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विलाप न करें, विकल्प सुझाएं: जिम्मेदार राजनीति दृष्टि और तर्क की अभिव्यक्ति पर जोर देती है

Thu, 28 Jan 2021 08:13 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Thu, 28 Jan 2021 08:13 AM IST
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In Democracy political attention and electoral loyalty must be won through ideological competition not by sharp rivalries
लोकसभा (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

वार्षिक बजट के साथ दशकों से पूर्वानुमानित घटनाक्रम जुड़े रहे हैं। यह रीति बनी हुई है कि सत्तारूढ़ सरकार अपने इरादे प्रकट करेगी, ताकि उसके प्रवक्ता आवंटनों को बेहतर नतीजे के रूप में पेश कर सकें। विपक्षी पार्टियां स्वाभाविक रूप से बजट में गलतियां ढूंढेंगी और शोर-शराबे तथा विलाप के साथ अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएंगी। क्या ऐसा होना चाहिए? लोकतंत्र में राजनीतिक ध्यानाकर्षण और चुनावी निष्ठा वैचारिक प्रतिस्पर्धा के जरिये जीती जानी चाहिए, न कि तीखे द्वंद्व से।


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वेस्टमिंस्टर मॉडल के शासन वाले देश आम तौर पर वैकल्पिक विचार प्रस्तुत करने और शासन व्यवस्था को चुनौती देने के लिए एक छाया मंत्रिमंडल का गठन करते हैं। भारत की राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय पार्टियां आला कमान संस्कृति के चलते इस दायित्व से दूर चली गई हैं। यह सच है कि तर्क उन लोगों के राजनीतिक हितों को कुंद कर देता है, जिन्हें पार्टियां सेवा के लिए प्रस्तुत करती हैं। लेकिन निश्चित रूप से राजनीति 'शास्रार्थ उद्योग' नहीं हो सकती।

आखिर विपक्षी पार्टियां एक वैकल्पिक दृष्टि या छाया बजट क्यों नहीं पेश करतीं? अर्थव्यवस्था की हालत किसी से छिपी नहीं है-विपक्षी पार्टियों की आंकड़ों तक पहुंच है और वे ज्यादा की मांग कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, जनवरी तक जो कुछ भी जानने की जरूरत थी, वह ज्ञात है-राज्यों के बजट पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के आंकड़े, केंद्र एवं राज्यों की उधारी की सीमा, राजस्व संग्रहण की प्रवृत्ति, उत्पादन एवं निर्यात पर आवृत्ति संकेतक। विपक्ष की कई पार्टियां विभिन्न राज्यों में सत्ता में हैं और जीएसटी काउंसिल के पास सभी क्षेत्रों के प्रदर्शन का एक विहंगम दृश्य है।

दरअसल 2021 का बजट गर्मियों की व्यस्त राजनीति के समय के लिहाज से एकदम मुफीद है। पांच राज्यों-असम, तमिलनाडु, पुड्डुचेरी, केरल एवं पश्चिम बंगाल में चुनाव होने वाले हैं। यही संदर्भ विपक्षी दलों को कुछ नहीं हुआ है के ढर्रे से निकालकर यह अवसर देता है कि वे बताएं कि क्या किया जाना चाहिए। महीनों तक विपक्ष ने सरकार पर कोविड-19 महामारी के प्रभाव को दूर करने के लिए पर्याप्त कदम न उठाने का आरोप लगाया है। एक छाया बजट विपक्षी पार्टियों को अपने विचारों को पेश करने का अवसर देता है कि कैसे गलत को सही किया जाए और जीवन व आजीविका के मुद्दों को हल किया जाए।

