और नजदीक आएंगे भारत-अमेरिका
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करिश्माई नेतृत्व और दृढ़ता के साथ बराक ओबामा एक बार फिर ह्वाइट हाउस में प्रवेश कर रहे हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि सफल वैश्विक रणनीति और घरेलू मोरचे पर निपटते हुए वह अपने देश को आगे ले जाएंगे। इस चुनाव में वह मतदाताओं को इस भरोसे में लेने में सफल रहे कि अमेरिकी समाज की जो चिंताएं हैं, उनके लिए पूरी तरह जूझने का कौशल उनमें है। उनके सामने चुनौतियां बहुत साफ नजर आती हैं। देश के अंदर उन्हें जहां आर्थिक ढांचा मजबूत करने के साथ बेरोजगारी कम करने के लिए जद्दोजहद करनी होगी, वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें अमेरिकी सर्वोच्चता वैसे समय स्थापित करनी होगी, जब अफगानिस्तान से सेना की वापसी होनी है और मध्य पूर्व के देश अशांत हैं। उन्हें आतंकवाद के खिलाफ भी लड़ना है।
सवाल यह है कि ओबामा की दूसरी जीत के बाद अमेरिका के लिए भारत की क्या अहमियत हो सकती है। दोनों देशों के रिश्ते निरंतर आगे बढ़ रहे हैं। दरअसल ओबामा यह चाहेंगे कि उन्हें भारत-अमेरिकी दोस्ती के लिए जाना जाए। हिंद महासागर में ट्रेड रूट को मजबूत करना उनकी जरूरत है। अफगानिस्तान और ईरान में अमेरिका अभी जिस तरह उलझा हुआ है, यह देखते हुए उसे भारत की जरूरत है। हिंद महासागर में चीन अपने पांव जमाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे समय अमेरिका के लिए भारत जैसे साथी की जरूरत बनी रहेगी। पर भारत के साथ रिश्तों में प्रगाढ़ता का अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका पाकिस्तान को दुत्कारने वाला है। अफगानिस्तान, ईरान और इसलामी मंच ऐसी जटिल पहेली हैं कि पाकिस्तान को वह खुद से दूर नहीं कर सकता।
जहां तक वैश्विक परिदृश्य का सवाल है, अमेरिका को इस्राइल और फलस्तीन के मुद्दे पर संतुलन स्थापित करना है। ओबामा प्रशासन पर इसका दबाव भी रहेगा कि उसकी छवि इसलाम-विरोधी न दिखे। इसलिए अरब-इसलामी देशों के बीच उसे साख बनानी है। अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी भी आसान काम नहीं। वहां के अंदरूनी हालात चिंता का विषय बने हुए हैं। राष्ट्रपति बनने के बाद ओबामा की रणनीति यही थी कि विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी और बुश की छवि इसलाम-विरोधी के तौर पर नजर आए। पर समय के साथ उन्हें भी बुश की तरह आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी। अब ओबामा की कोशिश यही होगी कि इसलामी देश आतंकवाद के खिलाफ लड़ रहे अमेरिका को शत्रु की तरह न देखें।
एक बात बहुत साफ है कि नीतियां बदलेंगी नहीं। ओबामा ने स्वास्थ्य और शिक्षा पर जोर दिया है। लिहाजा रोजगार और बुनियादी संसाधनों को बढ़ाने पर उनका ध्यान रहेगा। तमाम कोशिशों के बाद भी अमेरिका में बेरोजगारी बढ़ी है। सैंडी के असर वाले क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन और बुनियादी ढांचे में सुधार कर रोजगार बढ़ाने की बात हो सकती है। लेकिन निवेश और उद्यम के लिए तो ठोस, व्यावहारिक और दीर्घकालीन नीति की जरूरत होगी।
ओबामा प्रशासन को समझना होगा कि अमेरिकी उद्यमी केवल अपने देश के संसाधनों पर निर्भर नहीं रह सकते। बाहर के विशेषज्ञों और सुलभ श्रम को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। अपनी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए दूसरी पारी में ओबामा हरसंभव प्रयास करेंगे। भारतीय बाजार को इसके लिए तैयार रहना होगा। भारत में उनके लिए मुश्किलें नहीं है। पर इतना देखना होगा कि भारत में अमेरिकी निवेश से यहां का माहौल न बिगड़े। ऐसा न लगे कि लोगों का रोजगार छीना जा रहा है। ऐसे में ओबामा सरकार चाहेगी कि उसकी छवि दूसरे के बसे-बसाए रोजगार को उजाड़ने वाली न बनकर रह जाए। यही बात वीजा के मामले में भी है। उम्मीद करनी चाहिए कि ओबामा प्रशासन वीजा मामले में नरम रवैया अपनाए रखेगा।
यह संयोग ही है कि इसी समय चीन में भी नेतृत्व में बदलाव हो रहा है। बीजिंग का लक्ष्य अगले बीस साल में अमेरिका से हर क्षेत्र में आगे बढ़ने का है। ऐसे में ओबामा प्रशासन चीन के खिलाफ एक प्रतिद्वंद्वी की तरह तो नजर आना चाहेगा, लेकिन शत्रु की तरह नहीं, क्योंकि अमेरिका फिलहाल कई मोरचों पर उलझा हुआ है। वह चीन से उलझना नहीं चाहेगा।