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क्या नए साल में बदलेंगे ये पैमाने

Mon, 29 Dec 2014 08:07 PM IST
जयंतीलाल भंडारी
जयंतीलाल भंडारी Updated Mon, 29 Dec 2014 08:07 PM IST
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If change these standerd in new year

इन दिनों जहां एक ओर देश के आम आदमी और नई पीढ़ी की कार्यक्षमता एवं कार्यकुशलता बढ़ाकर उन्हें आर्थिक विकास का सहभागी बनाने के लिए स्वास्थ्य एवं शिक्षा पर अधिक ध्यान दिए जाने की जरूरत से संबंधित विभिन्न रिपोर्टें प्रकाशित हुई हैं। वहीं दूसरी ओर सरकार ने चालू वित्तीय वर्ष में स्वास्थ्य पर किए जाने वाले व्यय में जिस तरह कटौती के संकेत दिए हैं, उससे कार्यक्षमता एवं कार्यकुशलता बढ़ाने के अभियान पर चिंता की लकीरें उभरती हुई दिखाई दे रही हैं। हाल ही में वित्तीय स्थिति ठीक न होने के कारण केंद्र सरकार ने 2014-15 के स्वास्थ्य बजट में करीब 20 प्रतिशत की कटौती करने के आदेश दिए हैं। उससे पिछले साल के स्वास्थ्य बजट की तुलना में छह हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की कटौती हो गई है। इस फैसले से स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए की जा रही पहल पर खतरा मंडराने लगा है। भारत का स्वास्थ्य बजट पहले ही दुनिया में न्यूनतम स्तर पर है।

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पिछले दिनों केंद्र सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने वर्ष 2014 की सांख्यिकी वार्षिकी प्रकाशित की है। इसके अनुसार सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों को हासिल करने के परिप्रेक्ष्य में भारत की स्थिति आधी-आधी है। यह वार्षिकी बताती है कि नए वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा भारत के लिए निर्धारित स्वास्थ्य व शिक्षा से संबंधित सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सघन अभियान चलाए जाने की जरूरत है। वार्षिकी में कहा गया है कि यद्यपि देश के अधिकांश बच्चों को प्राथमिक स्कूली शिक्षा मिल रही है। लेकिन उस शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर तमाम तरह की चिंताएं हैं। माध्यमिक स्तर पर बच्चों के स्कूली नामांकन में करीब एक तिहाई की गिरावट आई है। विश्व बैंक की वैश्विक स्वास्थ्य एवं शिक्षा से संबंधित नई अध्ययन रिपोर्ट भी वर्ष 2015 में भारत में स्वास्थ्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में अधिक प्रयासों की जरूरत बता रही है।
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विश्व बैंक का कहना है कि वर्ष 1980 से वर्ष 2010 के 30 वर्षों के दौरान प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी के लिहाज से चीन दुनिया में पहले क्रम पर है। वहां प्रति व्यक्ति आय में 22.5 गुना का इजाफा हुआ है। वहां स्वास्थ्य व पोषण के साथ-साथ शिक्षण-प्रशिक्षण के अभियान से कारोबार में वृद्धि हुई, जिस वजह से चीन में गरीबी भी कम हुई है। जबकि पिछले 30 वर्षों में भारत में प्रति व्यक्ति आय 5.26 गुना बढ़ी, लेकिन स्वास्थ्य व पोषण और शिक्षण-प्रशिक्षण के स्तर में कमी और कारोबार में पर्याप्त वृद्धि न होने से गरीबी कम करने में बाधा पहुंची है।
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स्थिति यह है कि हमारे देश के आम आदमी के धन का एक बड़ा भाग जरूरी सार्वजनिक सेवाओं, स्वास्थ्य सुविधा जुटाने और शिक्षा में व्यय हो जाता है, इसलिए वे न तो पर्याप्त पोषक तत्व प्राप्त कर पा रहे हैं और न ही अपनी आय का एक पर्याप्त भाग अपने को कार्यकुशल बनाने में खर्च कर पा रहे हैं। नए वर्ष 2015 में आर्थिक वृद्धि के तभी कुछ मायने नजर आएंगे, जब इसके जरिये स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्धि से जीवन प्रत्याशा दर में सुधार हो, मातृ और शिशु मृत्यु दर में कमी हो और देश केवल साक्षरता तक सीमित न रहकर प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के मोर्चे पर कुछ बेहतर करे।

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