जिम्मेदार राजनीति दृष्टि और तर्क की अभिव्यक्ति पर जोर देती है। छाया बजट का निर्माण पार्टियों को रोबोटिक तरीके से आक्रामक होने से बचाएगा और सुझाए गए कार्यों के लिए तर्क प्रदान करेगा तथा विकल्प एवं निर्णय पर एक तर्कपूर्ण राजनीतिक विमर्श पर बल देगा। यह सत्तारूढ़ दल को मजबूत तर्क के साथ कामकाज की व्याख्या करने के लिए भी मजबूर करेगा। उदाहरण के लिए, राहत का विस्तार करने का आह्वान अर्थव्यवस्था को गति देने की दृष्टि से समझ में आता है। लेकिन सरकार के समक्ष लागत संबंधी कई मजबूरियां भी हैं, जैसे कि उच्च रक्षा खर्च के लिए धन की जरूरत, टीकाकरण का परिव्यय, बैंकों का पुनर्पूंजीकरण, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में फंसे बकाए का भुगतान। पहले से ही आय और व्यय के बीच खाई चौड़ी हो गई है-अनुमान है कि राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 14 प्रतिशत और केंद्र के अकेले जीडीपी के सात प्रतिशत से
अधिक पर रखा गया है। लेकिन इस बारे में चर्चा कम है कि क्या किया जा सकता है और इस बारे में बहस ज्यादा है कि कैसे ज्यादा से ज्यादा किया जा सकता है और इसे कैसे वित्तपोषित किया जा सकता है।

यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टियां बजट को संतुलित करने के बारे में क्या सोचती हैं- यानी उधार के घाटे का उपयुक्त स्तर क्या हो सकता है, और ऋण और घाटे को बनाए रखने के लिए विकास को कैसे प्रोत्साहित किया जाए। यह इस प्रकार है कि पार्टियों को यह भी सुझाव देना चाहिए कि सरकार आवश्यक संसाधन कैसे जुटा सकती है। राजस्व जुटाने के लिए नुस्खे में क्या शामिल होंगे-अरबपतियों पर कर, एक बार या चरणबद्ध ढंग से कोविड-19 अधिभार, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विनिवेश का सुझाव, एलआईसी को सूचीबद्ध करना, भूमि का मुद्रीकरण, उच्च गति वाले रेल मार्गों का निजीकरण या कोई अन्य उपाय?

एक छाया बजट पार्टियों को कई सवालों के जवाब देने और क्षेत्रीय चुनौतियों के दृष्टिकोण को रेखांकित करने में सक्षम बना सकता है। उदाहरण के लिए, महामारी ने स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के क्षरण को उजागर किया है। स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने के लिए धन और क्षमता के विस्तार की जरूरत है। क्या यह केंद्र प्रायोजित योजनाओं, या पंचायतों और नगर निकायों को शक्ति एवं वित्तपोषण के जरिये होना चाहिए? स्कूलों के बंद होने से लाखों छात्र प्रभावित हुए हैं। दूरस्थ शिक्षा तक छात्रों की पहुंच को वित्तपोषित करने के लिए क्या प्रत्यक्ष धन हस्तांतरण की व्यवस्था हो सकती है? व्यवसायों के खत्म होने से शहरी भारत में रोजगार का नुकसान हुआ है। क्या शहरी क्षेत्र के बेरोजगारों के लिए नौकरी की गारंटी की योजना हो सकती है? किसानों के आंदोलन ने कृषि की तरफ ध्यान खींचा है। क्या खरीद एवं सब्सिडी के लिए नीतियों एवं फंडिंग को फिर से व्यवस्थित किया जा सकता है?
निचोड़ यह है कि क्या राजनीतिक पार्टियों के पास भविष्य की कोई योजना है।

अर्थव्यवस्था का पुनरुद्धार और बहाली इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत किस तरह से महामारी के कारण उभरी चुनौतियों के लिए तैयार होता है। दुनिया महामारी के बाद व्यापार मॉडल और आपूर्ति शृंखलाओं को पुन: व्यवस्थित कर रही है। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत अपने घरेलू बाजार का कितने बड़े पैमाने पर लाभ उठा सकेगा- पूंजी का नए ढंग से आवंटन, भूमि उपयोग और श्रम सुधार कानूनों को फिर से व्यवस्थित करना। क्या पार्टियां आवश्यक सुधारों को रेखांकित करेंगी? भारत की युवा आबादी विफलताओं पर प्रहार करने की कोशिश कर रही है। नए युग की जरूरतों के मुताबिक पार्टियों को स्मार्ट राजनीति करने की जरूरत है। एक अरब से अधिक आकांक्षी लोगों वाले दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजनीतिक अर्थव्यवस्था वैचारिक विकल्पों की हकदार है-जीवन और आजीविका के मुद्दों पर प्रतिस्पर्धी विचारों की बहुलता।

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