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मूकनायक के सौ साल

shyoraj singh bechan श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Fri, 31 Jan 2020 11:55 AM IST
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Hundred years of Mook Nayak
मूकनायक - फोटो : a

भीमराव आंबेडकर ने उनतीस साल की उम्र में मूकनायक नाम का मराठी में एक पाक्षिक अखबार शुरू किया था। मूकनायक का प्रवेशांक 31 जनवरी, 1920 को आया था। तीन वर्षों तक लगातार प्रकाशित हुए मराठी के इस पाक्षिक पत्र की हिंदी-अंग्रेजी मीडिया में प्रायः चर्चा नहीं होती। मूकनायक में आंबेडकर के लिखे बारह संपादकीय अग्रलेख अभी तक उपलब्ध हो पाए हैं। इस पत्र के प्रकाशन की योजना 1919 में बनी थी, पर मुश्किल अखबार की फंडिग को लेकर आई थी। तब आंबेडकर के सामाजिक कार्यों के सहयोगी और कोल्हापुर के छत्रपति शाहू महाराज के राज्य सेवा में आए कर्मचारी संतराम पवार ने महाराज को बताया कि आंबेडकर पिछड़ी, अति पिछड़ी, आदिवासी और बहिष्कृत जातियों में जागृति फैलाने और स्वराज सामाजिक न्याय, समता और बंधुता विषयक समान अधिकारों के लिए जागरूकता मंच के रूप में अखबार निकालना चाहते हैं। शाहू जी महाराज ने आंबेडकर को एकमुश्त 2,500 रुपये की नकद राशि दी।


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प्रवेशांक के संपादकीय में आंबेडकर ने लिखा था, 'हिंदू समाज एक मीनार है और एक-एक जाति इस मीनार का एक-एक तल है। ध्यान देने की बात यह है कि इस मीनार में सीढ़ियां नहीं हैं, एक तल से दूसरे तल में आने-जाने का कोई मार्ग नहीं है। जो जिस तल में जन्म लेता है, वह उसी तल (जाति) में मरता है। नीचे के तल का मनुष्य कितना ही लायक हो, ऊपर के तल में उसका प्रवेश संभव नहीं है, और ऊपर के तल का मनुष्य कितना ही नालायक हो, उसे नीचे के तल में धकेल देने की हिम्मत किसी में नहीं है।'

अंग्रेजी की भूमिका को रेखांकित करते हुए आंबेडकर ने इसे ‘शेरनी का दूध’ कहा। उन्होंने लिखा था कि यह शेरनी का दूध जिसे पीने को मिला, उसमें नया उत्साह, नया तेज और नई स्फूर्ति उत्पन्न हुई। जिनको अंग्रेजी विद्या संपादन (सीखना) आया, उन्होंने यूरोपीय देशों के इतिहास का अध्ययन करके अनियंत्रित राज्य-सत्ता के कारण होने वाली हानियों के बारे में जाना है और उनके मन में स्वतंत्रता की कल्पना उमड़ने लगी है। अंग्रेजी विद्या के प्रभाव से उन्हें राजा और प्रजा के अधिकार ज्ञात होने लगे हैं। उन्नति के साधन शीर्षक संपादकीय का यह अंश देखें, 'आज हिंदुस्तान का 'बहिष्कृत समाज’ कैसे जी रहा है? उसका सुधार कैसे होगा? बहिष्कृत समाज केवल शरीर से जिंदा है। जैसे कोमल वृक्ष जल के बगैर मुर्झा जाता है, जैसे जलाशय से बाहर पड़ी मछली तड़पती रहती है, वैसे ही हिंदू समाज ने बहिष्कृत समाज को हजारों साल से विद्या और विकास रूपी जलाशय से दूर कर रखा है। जब इस समाज की उन्नति की तृष्णा शांत होगी, राष्ट्र की एकता का वृक्ष फूलेगा-फलेगा, तभी राष्ट्र का भाग्योदय होगा।'

पेशबाई की पुनरावृत्ति शीर्षक के तहत उन्होंने सवाल किए, 'ये लोग कहते हैं कि जो हुआ, उसे छोड़ो। परंतु हम पर नित्य अत्याचार हो रहे हैं, इसलिए हमें ये उपदेश अच्छे नहीं लगते। नासिक-पंडरपुर में हमारे जाति भाइयों का पानी लेना रोक दिया। उन्होंने प्रयास किया, तो लाठियों से हमला किया गया। लकड़ियां बेचने वाले महार के शब्द कानों में आते ही उसे जानवर की तरह मारने दौड़ पड़ते हो। यही तुम्हारा बंधुप्रेम है?...बहिष्कृत बंधुओ, अब तो अपनी आंखें खोलो। अभी तो पूर्ण स्वराज मिला भी नहीं है। मिलने पर तुम्हारी क्या दशा होगी? इसलिए उठो, जागो, विद्यामृत का पान करो और अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों का मुकाबला करो।'

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