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श्रेष्ठ भगवदभक्त की पहचान
शिवकुमार गोयल
Updated Fri, 20 Sep 2013 08:01 PM IST
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महर्षि मार्कंडेय ने एक बार भगवान विष्णु से पूछा, भगवन, भगवद्भक्त के लक्षण क्या हैं? वे कौन-कौन से कर्म हैं, जिन्हें अपनाने से कोई व्यक्ति ईश्वर का प्रिय बन जाता है?
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भगवान ने उत्तर दिया, महर्षि, जो संपूर्ण जीवों के हितैषी हैं, जो दूसरों के दोष नहीं देखते, जो संयमी हैं, जो इंद्रियों को वश में रखने वाले और शांत स्वभाव के हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। इसी प्रकार, जो मन, वाणी तथा क्रिया द्वारा दूसरों को कभी पीड़ा नहीं पहुंचाते, जिनकी बुद्धि सात्विक है और जो हमेशा सद्कर्मों और सत्संग में लगे रहते हैं, वे उत्तम भक्त हैं।
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कुछ क्षण मौन रहने के बाद भगवान ने बताया, जो व्यक्ति माता-पिता में भगवान विश्वनाथ के दर्शन करे, उनकी नित्य सेवा करे, जो दूसरों की उन्नति देखकर प्रसन्न हो, जो दूसरों की तृप्ति के लिए कुआं, बावड़ी, तालाब आदि खुदवाए, वह श्रेष्ठ भगवद्भक्त है।
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भगवान ने महर्षि से आगे कहा, अतिथियों का सत्कार करनेवाला, जरूरतमंदों को जलदान और अन्नदान करनेवाला, शुद्ध हृदय से श्री हरिनाम का जप करनेवाला आदर्श गृहस्थ भी मेरा प्रिय भक्त है। इसलिए हे मार्कंडेय, जो व्यक्ति इस प्रकार की आदर्श जीवनचर्या का पालन करता है, वह सदा सपरिवार सुखी और संतुष्ट रहता है। महर्षि मार्कंडेय भगवान के वचन सुनकर गदगद हो उठे।