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जीवन धारा: हम खुशी पाने की उम्मीद में जीते हैं, ध्यान करने से प्रेम का प्रवाह निरंतर और अखंड होगा

Mon, 17 Feb 2025 05:15 AM IST
दीपक कुमार शर्मा स्वामी मुक्तानंद
स्वामी मुक्तानंद Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Mon, 17 Feb 2025 05:15 AM IST
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सार
आनंद हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। लेकिन, मनुष्य ने आनंद का वास्तविक निवास नहीं पाया है। उसने इसे प्राप्त करना नहीं सीखा है और इसी कारण वह दुखी रहता है।
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Human Life hope of finding happiness meditation helps in continuous and unbroken flow of love
स्वामी मुक्तानंद और सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हम अपना पूरा जीवन खुशी पाने की उम्मीद में जीते हैं। हम जो कुछ भी करते हैं, खुश रहने के लिए करते हैं। हम अपने जीवन में अलग-अलग कलाओं और हुनर को अपनाते हैं, ताकि खुश रह सकें। हमारी अंतरात्मा ही खुशी का स्वरूप है। उपनिषद कहते हैं कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड ईश्वर के आनंद से बना है, आनंद से ही उत्पन्न होता है, आनंद में ही रहता है और अंत में आनंद में ही विलीन हो जाता है। चूंकि ईश्वर सर्वव्यापी है, इसलिए आनंद भी सर्वत्र है, क्योंकि आनंद ईश्वर का स्वरूप है। इसलिए, ईश्वर से मिलने वाला यह आनंद हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। लेकिन मनुष्य ने आनंद का वास्तविक निवास नहीं पाया है। उसने इसे प्राप्त करना नहीं सीखा है और इसी कारण वह दुखी रहता है। हम अपने आंतरिक स्व के जितना करीब पहुंचते हैं, उतनी ही अधिक खुशी का अनुभव करते हैं। अक्सर हमें अपनी सामान्य गतिविधियों में इस आंतरिक खुशी का स्वाद मिलता है। जब हम नींद से उठते हैं, तो हमारा मन एक पल के लिए पूरी तरह से शांत हो जाता है और एक प्रकार से हमें आनंद की अनुभूति होती है। हम अनुभव करते हैं कि हमने अच्छा खाना खाया है, हम अपने भीतर देखते हैं और एक पल के लिए हमें संतुष्टि का एहसास होता है। जब हम लंबे समय के बाद दोस्तों से मिलते हैं और एक-दूसरे को गले लगाते हैं, तो एक पल के लिए हमें उस खुशी का अनुभव होता है।



हमारे जीवन में खुशी मौजूद है। हमें लगता है कि खुशी बाहर से आती है, इस वजह से हम लगातार खुद से संपर्क खो देते हैं। खुशी हमारे अंदर है और इसे पाने के लिए हमें अपने अंदर की ओर मुड़ना होगा। हमारी आंतरिक आत्मा आनंद से भरी हुई है। आत्मा का अनुभव करने के लिए, आत्मा के करीब आने के लिए ही हमें योग और ध्यान का अभ्यास करना चाहिए। मनुष्य को आत्मज्ञान की बहुत आवश्यकता है। मनुष्य मानवता के सिद्धांतों को भूल गया है, इसलिए, देशों के बीच नफरत है, लोगों के बीच नफरत है, हर जगह हिंसा बढ़ रही है। अपने भीतर मानवता का दीप जलाने के लिए मनुष्य को यह जानना होगा कि वह वास्तव में कौन है? उसे स्वयं की आत्मा का एहसास करना होगा। यदि मनुष्य स्वयं का सम्मान नहीं करता, तो वह दूसरों का सम्मान कैसे कर सकता है? इसलिए, सबसे पहले मनुष्य को स्वयं को जानना चाहिए। हर मनुष्य के भीतर एक दिव्य ऊर्जा होती है, जिसे कुंडलिनी कहते हैं। इस ऊर्जा के दो पहलू हैं, एक इस सांसारिक अस्तित्व को प्रकट करता है और दूसरा हमें सत्य की ओर ले जाता है। इस ऊर्जा का सांसारिक पहलू पूरी तरह से काम कर रहा है, लेकिन आंतरिक पहलू निष्क्रिय है। जब आंतरिक कुंडलिनी ऊर्जा जागृत होती है, तो यह हमारे भीतर योग की विभिन्न प्रक्रियाओं को शुरू करती है, और हमें आत्म की स्थिति तक ले जाती है। हमारे अस्तित्व को हर स्तर पर बदल देती है, और हमें अपने आस-पास की दुनिया को एक नए तरीके से देखने में सक्षम बनाती है। जो मुश्किल और निराशाजनक लगता था, वह मजेदार और आकर्षण से भरा लगने लगता है।


सूत्र- ध्यान करें
गहन ध्यान के माध्यम से आप एक ऐसी अवस्था में पहुंच जाते हैं, जो विचारों से परे, परिवर्तन से परे, कल्पना से परे, मतभेदों और द्वैत से परे होती है। आंतरिक दिव्य प्रेम आपके माध्यम से बहना शुरू हो जाएगा। आप लोगों को अलग-अलग व्यक्तियों के रूप में नहीं देखेंगे। आप अपने आस-पास के सभी लोगों में अपना स्वयं का स्वरूप देखेंगे। तब आपके भीतर से प्रेम का प्रवाह निरंतर और अखंड होगा।

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