुणाचल प्रदेश - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

कुछ दिन पहले चीन ने अरुणाचल प्रदेश के 11 स्थानों के नाम बदलकर उन्हें दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताया, जिसे भारत सरकार ने कठोर शब्दों में नकार दिया है। चीन ने ऐसा तब किया, जब कुछ दिन में ही उसके रक्षामंत्री भारत में होने वाली शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में हिस्सा लेने आने वाले हैं। मई में चीनी विदेश मंत्री भी भारत का दौरा करने वाले हैं।


पड़ोसी देशों की जमीन पर कब्जा करने की प्रक्रिया चीन ने 1949 में तब प्रारंभ की, जब वहां कम्युनिस्ट पार्टी का शासन लागू हुआ तथा माओ प्रमुख बने। जब चीन ने 1950 में तिब्बत पर कब्जा किया, तब वहां की मोइनबा जाति के लोगों ने पलायन कर भारत के अरुणाचल में शरण ली। ये लोग बौद्ध हैं और दलाई लामा को अपना शासक मानते हैं। ऐसे में, जिस भी क्षेत्र में मोइनबा जाति के लोगों ने शरण ली, उसी को चीन ने दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताना शुरू कर दिया।


वर्ष 1950 में चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जे के लिए उसकी आलोचना पूरे विश्व के गैर कम्युनिस्ट देशों ने की, पर तब भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उस पर चुप्पी साधकर एक तरह से तिब्बत पर चीनी कब्जे को स्वीकृति प्रदान की। वर्ष 1959 में जब दलाई लामा को लगा कि चीन उन्हें गिरफ्तार कर सकता है, तब उन्होंने भारत में शरण ली। भारत तो चीन के साथ अपने संबंध मजबूत करना चाहता था, पर भारत के प्रति द्वेष की भावना रखने वाला चीन सोचता था कि तिब्बत के विद्रोहियों को अमेरिका भारत के रास्ते ही मदद दे रहा है।

दलाई लामा ने भारत में प्रवेश करने के दो दिन बाद ही तिब्बत पर चीन के कब्जे के विरोध में संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव पेश कर दिया, जहां इस प्रस्ताव पर काफी बहस के बाद उसे बहुमत से पारित कर दिया गया। पर उस कार्यवाही में भारत ने उदासीन रुख ही अपनाया। नेहरू ने लोकसभा में बयान भी दिया कि इस मुद्दे पर भारत दलाई लामा के साथ नहीं है। नेहरू मान बैठे थे कि चीन कभी भारत पर हमला नहीं करेगा। पर शुरू से ही चीन इस सीमा पर आक्रामक कार्रवाई करता रहा।

अक्तूबर, 1962 में चीन ने भारत पर अचानक हमला कर दिया। संसाधनों की कमी, पुराने हथियार और तोपखाने व वायुसेना की मदद उपलब्ध न होने के कारण भारत को बुरी हार का सामना करना पड़ा और चीन ने 38,000 वर्ग किलोमीटर में फैले अक्साई चिन क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। वर्ष 1967 में चीन ने सिक्किम पर कब्जा करने के लिए नाथूला पर हमला किया, पर हमारी सेना ने करारा जवाब देते हुए चीनी सैनिकों को पीछे धकेल दिया। फिर वर्ष 1986 में चीन ने सुमदोरोंग चू घाटी में हेलीपैड बनाने की कोशिश की, पर भारतीय सेना ने जनरल सुंदरजी की कमांड में उसे नाकाम कर चीन को संदेश दिया कि वह भविष्य में इस तरह की हरकत न करे।

1962 की हार के बाद पूरे देश में हार के कारणों का पता लगाने की मांग उठी थी। तब रक्षा मंत्रालय ने सेना के दो वरिष्ठ अधिकारियों-जनरल हैंडरसन और ब्रिगेडियर भगत के नेतृत्व में जांच आयोग का गठन किया था। पर आयोग द्वारा तैयार रिपोर्ट में संवेदनशील तथ्यों के कारण तत्कालीन सरकार ने उसे सार्वजनिक करने से मना कर दिया था, जबकि भाजपा ने रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की थी। पर विडंबना देखिए कि सत्ता में आने पर खुद भाजपा ने उस रिपोर्ट को गोपनीयता के नाम पर सार्वजनिक करने से मना कर दिया!

उसके बाद भारत-चीन के बीच तनाव कम करने के लिए उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडलों की वार्ता शुरू हुई। वर्ष 1996 में आपसी विश्वास बहाली के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जिसमें प्रावधान था कि सीमा पर अग्रिम इलाकों में दोनों देशों की सेनाएं बगैर हथियारों के गश्त करेंगी। इसी समझौते के तहत गलवान में भारतीय सैनिक बगैर हथियारों के गए, पर चीनी सैनिक कंटीले तार लगे डंडों के साथ आए। फिर भी भारतीय सैनिकों ने उनका डटकर मुकाबला किया और उन्हें खदेड़ा। इस तरह चीन को सख्त संदेश गया है कि यह 1962 का भारत नहीं है। इसके बावजूद चीन अरुणाचल में जगहों के नाम बदलने की हरकत कर रहा है, जिससे कुछ बदलने वाला नहीं है। अरुणाचल भारत का हिस्सा है और रहेगा।  
-लेखक, सेवानिवृत्त कर्नल हैं।
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