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बांग्ला मुक्ति संघर्ष का अधूरा संकल्प

राजीव चंद्रशेखर, राज्यसभा सदस्य Updated Sun, 17 Dec 2017 01:12 PM IST
पूर्व सैनिक
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आज पाकिस्तान पर भारत की निर्णायक जीत और देश में पाकिस्तानी सेना के भारतीय सेना के समक्ष समर्पण की 46वीं वर्षगांठ है। यह दिन हमारे सशस्त्र बलों के योगदान और भारत-पाकिस्तान युद्ध में लड़ने वाले जांबाज सैनिकों को याद करने का दिन है। हर वर्ष 16 दिसंबर को इसीलिए विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। श्रद्धांजलियों और योगदान को याद करने के साथ ही हमें खुद से यह सवाल नहीं करना चाहिए कि क्या हम हमारे सशस्त्र बलों और उनके परिजनों को पर्याप्त सम्मान दे पा रहे हैं? हमारे सशस्त्र बल जिस सम्मान के हकदार हैं, वह उन्हें मिलना ही चाहिए। 


इन वर्षों में हमारे सशत्र बलों के जवानों को बहुत से ऐसे मुद्दों से जूझना पड़ा है, जिनका समाधान जरूरी है। कुछ समय से सेवारत और सेवानिवृत्त सेना के जवानों और अधिकारियों में गैर सैन्य कर्मचारियों की तुलना में कमतर रैंक और वेतन का मुद्दा चिंता का कारण रहा है।


इस वजह से सशस्त्र बलों में नाखुशी रही है। इस मुद्दे पर रक्षा मंत्री की अगुआई में एक कमेटी गौर कर रही है और मुझे उम्मीद है कि इसे जल्द ही सुलझा लिया जाएगा। ऐसे अनेक मामले हैं, जब हमारे सेवानिवृत्त सैनिकों को लंबी और पीड़ादायक अदालती लड़ाइयों के बाद ही  उनका बकाया मिल सका, खासतौर से अपंगता पेंशन के मामले में तो स्थिति और भी बुरी है।

जनवरी, 2014 में मैंने तत्कालीन रक्षा मंत्री ए के एंटनी को पत्र लिखकर पूर्व सैनिक कल्याण विभाग की उस विज्ञप्ति को वापस लेने का आग्रह किया था, जिसमें कहा गया था कि जिन पूर्व सैनिकों ने अपंगता और पेंशन संबंधी मामलों में रक्षा मंत्रालय को अदालतों में घसीटा है, उन्हें अपने मामले सर्वोच्च अदालत तक ले जाने होंगे।

इसके बाद यह विज्ञप्ति वापस ले ली गई थी। हालांकि यह पीड़ादायक है कि 2014-16 के दौरान सैनिकों के खिलाफ सिर्फ अपंगता पेंशन के मामले में कुल 794 अपीलें दर्ज थीं। जनवरी, 2014 में पूर्व सैनिक कल्याण बोर्ड ने अपनी विज्ञप्ति तो वापस ले ली थी, लेकिन अप्रैल, 2016 में नए निर्देश जारी कर दिए कि अपंगता पेंशन और अन्य लाभ से संबंधित सारे मामलों में स्वतः ही अपीलें दायर की जाएं।

इस वर्ष जून में उसने फिर से एक नया आदेश जारी किया कि अदालती आदेशों को चुनौती न दी जाए और उसने प्रतिरक्षा बलों से कहा कि वे अपने सैनिकों को अपंगता पेंशन प्रदान करें। इसी वर्ष जुलाई में मैंने रक्षा मंत्री को पत्र लिखकर सरकार से अपील की कि वह अपंगता पेंशन और अन्य लाभ से संबंधित सारी लंबित अपीलें वापस ले।

मैंने जोर देकर यह भी कहा कि पूर्व सैनिक कल्याण विभाग के जून में दिए आदेश को ही अंतिम माना जाना चाहिए और भविष्य में किसी तरह का विरोधाभासी आदेश जारी नहीं किया जाना चाहिए। 

