भीमा कोरे के निहितार्थ
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पुणे के भीमा कोरे गांव में दो सौ साल पहले हुए संघर्ष पर अगर कोई विवाद होता है, तो उसे सिर्फ मीडिया के वक्ती उपभोग के लिए नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इसे केंद्र में रखकर वर्णाश्रमी भारतीय समाज में एक गंभीर विमर्श भी हो सकता है। सबसे पहले तो हमें इस तथ्य पर विचार करना चाहिए कि भीमा कोरे गांव में दलित पेशवा के खिलाफ ईस्ट इंडिया कंपनी की पलटन का अंग बनकर क्यों लड़े थे ? इसी से जुड़ा एक असुविधाजनक प्रश्न यह भी है कि आखिर क्यों आधुनिक अर्थों में भारत में दलित विमर्श के जनक ज्योतिबा फुले ने 1857 विद्रोह के विफल हो जाने के बाद पुणे में उन महार सैनिकों का सार्वजनिक अभिनंदन किया, जिन्होंने अंग्रेज शासकों का साथ दिया था और ईस्ट इंडिया कंपनी की जीत में निर्णायक भूमिका निभाई थी? यही नहीं, उन्होंने वायसराय को एक पत्र लिखकर इस बात पर खुशी जाहिर की थी कि अंग्रेज जीत गए और भारत के दलितों को फिर से ब्राह्मणों का गुलाम नहीं बनना पड़ेगा। 1857 का दलित विमर्श अंबेडकर से पूरा होता है। उन्होंने भी अपने लेखन और भाषणों में अंग्रेज शासकों के प्रति अपनी प्रशंसा का भाव छिपाया नहीं था। इसी विमर्श से यह वाक्य उपजा है कि अंग्रेज भारत में देर से आए और जल्दी चले गए। क्या फुले और अंबेडकर के दलित विमर्श को देश-विरोधी कहा जा सकता है? अरुण शौरी ने अपनी किताब वरशिपिंग फॉल्स गॉडस में यही सिद्ध करने की कोशिश की है। शौरी अति सरलीकरण के शिकार हैं और उस दर्द को नहीं महसूस करते, जिससे व्यथित होकर दलित विदेशी गुलामी को भारतीय राजे-महाराजों के शासन से बेहतर समझते थे। दलित व्यथा समझने के लिए हमें वायसराय को संबोधित फुले के पत्र को गौर से पढ़ना होगा। इसमें व्यक्त फुले की चिंता पूरे दलित समाज की चिंता है। ईस्ट इंडिया कंपनी जीत गई, मतलब दलित एक बार फिर ब्राह्मणों के गुलाम बनने से बच गए। यदि कंपनी हार जाती, तो क्या सरकारी सैनिक और असैनिक सेवाओं तथा शिक्षा हासिल करने के जो दरवाजे उनके लिए खुले, वे वापस बंद न हो जाते?
