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व्यवस्था गलत है तो यह गलती किसकी
तवलीन सिंह
Updated Fri, 07 Feb 2014 01:23 AM IST
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अघोषित ही सही, लेकिन हैं तो राहुल गांधी कांग्रेस की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ही। इसलिए उनके विचारों को मजाक में टालना इस विशाल देश के मतदाताओं के साथ अन्याय होगा। आज भी करोड़ों भारतवासियों की नजरों में राहुल गांधी एक लायक राजनेता हैं और नेहरू-गांधी परिवार के वारिस भी। अपने करीब दशक भर लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने पहली बार अपनी चुप्पी तोड़ने का काम किया है।
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मैंने उनका पहला इंटरव्यू बड़े ध्यान से देखा, बार-बार देखा, और बार-बार ध्यान से सुना। ऐसा करने के बाद मेरे मन में जो पहला सवाल उठा, वह यह था कि राहुल जी को सबसे बड़ी तकलीफ है इस सिस्टम या व्यवस्था को लेकर। इस सिस्टम के साथ उनको इतनी शिकायत है कि इस पर उन्होंने दोष डाला अपने पिता और दादी की हत्याओं का भी। आगे उन्होंने कहा कि इस सिस्टम के कारण गलत किस्म के लोगों को चुनावों में टिकट दिए जाते हैं और इस सिस्टम को वह खत्म करना चाहते हैं।
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समस्या यह है कि जिस व्यवस्था की वह बात कर रहे हैं, उसकी नींव रखी थी उनकी स्वर्गीय दादी इंदिरा गांधी ने, जब उन्होंने कांग्रेस पार्टी को तोड़कर अपने विरोधियों को निकाल फेंका था। जो हिस्सा उन्होंने समेटकर अपना बनाया, उसका नाम उन्होंने रखा अपने नाम से-कांग्रेस (आई) या इंदिरा। उसके बाद जब भी चुनाव आए, टिकट बांटने का काम उन्होंने अपने हाथों में रखा। और यही परंपरा कायम रखी उनके बेटे राजीव गांधी ने। उनकी हत्या के बाद कांग्रेस के नेता सोनिया गांधी का नेतृत्व चाहते थे। कुछ समय के लिए सोनिया जी ने यह जिम्मेदारी लेने से इन्कार किया, फिर संभाल ली अपनी विरासत। पिछले पंद्रह वर्षों से कांग्रेस की अध्यक्ष हैं वह। टिकट बांटने का काम राहुल जी, आपकी माता जी का रहा है। उनकी इजाजत के बिना किसी को नहीं मिलता टिकट।
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एक और अहम मुद्दा था, जो राहुल जी ने अपने पहले इंटरव्यू में उठाया, और वह था इस देश की महिलाओं और नौजवानों के सशक्तिकरण का। कई बार उन्होंने जिक्र करने की जब कोशिश की और अर्णब गोस्वामी ने सवाल कोई और पूछा, तो राहुल जी ने उनको टोकते हुए कहा कि आप जानना ही नहीं चाहते कि राहुल गांधी के दिल में किन मुद्दों को लेकर दर्द है। यह बात उनकी मुझे वाकई बहुत अच्छी लगी, लेकिन फिर सवाल उठने लग गए मेरे मन में। पहला सवाल यह, कि अगर भारत की महिलाओं का जीवन वास्तव में सुधारना चाहते हैं राहुल गांधी, तो सबसे ताकतवर औजार है शिक्षा। एक दशक से सोनिया गांधी केंद्र में सबसे शक्तिशाली स्थिति में हैं। तो इस अर्से में महिलाओं की शिक्षा पर खास ध्यान क्यों नहीं दिया गया? ग्रामीण क्षेत्रों में अगर बड़े पैमाने पर यह कोशिश की गई होती, तो महिलाओं का सशक्तिकरण खुद-ब-खुद हो गया होता अब तक।
रही बात महिलाओं के सशक्तिकरण की, तो यह तब तक असंभव है, जब तक ग्रामीण भारत में रोजगार के करोड़ों अवसर पैदा नहीं किए जाते हैं। इनको पैसे देने के लिए मनरेगा नहीं, निवेश चाहिए, ताकि अर्थव्यवस्था की वार्षिक वृद्धि फिर से आठ प्रतिशत से ऊपर चढ़ जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि एक प्रतिशत जब गिरती है यह वार्षिक वृद्धि दर, तो उसके साथ लाखों नौकरियों की संभावनाएं तबाह हो जाती हैं। सो अनुमान लगाया जाता है कि पिछले दशक में कोई तीन करोड़ नौजवानों की नौकरियां तबाह हुई हैं। मनरेगा से बेरोजगारी देहातों में इसलिए कम नहीं हुई है, क्योंकि यह बेरोजगारी भत्ता की जगह ले चुका है। कई इलाकों में देखा यह गया है कि जो लोग खेतों में मजदूरी का काम करते थे, वे मनरेगा में काम करना पसंद करते हैं अब, क्योंकि मनरेगा की मजदूरी कम नहीं है। फसल कटाई के समय अन्य राज्यों में पलायन बेशक कम हुआ होगा, लेकिन बेरोजगारी कम नहीं हुई है।
राहुल जी, क्या आपने इन चीजों के बारे में कभी सोचा भी है? क्या आपने कभी सोचा है कि नेक इरादे अगर काफी होते, तो भारत की महिलाएं और नौजवान दुनिया में सबसे ताकतवर होते? सो राहुल जी, बहुत अच्छी बात है कि आपने अपना पहला इंटरव्यू दिया है टेलीविजन पर, लेकिन अगले इंटरव्यू से पहले जरूरी है कि आप थोड़ा होमवर्क करके आएं।