इंसान का अहंकार: ‘मैं’ से मुक्त होकर ही परमात्मा को पा सकते हैं; भ्रम दूर होते ही अनंत की ओर उन्मुख होगा जीवन
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विस्तार
जब तक हमारे भीतर अहंकार है, तब तक हमारे भीतर का अंधकार नहीं मिट सकता। और जब तक हम अंधकार में डूबे रहेंगे, तब तक दुख से, अशांति से मुक्ति नहीं मिलेगी। जिस दिन कुछ होने के अहंकार से, त्यागने के अहंकार से, हर प्रकार के अहंकार से मुक्त हो जाएंगे, उसी दिन से हमारे दुखों का भी अंत शुरू हो जाएगा। अहंकार मनुष्य की कमजोरी है। जो जितना ज्यादा अहंकार से भरा है, वह भीतर से उतना ही कमजोर है। हम इतने ज्यादा अहंकार से भरे हैं कि हमारे भीतर परमात्मा के प्रवेश के लिए कोई जगह ही नहीं रह गई है। जो मनुष्य अहंकार से भरा है, वह सत्य को भी नहीं जान सकता, क्योंकि सत्य को जानने के लिए मन का शून्य और खाली होना अनिवार्य है। लेकिन जो मन अहंकार से भरा है, वह तो खाली हो नहीं सकता। ऐसे में परमात्मा उसमें कैसे प्रवेश करेगा? जो अहंकार से मुक्त होता है, वही शून्य होता है। हम सारा जीवन अपने इस अहंकार यानी ‘मैं’ में गुजार लेते हैं। इसी ‘मैं’ की रक्षा के लिए हम भवन खड़े कर लेते हैं, धन के पहाड़ खड़े कर लेते हैं। यश और पद की दौड़ के पीछे भी ‘मैं’ ही है। और इतना ही नहीं, इस ‘मैं’ की रक्षा के लिए ही हम त्याग भी करते हैं, उपवास करते हैं, पूजा करते हैं, मंदिर तक बना लेते हैं। और इस तरह अहंकार का पहाड़ निरंतर ऊंचा होता चला जाता है।
मनुष्य का अहंकार अद्भुत है। यह जो हमारा ‘मैं’ है, यह मोक्ष तक पीछा करता है। इसके लिए हम मोक्ष भी खोजते हैं। यह ‘मैं’ है क्या? एक आदमी तप कर सकता है, और यह तपश्चर्या ‘मैं’ के लिए ही दौड़ है, स्वयं को ‘मैं’ से भरने और इसे पूरा करने की। और मनुष्य जब थक जाता है और परेशान हो जाता है, तब वह पाता है कि यह ‘मैं’ उसे दुख और पीड़ा के अलावा कुछ नहीं दे रहा। ऐसे में उसके भीतर ‘मैं’ को त्यागने का विचार उत्पन्न हो सकता है। उसे लगने लगता है कि अब मैं इस ‘मैं’ को छोड़ दूंगा, अहंकार मुक्त हो जाऊंगा, विनम्र हो जाऊंगा, मैं सब त्याग दूंगा, जंगल की ओर चला जाऊंगा। लेकिन कौन चला जाएगा जंगल? कौन करेगा त्याग? जब आप सब कुछ त्याग कर जंगल की ओर चल देंगे, तब भी आपके भीतर का ‘मैं’ ही संतुष्ट होगा कि मैंने त्याग किया, मुझसे बड़ा त्यागी कोई नहीं। और ऐसे में अगर यह पता चल जाए कि मुझसे भी बड़ा कोई त्यागी आ गया, तो मन के फिर से ईर्ष्या से भरते देर नहीं लगेगी। इसलिए अहंकार बड़ा ही अद्भुत है, अनूठा है।
ऐसे में सवाल उठता है कि कैसे इस ‘मैं’ से छुटकारा मिले। इससे मुक्ति नहीं मिलेगी, तो मनुष्य का दुख से भी पीछा नहीं छूट सकता। अशांति से भी मुक्ति नहीं मिल सकती। अज्ञान भी पीछा नहीं छोड़ेगा। सिर्फ इसीलिए, क्योंकि इस ‘मैं’ को बनाए रखने के लिए ही हम जीवन भर लगे रहे और दूसरों के ‘मैं’ पर हमला करते रहे। अपनी सुरक्षा की यह भावना ही आक्रमण का भाव पैदा करती है। अहंकार से हिंसा पैदा होती है। जहां अहंकार है, वहां हिंसा है, क्योंकि अहंकार आक्रमण है। वह दूसरे को दबाना चाहता है, तभी वह तृप्त होता है।
सूत्र: अपने भ्रम को दूर करें
अहंकार हमारा भ्रम है। जो जिंदगी को पूरा नहीं देख पाता है, उसको यह भ्रम पैदा हो जाता है कि मैं कुछ हूं। लेकिन मैं हूं क्या, यह कोई नहीं जानता। इसलिए मैं कुछ हूं, यह एक भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं है। जिस दिन हम यह समझ जाएंगे कि ‘मैं’ जीवन का सबसे बड़ा झूठ और भ्रम है, उसी समय से जीवन अनंत की ओर उन्मुख हो जाएगा।