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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   India Beyond the OMR Sheet A Need for Opportunity Creation Not Just Jobs

ओएमआर शीट से आगे का भारत: नौकरी नहीं, अवसर सृजन की जरूरत

Thu, 11 Jun 2026 07:28 AM IST
नितिन गौतम कुमार रोहित, अमर उजाला
कुमार रोहित, अमर उजाला Published by: नितिन गौतम Updated Thu, 11 Jun 2026 07:28 AM IST
सार

जरूरी है कि युवाओं को सुरक्षित नौकरी के भ्रम से निकालकर नवाचार, मूल्य-सृजन और उद्योग निर्माण की ओर प्रेरित किया जाए।
 

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India Beyond the OMR Sheet A Need for Opportunity Creation Not Just Jobs
युवाओँं को नवाचार से जोड़ने की जरूरत - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

प्रयागराज के सलोरी, पटना के मुसल्लहपुर हाट, कोटा की संकरी गलियों और झारखंड-बिहार के छोटे कस्बों में रात दो बजे तक जलती टेबल लैंप की रोशनी केवल पढ़ाई का दृश्य नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की बेचैनी, असुरक्षा और ‘सुरक्षित भविष्य’ के सपने की अंतिम लौ है। उस छोटे कमरे में बैठा युवा केवल मेडिकल या सरकारी नौकरी की तैयारी नहीं कर रहा, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है। प्रश्न यह है कि क्या यह अंतहीन दौड़ उसे सचमुच प्रगति की ओर ले जा रही है, या वह सामाजिक अपेक्षाओं के भंवरजाल में फंस कर अपनी रचनात्मक ऊर्जा गंवा रहा है?
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भारत में नीट, यूपीएससी, एसएससी व राज्य स्तरीय भर्ती परीक्षाएं अब केवल रोजगार का माध्यम नहीं रहीं; वे सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक स्वाभिमान का प्रतीक बन चुकी हैं। वर्ष 2024 में नीट-यूजी के लिए 24 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने पंजीकरण कराया, जबकि एमबीबीएस की सीटें लगभग 1.10 लाख थीं। यानी एक सीट पर औसतन 22 छात्र प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। यह उस सामाजिक मानसिकता का प्रमाण है, जिसने युवाओं की कल्पनाशक्ति को संकुचित कर दिया है।
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लाखों युवा अपने जीवन के पांच से आठ बहुमूल्य वर्ष केवल परीक्षाओं की तैयारी में लगा देते हैं। उनकी युवावस्था का सबसे उत्पादक समय एक ऐसे ‘ट्रेडमिल’ पर बीतता है, जहां दौड़ने वाले अनगिनत हैं, लेकिन मंजिल तक पहुंचने वाले मुट्ठी भर। इस व्यवस्था को सबसे अधिक बढ़ावा ‘कोचिंग इकनॉमी’ और सफल प्रतियोगियों के महिमामंडन ने दिया है। सफलता अब एक उत्पाद की तरह बेची जा रही है। परिवार इस उम्मीद में जीवनभर की पूंजी दांव पर लगा देते हैं कि घर का कोई सदस्य डॉक्टर या प्रशासनिक अधिकारी बन जाए। लेकिन इस प्रक्रिया में युवाओं का जोखिम उठाने का साहस खत्म होने लगता है। यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय उत्पादकता का गंभीर संकट है। हमारी शिक्षा व्यवस्था युवाओं को ‘क्रिएटर’ बनाने के बजाय ‘जॉब सीकर’ बना रही है।
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सोशल मीडिया, रील्स की अंतहीन स्क्रॉलिंग और प्रदर्शन की संस्कृति ने युवाओं की एकाग्रता को बिखेर दिया है। प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव और डिजिटल भटकाव मिलकर अवसाद, अकेलेपन और आत्महीनता का ऐसा वातावरण बना रहे हैं, जिसकी दर्दनाक झलक कोटा जैसी जगहों से आने वाली खबरों में दिखती है।

अब प्रश्न केवल परीक्षा प्रणाली में सुधार का नहीं, बल्कि भारत की समग्र विकास-दृष्टि बदलने का है। यदि 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य हासिल करना है, तो युवाओं को ‘सरकारी नौकरी की कतार’ से निकालकर ‘उद्योग निर्माण’ की दिशा में अग्रसर करना होगा। इसके लिए ख्यातिप्राप्त प्रबंधन और उच्च शिक्षण संस्थानों को ‘उद्यम सृजन केंद्रों’ में रूपांतरित होना होगा। उच्च शिक्षा में उद्यमिता, स्थानीय उद्योग, सूक्ष्म-विनिर्माण और कृषि-आधारित उद्योगों को वही महत्व देना होगा, जो आज कॉरपोरेट प्लेसमेंट को प्राप्त है। युवाओं में यह विश्वास जगाना होगा कि वे केवल नौकरी पाने वाले नहीं, बल्कि नए रोजगार, उद्योग और नए भारत के निर्माता भी बन सकते हैं। दूसरा महत्वपूर्ण कदम ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों का औद्योगिकीकरण है। भारत के गांव केवल सस्ते श्रम के केंद्र नहीं, बल्कि अगली औद्योगिक क्रांति का आधार बन सकते हैं। कृषि-प्रसंस्करण, मिलेट (श्रीअन्न), वनौषधि, खाद्य प्रसंस्करण, बांस उद्योग और स्थानीय हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में अपार संभावनाएं हैं। यदि ग्रामीण युवाओं को उन्नत तकनीक, सुलभ वित्त और प्रभावी विपणन सहायता मिले, तो छोटे कस्बों में ही हजारों सूक्ष्म उद्योग विकसित किए जा सकते हैं।

इस संदर्भ में चीन का 'टाउनशिप एंड विलेज एंटरप्राइजेज' मॉडल और जर्मनी का ‘मितलस्टैंड’ मॉडल हमारे लिए अनुकरणीय हो सकते हैं, जिन्होंने स्थानीय लघु उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाया। हमें मुद्रा और पीएमईजीपी जैसी योजनाओं को कागजी आंकड़ों से निकालकर वास्तविक युवा उद्यमिता से जोड़ना होगा। जब तक हर कौशल, श्रम और उद्यम को समान सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक युवा सीमित नौकरियों की मृगतृष्णा में अपना समय और ऊर्जा झोंकते रहेंगे।

भारत की सबसे बड़ी पूंजी उसकी युवा शक्ति है। अब समय है कि युवाओं को सुरक्षित नौकरी के भ्रम से निकालकर नवाचार, मूल्य-सृजन और उद्योग निर्माण की ओर प्रेरित किया जाए। राष्ट्र नौकरी खोजने वालों से नहीं, बल्कि अवसर और भविष्य गढ़ने वालों से महान बनते हैं।
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