{"_id":"69ed7b9335084fce7c02c70b","slug":"importance-of-karma-yoga-sutji-discourse-vedic-philosophy-spiritual-knowledge-2026-04-26","type":"story","status":"publish","title_hn":"संस्कृति के पन्नों से: सूतजी ने बताई कर्मयोग की महत्ता","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
संस्कृति के पन्नों से: सूतजी ने बताई कर्मयोग की महत्ता
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
सूतजी
- फोटो :
अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
एक बार सूतजी ने ऋषियों से कहा, ‘ऋषियो! प्रलय काल के जल में मत्स्य रूप धारी भगवान विष्णु ने मनु को कर्मयोग और सांख्य योग विस्तारपूर्वक बतलाया था। यह सुनकर ऋषियों ने सूतजी से कर्मयोग के विषय में जानने की इच्छा व्यक्त की। तब सूतजी ने ऋषियों को कर्मयोग की महत्ता बताते हुए कहा कि विष्णु भगवान ने जिस प्रकार कर्मयोग की व्याख्या की थी, उसे मैं बतला रहा हूं।कर्मयोग, ज्ञान योग से हजारों गुना अधिक प्रशस्त है, क्योंकि कर्मयोग से ही ज्ञान का प्रादुर्भाव होता है। अतः वह परम पद है। ब्रह्म भी कर्म-ज्ञान से उद्भूत होता है। कर्म के बिना ज्ञान की सत्ता ही नहीं है। इसीलिए, कर्मयोग के अभ्यास में संलग्न मनुष्य अविनाशी तत्व को प्राप्त कर लेता है।
संपूर्ण वेद और वेदज्ञों के आचार-विचार धर्म के मूल हैं। उनमें आठ प्रकार के आत्म-गुण विद्यमान रहते हैं-जैसे प्राणियों पर दया, क्षमा, दुख से पीड़ित प्राणी को आश्वासन देना और उसकी रक्षा करना, जगत में किसी से ईर्ष्या-द्वेष न करना, बाह्य एवं आंतरिक पवित्रता, परिश्रम रहित अथवा अनायास प्राप्त हुए कार्यों के अवसर पर उन्हें मांगलिक आचार-व्यवहार के द्वारा संपन्न करना, अपने द्वारा उपार्जित द्रव्यों से दीन-दुखियों की सहायता करते समय कृपणता न करना तथा पराये धन और पराई स्त्री के प्रति सदा निःस्पृह रहना।
जगत में कर्मयोग के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। इसलिए, श्रुतियों एवं स्मृतियों में बताए गए धर्म का पालन करना चाहिए। प्रतिदिन देवताओं, पितरों और मनुष्यों को यज्ञों द्वारा तृप्त करना चाहिए।
विद्वान पुरुष को चाहिए कि वह स्वाध्याय से देवताओं, हवन द्वारा ऋषियों, श्राद्ध द्वारा पितरों, अन्न द्वारा अतिथियों तथा बलि कर्म द्वारा मृत प्राणियों की विधिपूर्वक अर्चना करे।
गृहस्थों के घर में जीव हिंसा के स्थानों पर घटित हुए पापों की निवृत्ति के लिए उपर्युक्त पांच प्रकार के यज्ञों का विधान बतलाया गया है। वेे पांच स्थान हैं-कंडनी (वस्तुओं के कूटने का पात्र ओखली, खरल आदि), पेषणी (पीसने का उपकरण चक्की, सिलवट आदि), चुल्ली (चूल्हा), जलकुंभी (पानी रखे जाने वाले घड़े) और प्रमार्जनी (झाड़ू आदि)। इन स्थानों पर उत्पन्न हुए पाप के कारण गृहस्थ पुरुष स्वर्ग नहीं जा सकता। द्विजातियों के लिए जो चालीस प्रकार के संस्कार बतलाए गए हैं, उनसे संस्कृत होने पर भी, जो मनुष्य उपर्युक्त आठ आत्म-गुणों से रहित है, वह मोक्ष का भागी नहीं हो सकता। इसलिए, आत्म-गुणों से संपन्न होकर ही वैदिक कर्म का अनुष्ठान करना चाहिए। गृहस्थ का कर्तव्य है कि वह व्रत एवं उपवास आदि करके गौ, पृथ्वी, सुवर्ण, वस्त्र, गंध, माला और जल आदि से ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, रुद्र और वसु स्वरूप शिव की श्रद्धापूर्वक पूजा करे। जो इंद्रियों के अगोचर, परम शांत, सूक्ष्मतम, अव्यक्त, अविनाशी एवं विश्व स्वरूप भगवान वासुदेव हैं, उनकी विभूतियां हैं-ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, शिव, आठ वसु, ग्यारह गणाधिप, लोकपाल अधीश्वर, पितर और मातृकाएं। ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य व शिव मूल रूप से इस जगत के अव्यक्त अधिपति कहे जाते हैं। इसलिए, इनकी अभेद भाव से पूजा करने पर चराचर जगत की पूजा संपन्न हो जाती है। सूर्य देव वेदों के मूर्त स्वरूप हैं, अतः उनकी प्रयत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिए।
इस प्रकार, जो मनुष्य कर्मयोगनिष्ठ, वेदांत शास्त्र और स्मृतियों से प्रेम करता है तथा अधर्म से सदा दूर रहता है, उसके लिए इस लोक अथवा परलोक में कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं रह जाता, अर्थात सब कुछ उसे सहजता से प्राप्त हो जाता है।