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ऋषियों की इस चाहत को जिसने सुना, हैरान रह गया
कमलेश्वर
Updated Thu, 19 Feb 2015 10:50 AM IST
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कई ऋषि-मुनि एक जगह एकत्र होकर आत्मविद्या के विषय में विचार-विमर्श कर रहे थे। बहुत विचार करने पर भी जब वे सहमत न हो पाए, तो वे ऋषि उद्दालक के पास गए। मगर वहां भी उन्हें समाधान नहीं मिल सका। तत्पश्चात ऋषि उद्दालक के कहने पर वे राजा अश्वपति के पास गए। ऋषि-मुनियों के साथ ऋषि उद्दालक भी थे।
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राजा अश्वपति ने उनका यथोचित सत्कार किया और दान दक्षिणा में बहुत-सा धन भी दिया, मगर किसी ने उसे छुआ तक नहीं। ऋषियों के दान नहीं लेने पर राजा को आश्चर्य हुआ। उन्हें लगा कि कदाचित ऋषि-मुनि उनके धन को अन्याय से अर्जित धन मानते हैं।
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उनका भ्रम मिटाने के लिए राजा ने हाथ जोड़कर कहा, भगवन! न तो मेरे राज्य में कोई चोर है, न कोई कृपण है, और न ही यहां मद्यपान करनेवाला है। हमारे यहां के ब्राह्मण और विद्वान बिना अग्निहोत्र के अपनी दिनचर्या आरंभ नहीं करते। आपको दान में दिए जा रहे इस अन्न और धन में कोई दोष नहीं है। आप इसे निस्संकोच स्वीकार कीजिए।
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राजा की प्रार्थना सुनकर ऋषि उद्दालक ने कहा, राजन! हम आपके पास धन की लालसा से नहीं आए हैं। हम आत्मा और परमात्मा के विषय में कुछ जानना चाहते हैं। कुछ देर सोचने के बाद राजा ने कहा, कल प्रातःकाल मैं आपकी समस्याओं का समाधान करने की कोशिश करूंगा।
यह सुनकर ऋषि विस्मय में पड़ गए। उद्दालक ने ऋषियों को समझाते हुए कहा, हम लोग राजा के पास भिक्षार्जन के लिए नहीं, ज्ञान प्राप्त करने के लिए आए हैं। अतः हमें समिधा हाथ में लेकर महाराज के पास पहुंचना चाहिए। ऋषियों ने ऐसा ही किया। अगली सुबह अश्वपति ने ऋषियों की जिज्ञासाओं का समाधान कर दिया।