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जब रंभा अप्सरा शुकदेव जी को देखकर काम पीड़ित हो गई

Wed, 21 Jan 2015 02:59 PM IST
जनमजेय शर्मा
जनमजेय शर्मा Updated Wed, 21 Jan 2015 02:59 PM IST
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I pose to take birth as your child

रंभा नामक अप्सरा शुकदेव को लुभाने पहुंची। शुकदेव जी सहज विरागी थे। बचपन में ही वह वन चले गए थे। उन्होंने ही परीक्षित को भागवत पुराण सुनाया था। उनके बारे में कहा जाता है कि वह महर्षि वेदव्यास के अयोनिज पुत्र थे और बारह वर्षों तक माता के गर्भ में रहे। श्रीकृष्ण के यह आश्वासन देने पर कि उन पर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा, उन्होंने जन्म लिया। गर्भ में ही उन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराण आदि का ज्ञान हो गया था। कम अवस्था में ही वह ब्रह्मलीन हो गए थे।

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रंभा ने उन्हें देखा, तो वह मुग्ध हो गई और उनसे प्रणय निवेदन किया। शुकदेव ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। रंभा उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में जुट गई। जब वह बहुत कोशिश कर चुकी, तो शुकदेव ने पूछा, देवी, आप मेरा ध्यान क्यों आकर्षित कर रही हैं। रंभा ने कहा, ताकि हम जीवन का छक कर भोग कर सकें। शुकदेव बोले, देवी, मैं तो उस सार्थक रस को पा चुका हूं, जिससे क्षण भर हटने से जीवन निरर्थक होने लगता है। मैं उस रस को छोड़कर जीवन को निरर्थक बनाना नहीं चाहता। कुछ और रस हो, तो भी मुझे क्या?
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रंभा ने अपने रंग-रूप और सौंदर्य की विशेषताएं बताईं। उसने कहा कि उसके शरीर से सौंदर्य की अजस्र धारा तो बहती ही रहती है, भीनी-भीनी सुवास की लहरियां भी फूटती रहती हैं। देवलोक में, जहां वह रहती है, कोई कभी वृद्ध नहीं होता। शुकदेव ने यह सुना तो बोले, देवी, आज हमें पहली बार यह पता लगा कि नारी शरीर इतना सुंदर होता है। यह आपकी कृपा से संभव हुआ। अब यदि भगवत प्रेरणा से पुनः जन्म लेना पड़ा, तो मैं नौ माह आप जैसी ही माता के गर्भ में रहकर इसका सुख लूंगा। अभी तो प्रभु कार्य ही प्रधान है।

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