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दिल्ली के चुनाव में भी भाजपा संघ के सहारे
सीताराम येचुरी
Updated Fri, 07 Nov 2014 08:06 PM IST
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आखिरकार अब साफ हो गया है कि अगले साल के शुरू में दिल्ली विधानसभा के चुनाव हो जाएंगे। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने लेफ्टिनेंट गवर्नर की इस सिफारिश को मंजूर कर लिया कि दिल्ली विधानसभा को भंग कर दिया जाए। इस तरह यहां विधानसभा के नए चुनाव का रास्ता साफ हो गया है। इसके साथ ही तीन खाली सीटों के लिए प्रस्तावित उपचुनाव भी निरस्त हो गया।
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यह फैसला निलंबित विधानसभा में बहुमत जुगाड़ने की कोशिश में भाजपा के विफल हो जाने के बाद ही आया है। आम आदमी पार्टी के नेता तथा दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का आरोप है कि भाजपा ने विधानसभा में बहुमत जुगाड़ने के लिए हर तरह की खरीद-फरोख्त के दांव आजमा कर देख लिए थे। हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव में सफलता के बाद भाजपा ने दिल्ली की निलंबित विधानसभा में बहुमत जुगाड़ने की अपनी निष्फल कोशिशें छोड़ दीं। हालांकि इससे पहले नौ राज्यों में 32 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में भाजपा सिर्फ 12 सीटों पर ही जीत हासिल कर पाई।
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मीडिया की रिपोर्टों से यह पता चलता है कि महाराष्ट्र और हरियाणा में उसकी चुनावी जीतों में भी आरएसएस/ भाजपा ने पूरी तरह से उसी एजेंडे का अनुसरण किया, जो अब तक 'दोमुंहेपन' की राजनीति के रूप में कुख्यात हो चुका है। एक तरफ जनता के लिए जहां 'विकास', 'गुजरात मॉडल' और 'अच्छे दिन आनेवाले हैं' का प्रचार था, वहीं दूसरी ओर चुनावी लाभ पाने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और हिंसा को तेज करने की असली विधि थी। दिल्ली के आनेवाले विधानसभा चुनाव के दौरान भी उसकी चुनावी कार्यनीति का असली आधार यही रणनीति रहेगी, जो उपचुनावों में लगे धक्कों के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेताओं की टिप्पणियों से पूरी तरह जाहिर है। इन नेताओं ने कहा था कि 'लव जेहाद' जैसे नारों और मुजफ्फरनगर, सहारनपुर तथा मुरादाबाद के सांप्रदायिक दंगों को बड़े चुनावी मुद्दे बनाने के मामले में दिखाई गई अनिच्छा उपचुनावों में भाजपा को भारी पड़ गई।
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आरएसएस/ भाजपा दिल्ली के बवाना, नंदनगरी, त्रिलोकपुरी, समयपुर बादली और ऐसे ही दूसरे क्षेत्रों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज करने के लिए अपने हथियारों को पैना करने में लगी हुई है। उत्तरी दिल्ली के बवाना क्षेत्र में मुहर्रम के जुलूस का विरोध करने के लिए बीते दो नवंबर को एक ‘महापंचायत’ का आयोजन किया गया था। आरोप है कि इसमें स्थानीय भाजपा विधायक ने भड़काऊ भाषण दिया। स्थानीय बाशिंदों ने मीडिया को बताया कि आनेवाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए ही तनाव पैदा किया जा रहा है।
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के एजेंडे को इस तरह अनथक रूप से आगे बढ़ाने का अर्थ है, भारत के आधुनिक धर्मनिरपेक्ष जनतांत्रिक गणराज्य के लिए तबाही को आमंत्रित करना। यही है वह खतरा, जिससे देश की जनता को कड़ा मुकाबला करना होगा और हमारे धर्मनिरपेक्ष जनतांत्रिक गणराज्य को एक कट्टर असहिष्णु फासीवादी ‘हिंदू राष्ट्र’ में तब्दील करने के आरएसएस के विजन को ठुकराना होगा। जब हम एक एकजुट, धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक भारत की नींव को सुरक्षित करने में कामयाब हो जाएंगे, तभी हम एक बेहतर भारत का निर्माण कर पाएंगे।
(लेखक माकपा पोलित ब्यूरो सदस्य हैं)