खोई हुई लड़कियों के सम्मान में

निकोलस डी. क्रिस्टॉफ Updated Thu, 08 May 2014 07:42 PM IST
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In honour of lost girls

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जब बोको हरम के आतंकियों ने पूर्वोत्तर नाइजीरिया में स्थित लड़कियों के एक आवासीय स्कूल पर हमला बोलकर वहां से कई सौ लड़कियों का अपहरण कर ले गए, तब नाइजीरिया सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया झूठ से भरी थी। उन लड़कियों का जुर्म क्या था? यही न कि वे डॉक्टर, शिक्षिका या वकील बनना चाहती थीं! वहां की सेना ने यह दावा किया कि उसने बेहद मुस्तैदी से उनमें से 107 लड़कियों को छुड़ा लिया है, मगर यह सच नहीं है। लड़कियों के अभिभावकों की मानें, तो तीन सप्ताह बीत जाने के बाद भी सेना का रवैया ढीला-ढाला रहा है। हालांकि इस दौरान मीडिया की उदासीनता भी गौर करने लायक रही। मसलन, मीडिया के एक बड़े वर्ग के लिए अब भी एमएच-370 विमान की गुमशुदगी मुद्दा बनी हुई है! मगर नाइजीरिया की अपहृत लड़कियों की चिंता न तो अमेरिकी सरकार, न संयुक्त राष्ट्र और न ही दूसरी बड़ी वैश्विक शक्तियों को है।
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कहते हैं कि जिम्मेदारी दी नहीं जाती, ली जाती है। यही नाइजीरिया में भी दिखा। वैश्विक नेताओं और मीडिया के गैर-जिम्मेदाराना रवैये को देखते हुए नेतृत्व कहीं और से उभरा। यानी लड़कियों के अभिभावकों ने अपने तीर-धनुष पर भरोसा करके संबीसा के भयानक जंगल में आतंकियों की तलाश की मुहिम छेड़ी हुई है। इसी का नतीजा है कि 50 से ज्यादा अपहृत लड़कियां आतंकियों के चंगुल से मुक्त हो सकी हैं। इसके अलावा नाइजीरिया में महिला अधिकारों के पैरोकार जहां कार्रवाई की पुरजोर मांग कर रहे हैं, वहीं सोशल मीडिया ने भी ट्वीटर, फेसबुक और ऑनलाइन अर्जियों के जरिये एक मुहिम छेड़ी हुई है। नाइजीरिया की महिलाओं ने भी अपनी सरकार को शर्मिंदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उन्होंने घोषणा की है कि वे अपने कपड़े उतारकर संबीसा के जंगल की ओर कूच करेंगी, और लड़कियों को आतंकियों के चंगुल से बचाकर लाएंगी। जमीनी स्तर पर दिखाई जा रही इस सक्रियता का ही नतीजा था कि अपहरण के तीन हफ्ते बाद वैश्विक मीडिया में इस खबर को तवज्जो मिली। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मामले की गंभीरता को समझते हुए सुरक्षा विशेषज्ञों की एक टीम मदद के लिए वहां भेजी है, तो शर्मसार नाइजीरिया सरकार ने मामले को प्राथमिकता पर लेने और लड़कियों की सूचना देने पर तीन लाख डॉलर के इनाम की घोषणा की है।
हालांकि इस मामले में नाइजीरिया सरकार पर संदेह होने की वजह है, क्योंकि वहां के सरकारी अधिकारी बेहद लापरवाह हैं। जबकि वहां के सामाजिक कार्यकर्ता उतने ही बहादुर हैं। एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक, स्कूल से कुछ ही दूर स्थित सेना के बैरक को हमले की पूर्व सूचना दिए जाने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई। हद तो तब हो गई, जब नाइजीरिया की प्रथम महिला पैटिंस जोनाथन ने कहा कि अपहरण की यह वारदात सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा गढ़ी गई है।
बताया जाता है कि दो अपहृत लड़कियों की सांप काटने से मौत हो चुकी है। ऐसे में लड़कियों के बचाव की मांग को लेकर चल रही वैश्विक मुहिम क्या रंग दिखाएगी, यह साफ नहीं है। मगर लड़कियों की तलाश में अमेरिका मददगार साबित हो सकता है। क्योंकि लड़कियों के चाड झील के ऐसे द्वीप पर होने की उम्मीद जताई जा रही है, जहां लोग और वनस्पतियां न के बराबर हैं। ऐसे में सैटेलाइट और टोही विमान ही उम्मीद की एकमात्र किरण हैं।

बोको हरम के आतंकियों से सीधे टकराने से बचने वाली नाइजीरियाई सेना को अतीत में उन युवाओं को निशाना बनाते देखा गया है, जो उसकी नजर में बोको हरम से सहानुभूति रखते हैं। अनेक युवा सेना के निरंकुश तौर-तरीके से अपनी जान गंवा चुके हैं। लेकिन सेना की यह कार्रवाई उल्टे ग्रामीणों को बोको हरम के प्रति आकर्षित ही ज्यादा करती है। ऐसे हालात में मुमकिन है कि जिन परिवारों की बेटियां बोको हरम के कब्जे में हैं, अब उनके बेटे सेना के हत्थे चढ़ जाएं। अलबत्ता अमेरिका का हस्तक्षेप अत्याचार की ऐसी घटनाओं में कमी ला सकता है।

बोको हरम का शाब्दिक अर्थ होता है, 'पश्चिमी शिक्षा पाप है'। खासकर महिलाओं और लड़कियों को हाशिये पर रखना ही इस आतंकी संगठन का उद्देश्य है। ऐसे में, महिलाओं को शिक्षित और जागरूक करने में मददगार बनकर हम सभी बोको हरम के इरादों पर पानी फेर सकते हैं। ऐसे अतिवादी संगठनों के लिए ड्रोन मिसाइल से भी बड़ा खतरा 'हाथ में किताब लिए लड़की' है। सवाल यह है कि हम क्या कर सकते हैं।

इस रविवार को मदर्स डे है। इस अवसर पर अपनी मां को खुशियां देने के अलावा हम नाइजीरिया की अपहृत लड़कियों के प्रति सम्मान जाहिर कर सकते हैं। हम अफ्रीका में लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करने वाले कई समूहों को आर्थिक मदद दे सकते हैं। असाधारण शख्सियत वाली सोमालियाई महिला एडना एडेन को भी हम समर्थन दे सकते हैं, जिसने परिचारिकाओं को प्रशिक्षण देने के अलावा मैटरनिटी अस्पताल और निजी विश्वविद्यालय खोले हैं। इन सबके जरिये वह महिलाओं की शिक्षा व स्वास्थ्य को बढ़ावा देने तथा कुछ अफ्रीकी देशों में लड़कियों का खतना करने की कुप्रथा के खिलाफ संघर्ष कर रही हैं। इसी तरह युगांडा में स्वच्छ पेयजल के लिए चले अभियान को हम समर्थन दे सकते हैं, जिसके सफल होने पर लड़कियों को स्कूल छोड़कर पानी भरने के लिए नहीं जाना पड़ेगा। अपहृत नाइजीरियाई लड़कियों को बेशक हम बचा न पाएं, मगर दुनिया को यह एहसास तो दिला ही सकते हैं कि हम उनके साथ हैं।
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