हाल ही में सातवें वेतन आयोग से जुड़ा एक मुद्दा सामने आया था, जिसमें सशस्त्र बलों के शहीदों और अपंग जवानों के बच्चों को शिक्षा के लिए मिलने वाली मदद की सीमा सिर्फ 10,000 रुपये करने की सिफारिश की गई।

सशस्त्र बलों के शहीदों के बच्चों की शिक्षा का खर्च उठाने की घोषणा 18 दिसंबर, 1971 को की गई थी और 1972 में लोकसभा में इससे संबंधित विधेयक लाया गया, जिसमें ऐसे बच्चों के शैक्षणिक शुल्क तथा स्कूल के अन्य सभी तरह के शुल्क को मुफ्त करने का प्रावधान किया गया। यह एक राष्ट्र का उन सैनिकों की विधवाओं और बच्चों के प्रति जताया गया छोटा-सा सम्मान था, जिन्होंने 1971 के युद्ध में अपनी जान गंवाई थी। 

मैं यह मानता हूं कि हमारे शहीदों के परिवारों के साथ किए गए वायदों को न तो वापस लेना चाहिए न ही उन्हें कम करना चाहिए। हमें हमारे लिए अपनी जान गंवा देने वाले सैनिकों के बच्चों को मदद करने की अपनी नैतिक प्रतिबद्धता से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए। यह एक बहुत छोटा-सा कदम है, जो हम उठा सकते हैं।

ऐसे भी मामले हैं, जब वीर नारी या युद्ध विधवाओं और बुजुर्ग पूर्व सैनिकों को उनको वाजिब पेंशन संबंधी लाभों से कुछ अनावश्यक तकनीकी कारणों से वंचित किया गया है।

हाल ही में सेना के एक जूनियर कमीशंड ऑफिसर (जेसीओ) जिन्हें तीसरे वीरता पुरस्कार शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था, की विधवा ने सशत्र बल प्राधिकरण (एएफटी) से अपनी पारिवारिक पेंशन जारी करवाने के लिए संपर्क किया, जिसे प्रतिरक्षा लेखा के मुख्य नियंत्रक ने 2007 के बाद से रोक रखा था।

मैंने ट्विट के जरिये यह जानकारी जब रक्षा मंत्री के संज्ञान में लाई तो तुरंत उन्होंने हस्तक्षेप कर इस वीर नारी का सारा बकाया जारी करवाया। हम सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं कि इस वीर नारी को इन दस वर्षों में कितनी तकलीफ उठानी पड़ी होगी। ऐसे सारे मामलों को संवेदनशीलता के साथ देखने की जरूरत है और इन्हें देखने वाले कर्मचारियों को भी समुचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। 

मुझे जरा भी संदेह नहीं है कि प्रत्येक भारतीय देश की सेवा करने वाले पुरुषों और महिलाओं तथा उनके परिवार का सम्मान करते हैं। जब कभी भी कोई सैनिक शहीद होता है, तो भावनाओं का ज्वार उमड़ पडता है। कुछ महीने पूर्व जब युवा लेफ्टिनेंट उमर फयाज की आतंकवादियों ने अपहरण कर हत्या कर दी थी, तब उनके समर्थन में ऑनलाइन श्रद्धांजलियां तो दी ही गईं, इंडिया गेट पर भी हजारों लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे।

लेकिन ऐसी भावनाएं व्यवस्थागत खामियों को दूर नहीं कर सकी हैं। हमें न केवल व्यवस्था में सुधार की जरूरत है, बल्कि यह संकल्प लेने की भी जरूरत है कि हम सैनिकों और उनके परिजनों का पूरा ध्यान रखेंगे। 

युद्ध और शांतिकाल में हमारे जवान देश की जो सेवा और बलिदान करते हैं, उसकी कभी भरपाई नहीं की जा सकती, लेकिन यह सुनिश्चित करना हमारा कर्तव्य है कि उनके परिजनों को किसी तरह की तकलीफ न उठानी पड़े।

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