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मुनाफा ही नहीं, भरोसा भी जीतें
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विस्तार
कुछ नया और बेहतर करके आगे बढ़ने की ख्वाहिश कहें या वक्त के साथ कदमताल करने का कौशल, बाजार की ताकतें अपने काम में जुटी रहती हैं। कोविड-19 ने दुनिया में लाखों लोगों की जान लेने के साथ ही इससे भी अधिक लोगों की नौकरी छीन ली।
भले ही कई देशों की सरकारें इससे निपटने की कोशिशों में हांफने लगी हों, पर बाजार की ताकतों ने जरा भी हार नहीं मानी। इसका नतीजा शानदार रहा है। कोरोना से निपटने में बाजार के योगदान के रूप में वेंटिलेटर, पीपीई किट, कोरोना जांच के लिए आरटी-पीसीआर किट, सैनिटाइजर, मास्क, ऑक्सीमीटर से लेकर कई तरह की दवाओं तक को एक यादगार नजीर के रूप में देखा जा सकता है। जिस देश में पीपीई किट और वेंटिलेटर दूर की कौड़ी समझी जाती रही, वहां अब इनका बड़े पैमाने पर उत्पादन हो रहा है।
यह उद्योगों और बाजार की ताकतों को समझने और जरूरतों के हिसाब से खुद को बदलने की उसकी क्षमता को दर्शाता है। बदलाव की इस बयार में कच्चे माल, मशीनों और तकनीकों तक में किया जाने वाला आमूल-चूल परिवर्तन शामिल है। आपदा में अवसर तलाशने वाले उद्योग और बाजार हालांकि मांग और आपूर्ति के पुराने सिद्धांत पर चलते नजर आते हैं, पर यह इतना आसान नहीं है। जब सब कुछ ठहर-सा गया हो, तब नई टेक्नोलॉजी, मशीनों और कच्चे माल पर बड़ा निवेश करने से लेकर इन्हें जुटाना कम जीवट का काम नहीं है। इसी जीवट का सुपरिणाम है कि आज भारत की गिनती पीपीई किट बनाने वाले देशों में दूसरे नंबर पर होने लगी है। वेंटिलेटर बनाने में भी भारतीय उद्योग इतना आगे निकल गए हैं कि केंद्र सरकार ने अब इनके निर्यात को मंजूरी दे दी है।
देश में बाजार की ताकतों की बड़े बदलावों को सहजता से अपनाने की यह क्षमता और वैशिष्ट्य पूरी दुनिया को अपनी श्रेष्ठता का ही एहसास नहीं कराता, बल्कि अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ खुशहाली के नए रास्ते भी खोजता है। इनसे केवल रोजगार ही नहीं बढ़े हैं, बल्कि पीड़ितों का इलाज भी अपेक्षाकृत सस्ता हो गया है। कोविड-19 का जो टेस्ट पहले 2,800 रुपये में होता था, अब वह 1,200 से लेकर उड़ीसा में 400 रुपये तक में हो रहा है। पर इसकी वजह बाजार की संवेदनशीलता नहीं, बल्कि सरकारों के फैसले हैं।
बाजार की ये उपलब्धियां नए भारत के निर्माण और दुनिया की प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने की उम्मीदों को सींचती जरूर हैं, लेकिन इनमें संवेदनशीलता की महक जरा भी महसूस नहीं होती। आरटी-पीसीआर टेस्ट की कीमतों में कमी करने की बात हो या कई राज्यों में कोविड-19 के इलाज की दर तय करने जैसे कदम, बाजार की ताकतों ने खुद आगे बढ़कर फैसला नहीं लिया। सरकारों के मूल्य निर्धारण के बाद ही टेस्ट और इलाज की दरों में कमी आई है।
बाजार को उन उपभोक्ताओं के प्रति संवेदनशील होना ही चाहिए, जो बाजार के असली नियामक हैं। उपभोक्ताओं का ख्याल रखने की परिपाटी शुरू करना उद्योग जगत को केवल मुनाफे पर नजर रखने वाली मौजूदा पहचान से ऊपर उठाकर आम आदमी से भावनात्मक रूप से जोड़ सकता है। आपदा में अवसर तलाशने का नारा केवल मुनाफे से ही नहीं जुड़ा है, बल्कि इसमें पीड़ितों की मदद करने, उनका विश्वास पाने और दिल जीतने का ऐसा जज्बा भी विद्यमान है। ऐसी कोई भी पहल उद्योग जगत के मुनाफे को तत्काल थोड़ा कम जरूर कर सकती है, पर इसके दूरगामी परिणाम सुखद हो सकते हैं।
आम आदमी भी समझता है कि 2,800 रुपये में कोरोना का टेस्ट करने वाले कितनी बड़ी धनराशि कमा रहे होंगे। इस टेस्ट की दर निर्धारित होने के बाद भी ऐसी कोई बात सामने नहीं आई है कि दर कम किए जाने के बाद निजी प्रयोगशालाओं ने टेस्ट बंद कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इलाज की दरों पर कैप लगाने का आदेश सरकार को दिया है, पर उद्योग और बाजार स्वयं इस दिशा में पहल करके खुद को आम आदमी से जोड़ सकते हैं।