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तकनीकी शिक्षा में फीस की दीवार

Thu, 14 Apr 2016 07:26 PM IST
सुभाषचंद्र कुशवाहा
सुभाषचंद्र कुशवाहा Updated Thu, 14 Apr 2016 07:26 PM IST
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Hurdle of fees in technical education
सुभाषचंद्र कुशवाहा

हमारे यहां तकनीकी शिक्षा में आईआईटी का स्थान सर्वोच्च रहा है और यहां प्रवेश पाना सम्मान और योग्यता का मापदंड भी है। हालांकि इसका अभिजातवर्गीय ढांचा देश से ज्यादा विदेश की सेवा करता रहा है। अब इस मानसिकता में और तेजी आई है। विगत कुछ वर्षों से आईआईटी शिक्षा को प्रभावित करने का कुचक्र तेज किया गया है। प्रवेश परीक्षा का स्वरूप अंग्रेजी भाषी और धनाढ्य छात्रों के अनुकूल बनाया गया है। इस कारण यहां प्रवेश पाने वाले गांव-देहात के छात्रों में और उनकी मौजूदगी से धनाढ्य छात्रों में एक बेचैनी देखी जा रही है। भाषा को लेकर भी इन संस्थानों में भेदभाव का माहौल बन रहा है। आईआईटी, रूड़की में बीते वर्ष जो छात्र प्रथम वर्ष में फेल हुए, उनकी अंग्रेजी कमजोर थी। अन्य अवरोधों के कारण आईआईटी में करीब नौ फीसदी छात्र ही गरीब या निम्न मध्यवर्ग से आ पाते हैं।

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आईआईटी के छात्रों में तनाव बढ़ने का कारण भाषा की दीवार भी है। हर साल आईआईटी के चार या पांच छात्र अंग्रेजी में कमजोर होने के कारण तनाव में आत्महत्या कर लेते हैं। मद्रास, आईआईटी में विगत पांच वर्षों में 10 छात्रों ने खुदकुशी की। समस्या को भांपकर मद्रास, आईआईटी ने अंग्रेजी भाषा को सुधारने की कोचिंग शुरू की है। कानुपर, आईआईटी ने भी छात्रों में तनाव कम करने के लिए काउंसिलिंग शुरू की है।
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पर ये प्रयोग भोथरे हो रहे हैं। समस्या का मूल हमारी गैरजनपक्षधर नीतियां हैं। चूंकि ऐसे संस्थानों में जाने वाले छात्रों की मांग विदेशों में रहती है, इसलिए धनाढ्यों की नजर आईआईटी पर है। आईआईटी में गरीबों की पहुंच रोकने के लिए यही लोग सत्ता प्रतिष्ठानों को प्रभावित करने में सक्रिय हैं।
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गांव-देहातों की खराब आर्थिक हालत के बावजूद 2013 में आईआईटी की वार्षिक फीस पचास हजार से बढ़ाकर नब्बे हजार कर दी गई थी। ढाई वर्ष के बाद फिर फीस में लगभग 122 फीसदी बढ़ोतरी की जा रही है। इससे गांव-देहात से आने वाले गरीब छात्रों में बेचैनी है। पांच लाख तक की वार्षिक आय वालों के बच्चों की फीस में 66 फीसदी की छूट और ब्याज मुक्त शिक्षा कर्ज दिलाने की बातें हो रही हैं। अनुसूचित जाति और जनजातियों, विकलांगों तथा गरीबी रेखा से नीचे के छात्रों की फीस माफ करने की बात भी की गई है। पर इस सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता कि इन संस्थानों में गरीबों की पहुंच सीमित कर दी गई है। केंद्र की पूर्व सरकार ने भी आईआईटी में प्रवेश के लिए एडवांस टेस्ट पास करने के अलावा बोर्ड के शीर्ष 20 पर्सेंटाइल में छात्र के लिए स्थान पाना जरूरी बना दिया था। इससे पिछले तीन वर्षों में करीब ढाई सौ छात्र आईआईटी में प्रवेश पाने से वंचित रह गए, जबकि वे आईआईटी प्रवेश परीक्षा द्वारा मेरिट सूची में आ चुके थे।


यानी कई स्तरों पर गांव-देहात के गरीबों को आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में आने से रोकने की तैयारी की जा रही है। यह नीति समता, बंधुत्व और भेदभाव रहित शैक्षिक माहौल के खिलाफ है। यह जन विरोधी भी है और गरीबों को उच्च तकनीकी शिक्षा से वंचित करने का उपक्रम भी। सरकार को आईआईटी जैसे संस्थानों को कंपनियों की तरह चलाने की नीति से मुक्त होना होगा। इन संस्थानों में मेधावी छात्रों की शिक्षा की गारंटी देनी होगी। छात्रों की आर्थिक स्थिति पढ़ाई में बाधा नहीं बननी चाहिए। ऐसे वातावरण से ही राष्ट्रवाद बेहतर बनेगा।

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