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अंबेडकर ने अपने लेखन और संविधान सभा के अपने भाषणों में सामाजिक और राजनीतिक आजादी के द्वंद्व को बखूबी रेखांकित किया है। 25 नवंबर,1949 को संविधान के अंतिम ड्राफ्ट पर बहस के दौरान उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक समानताओं के मध्य जिन अंतर्विरोधों की तरफ इशारा किया है, उनके कम होने की ठोस संभावना लंबे भारतीय इतिहास में पहली बार ईस्ट इंडिया कंपनी और फिर विक्टोरिया की हुकूमत में बन पाई थी। एक शिक्षा-विरोधी समाज में, जिसने अपने तीन चौथाई से भी अधिक सदस्यों को जाति या लिंग के आधार पर शिक्षा से वंचित कर रखा था, पहली बार उन शूद्रों, अति शूद्रों और स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार मिल रहा था। पहली बार ही वर्ण और कुल नहीं, बल्कि काफी हद तक योग्यता के आधार पर सरकार की सैनिक और असैनिक सेवाओं में भर्ती होने जा रही थी। दो सौ साल पहले भीमा कोरे गांव में हुए युद्ध ने इस नई नीति की सार्थकता भी साबित कर दी। सिर्फ कुछेक सौ महारों और एक छोटी-सी गोरी टुकड़ी ने एक जनवरी, 1818 को ईस्ट इंडिया कंपनी की पलटन के रूप में अपने से कई गुना बड़ी पेशवा की फौज को पीट डाला और पहली बार गौरांग महाप्रभुओं ने अछूत समझे जाने वालों की युद्ध क्षमताओं को पहचाना था। दरअसल भीमा कोरे गांव में लड़ रहे महारों की बहादुरी के पीछे उनके मन में दबा वह गुस्सा था, जो पेशवाई द्वारा उनके साथ पशुओं जैसा व्यवहार करने से उपजा था। उन दिनों पूना में रास्ते में चलते समय महारों को सावधान रहना पड़ता था कि उनकी छाया भी सवर्णों पर न पड़े, वे अपने पीछे झाडू बांधकर चलते थे, जिससे उनके पदचिह्न भी मिट जाएं और उनके गले मे हंड़िया लटकी रहती थी, जिससे उनकी थूक या लार जमीन पर गिरकर उसे प्रदूषित न कर सके। ऐसे में हम कल्पना ही कर सकते हैं कि क्रूर पेशवाओं के खिलाफ उन्हें शिक्षा और सैन्य सेवाओं में बराबरी का अधिकार देने वाले गोरों के पक्ष में लड़ते समय उनके मन में कितना उत्साह और गुस्सा भरा रहा होगा।
भीमा कोरे गांव के युद्ध की चर्चा करते समय हमें उन असंख्य युद्धों का भी स्मरण करना चाहिए, जिनमे खैबर दर्रे या समुद्र से आने वाले हमलावर हमेशा अपने से कई गुना बड़ी सेना वाले भारतीय राजाओं को हरा देते थे। यह पूछना भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि हिमालय पार कर महमूद गजनवी सैकड़ों मील दूर सोमनाथ तक लूट-पाट करता चला जाता है और रास्ते में उसे कोई चुनौती नहीं मिलती।
भारत दुनिया का अकेला बड़ा देश है, जिसके खाते में इतिहास की एक भी उल्लेखनीय विजय नहीं है। यह तर्क हास्यास्पद होगा कि हम तो शांतिप्रिय देश रहे हैं और युद्धों में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं रही, सच्चाई यह है कि देश के अंदर तो राजे-महाराजे आपस में लड़ते ही रहते थे, केवल बाहरी हमलावरों के खिलाफ उनका प्रदर्शन निराशाजनक रहता था। युद्धों में निरंतर हार के पीछे कहीं न कहीं हमारी वर्ण व्यवस्था थी, जिसने जनसंख्या के बड़े भाग को लड़ने के अधिकार से वंचित कर रखा था। ये मेहनतकश लोग थे, जिन्हें यदि लड़ने का मौका मिलता, तो क्या नतीजे भीमा कोरे गांव जैसे नहीं होते? 1971 का युद्ध संभवत: अकेला था, जिसे एक राष्ट्र के रूप में भारत जीता, पर याद रखना होगा कि उस समय भारतीय सेना का अधिकांश पिछड़ी और दलित जातियों से बना था। न सिर्फ बहुसंख्यकों को सैनिक सेवा से दूर रखा जाता था, बल्कि उनके राज्य में कोई स्टेक भी नहीं थे, इसलिए कोई नृप हो, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था।
भीमा कोरे के बहाने उस दलित विमर्श पर चर्चा होनी चाहिए, जिसके चलते उसे 1857 विद्रोह के विफल होने पर खुशी हुई थी। जिस तरह विजय के दो सौ साल का जश्न मनाने उतरे लोगों पर हमला हुआ, उससे स्पष्ट है कि वर्ण व्यवस्था के भग्नावशेष अब भी बचे हैं और उन पर निर्णायक हमला करने का समय आ गया है।